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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 40
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्ित्रभिर्गुणैः

पृथ्वीमें या स्वर्गमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवाय और कहीं भी वह ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो। — VaniSagar

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TamilIND

இயற்கையில் பிறந்த மூன்று குணங்களிலிருந்து விடுபட்ட கடவுள்களில் பூமியிலோ அல்லது சொர்க்கத்திலோ இல்லை.

KannadaIND

ಪ್ರಕೃತಿಯಿಂದ ಹುಟ್ಟಿದ ಮೂರು ಗುಣಗಳಿಂದ ಮುಕ್ತಿ ಪಡೆದ ದೇವರುಗಳಲ್ಲಿ ಭೂಮಿಯ ಮೇಲಾಗಲೀ ಸ್ವರ್ಗದಲ್ಲಾಗಲೀ ಇಲ್ಲ.

BengaliIND

পৃথিবীতে বা স্বর্গে এমন কোন সত্তা নেই যে দেবতাদের মধ্যে প্রকৃতির জন্মের তিনটি গুণ থেকে মুক্ত হয়।

SindhiIND

زمين تي يا آسمان ۾ ڪو به ديوتا نه آهي جيڪو فطرت جي پيدا ڪيل ٽن خاصيتن کان آزاد آهي.

MarathiIND

प्रकृतीच्या तीन गुणांपासून मुक्त झालेल्या देवतांमध्ये पृथ्वी किंवा स्वर्गात कोणीही नाही.

TeluguIND

ప్రకృతి నుండి పుట్టిన మూడు గుణాల నుండి విముక్తి పొందిన దేవతలలో భూమిపై లేదా స్వర్గంలో ఏదీ లేదు.

PunjabiIND

ਕੁਦਰਤ ਦੇ ਤਿੰਨ ਗੁਣਾਂ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਹੋਣ ਵਾਲੇ ਦੇਵਤਿਆਂ ਵਿੱਚ ਧਰਤੀ ਜਾਂ ਸਵਰਗ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਵੀ ਜੀਵ ਨਹੀਂ ਹੈ।

GujaratiIND

કુદરતના ત્રણ ગુણોથી મુક્ત થયેલા દેવતાઓમાં પૃથ્વી પર કે સ્વર્ગમાં કોઈ અસ્તિત્વ નથી.

NepaliIND

प्रकृतिबाट उत्पन्न तीन गुणहरूबाट मुक्त हुने देवताहरूमध्ये पृथ्वी वा स्वर्गमा कोही छैन।

MalayalamIND

പ്രകൃതിയിൽ നിന്ന് ജനിച്ച മൂന്ന് ഗുണങ്ങളിൽ നിന്ന് മുക്തി നേടിയ ദൈവങ്ങളിൽ ഭൂമിയിലോ സ്വർഗത്തിലോ ഇല്ല.

ManipuriIND

ꯄ꯭ꯔ꯭ꯏꯊꯤꯕꯤꯗꯥ ꯅꯠꯔꯒꯥ ꯁ꯭ꯕꯔꯒꯗꯥ ꯏꯁ꯭ꯕꯔꯒꯤ ꯃꯔꯛꯇꯥ ꯃꯍꯧꯁꯥꯗꯒꯤ ꯄꯣꯀꯄꯥ ꯃꯒꯨꯟ ꯑꯍꯨꯃꯗꯒꯤ ꯅꯥꯟꯊꯣꯛꯂꯕꯥ ꯖꯤꯕ ꯑꯃꯠꯇꯥ ꯂꯩꯇꯦ꯫

DogriIND

देवतां विच धरती ते ना स्वर्ग विच कोई जीव नहीं है जो कुदरत तों पैदा होए त्रै गुणां तों मुक्त होवे।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- [इस अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहा तो भगवान्ने पहले त्याग -- कर्मयोगका वर्णन किया। उस प्रकरणका उपसंहार करते हुए भगवान्ने कहा कि जो त्यागी नहीं हैं? उनको अनिष्ट? इष्ट और मिश्र -- यह तीन प्रकारका कर्मोंका फल मिलता है और जो संन्यासी हैं? उनको कभी नहीं मिलता। ऐसा कहकर तेरहवें श्लोकसे संन्यास -- सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करके पहले कर्मोंके होनेमें अधिष्ठानादि पाँच हेतु बताये। सोलहवेंसत्रहवें श्लोकोंमें कर्तृत्व माननेवालोंकी निन्दा और कर्तृत्वका त्याग करनेवालोंकी प्रशंसा की। अठारहवें श्लोकमें कर्मप्रेरणा और कर्मसंग्रहका वर्णन किया। परन्तु जो वास्तविक तत्त्व है? वह न कर्मप्रेरक है और न कर्मसंग्राहक। कर्मप्रेरणा और कर्मसंग्रह तो प्रकृतिके गुणोंके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही होते हैं। फिर गुणोंके अनुसार ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि? धृति और सुखके तीनतीन भेदोंका वर्णन किया। सुखका वर्णन करते हुए यह बताया कि प्रकृतिके साथ यत्किञ्चित् सम्बन्ध रखते हुए ऊँचासेऊँचा जो सुख होता है? वह सात्त्विक होता है। परंतु जो स्वरूपका वास्तविक सुख है? वह गुणातीत है? विलक्षण है? अलौकिक है (गीता 6। 21)।सात्त्विक सुखको आत्मबुद्धिप्रसादजम् कहकर भगवान्ने उसको जन्य (उत्पन्न होनेवाला) बताया। जन्य वस्तु नित्य नहीं होती। इसलिये उसको जन्य बतानेका तात्पर्य है कि उस जन्य सुखसे भी ऊपर उठना है अर्थात् प्रकृति और प्रकृतिके तीनों गुणोंसे रहित होकर उस परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना है? जो कि सबका अपना स्वाभाविक स्वरूप है। इसलिये कहते हैं -- ]न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः -- यहाँ पृथिव्याम् पदसे मृत्युलोक और पृथ्वीके नीचेके अतल? वितल आदि सभी लोकोंका? दिवि पदसे स्वर्ग आदि लोकोंका? देवेषु पदको प्राणिमात्रके उपलक्षणके रूपमें उनउन स्थानोंमें रहनेवाले मनुष्य? देवता? असुर? राक्षस? नाग? पशु? पक्षी? कीट? पतंग? वृक्ष आदि सभी चरअचर प्राणियोंका? और वा पुनः पदोंसे अनन्त ब्रह्माण्डोंका संकेत किया गया है। तात्पर्य यह हुआ कि त्रिलोकी और अनन्त ब्रह्माण्ड तथा उनमें रहनेवाली कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है? जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो अर्थात् सबकेसब त्रिगुणात्मक हैं -- सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्ित्रभिर्गुणैः।प्रकृति और प्रकृतिका कार्य -- यह सबकासब ही त्रिगुणात्मक और परिवर्तनशील है। इनसे सम्बन्ध जोड़नेसे ही बन्धन होता है और इनसे सम्बन्धविच्छेद करनेसे ही मुक्ति होती है क्योंकि स्वरूप असङ्ग है। स्वरूप स्व है और प्रकृति पर है। प्रकृतिसे सम्बन्ध जुड़ते ही अहंकार पैदा हो जाता है? जो कि पराधीनताको पैदा करनेवाला है। यह एक विचित्र बात है कि अहंकारमें स्वाधीनता मालूम देती है? पर है वास्तवमें पराधीनता कारण कि अहंकारसे प्रकृतिजन्य पदार्थोंमें आसक्ति? कामना आदि पैदा हो जाती है? जिससे पराधीनतामें भी स्वाधीनता दीखने लग जाती है। इसलिये प्रकृतिजन्य गुणोंसे रहित होना आवश्यक है।प्रकृतिजन्य गुणोंमें रजोगुण और तमोगुणका त्याग करके सत्त्वगुण बढ़ानेकी आवश्यकता है। सत्त्वगुणमें भी प्रसन्नता और विवेक तो आवश्यक है परन्तु सात्त्विक सुख और ज्ञानकी आसक्ति नहीं होनी चाहिये क्योंकि सुख और ज्ञानकी आसक्ति बाँधनेवाली है। इसलिये इनकी आसक्तिका त्याग करके सत्त्वगुणसे ऊँचा उठे। इससे ऊँचा उठनेके लिये ही यहाँ गुणोंका प्रकरण आया है।साधकको तो सात्त्विक ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि? धृति और सुख -- इनपर ध्यान देकर इनके अनुरूप अपना जीवन बनाना चाहिये और सावधानीसे राजसतामसका त्याग करना चाहिये। इनका त्याग करनेमें सावधानी ही साधन है। सावधानीसे सब साधन स्वतः प्रकट होते हैं। प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद करनेमें सात्त्विकता बहुत आवश्यक है। कारण कि इसमें प्रकाश अर्थात् विवेक जाग्रत् रहता है? जिससे प्रकृतिसे मुक्त होनेमें बड़ी सहायता मिलती है। वास्तवमें तो इससे भी असङ्ग होना है। सम्बन्ध -- त्यागके प्रकरणमें भगवान्ने यह बताया कि नियत कर्मोंका त्याग करना उचित नहीं है। उनका मूढ़तापूर्वक त्याग करनेसे वह त्याग तामस हो जाता है शारीरिक क्लेशके भयसे नियत कर्मोंका त्याग करनेसे वह त्याग राजस हो जाता है और फल एवं आसक्तिका त्याग करके नियत कर्मोंको करनेसे वह त्याग सात्त्विक हो जाता है (18। 7 -- 9)। सांख्ययोगकी दृष्टिसे सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बताते हुए जहाँ सात्त्विक कर्मका वर्णन हुआ है? वहाँ नियत कर्मको कर्तृत्वाभिमानसे रहित? रागद्वेषसे रहित और फलेच्छासे रहित मनुष्यके द्वारा किये जानेका उल्लेख किया है (18। 23)। उन कर्मोंमें किस वर्णके लिये कौनसे कर्म नियत कर्म हैं और उन नियत कर्मोंको कैसे किया जाय -- इसको बतानेके लिये और साथ ही भक्तियोगकी बात बतानेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

इसके उपरान्त अब प्रकरणका उपसंहार करनेवाला श्लोक कहा जाता है --, ऐसा कोई सत्त्व? अर्थात् मनुष्यादि प्राणी या अन्य कोई भी प्राणरहित वस्तुमात्र? पृथिवीमें? स्वर्गमें अथवा देवताओंमें भी नहीं है? जो कि इन प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सत्त्वादि तीनों गुणोंसे मुक्त अर्थात् रहित हो। ऐसा कोई नहीं है इस पूर्वके पदसे इस वाक्यका सम्बन्ध है। क्रिया? कारक और फल ही जिसका स्वरूप है? ऐसा यह सारा संसार सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंका ही विस्तार है? अविद्यासे कल्पित है और अनर्थरूप है? ( पंद्रहवें अध्यायमें ) वृक्षरूपकी कल्पना करके ऊर्ध्वमूलम् इत्यादि वाक्योंद्वारा मूलसहित इसका वर्णन किया गया है। तथा यह भी कहा है कि उसको दृढ़ असङ्गशस्त्रद्वारा छेदन करके उसके पश्चात् उस परम पदको खोजना चाहिये। उसमें यह शङका होती है कि तब तो सब कुछ तीनों गुणोंका ही कार्य होनेसे संसारके कारणकी निवृत्ति नहीं हो सकती। इसलिये जिस उपायसे उसकी निवृत्ति हो? वह बतलाना चाहिये।

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Sri Anandgiri

क्रियाकारकफलात्मनः संसारस्य प्रत्येकं सात्त्विकादिभेदेन त्रैविध्यमुक्त्वा संसारान्तर्भूतमेव किंचिद्गुणत्रयास्पृष्टमपि क्वचिद्भविष्यतीत्याशङ्क्याह -- अथेति। संसारस्य सर्वस्यैव गुणत्रयसंस्पृष्टत्वं प्रकरणम्? अन्यद्वाऽप्राणीत्यत्राप्राणिशब्देन प्रसिद्ध्या स्थावरादि गृह्यते।

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Sri Dhanpati

क्रियाकारकफलानां प्रत्येकं सात्त्विकादिभेदेन त्रैविध्यमुक्त्वा किंचिदेभिस्त्रिभिर्गुणैर्मुक्तमपि भविष्यतीत्याकाङ्क्षानुपपत्तयेऽनुक्तमपि संगृह्णन्प्रकरणार्थमुपसंहरति। न तदस्ति पृथिव्यां वा मनुष्यादिसत्त्वं प्राणिजातमन्यद्वाऽप्राणिजातं स्थावरादि दिवि देवेषु वा पुनः प्रकृतिजैः प्रकृतितो जातैः एभिस्त्रिभिर्गुणैः सत्त्वादिभिः मुक्तं,परित्यक्तं यत्स्यात्तन्नास्तीत्यर्थः। अदिवीति परलोकत्वसादृश्यादब्राह्मण इतिवत्। पातालादिपरमितीतरे। आचार्यैस्तु तृतीयवाशब्दाभावात्पृथिवीविवरात्मकस्य पातालस्यापि पृथिवीशब्देन संग्रहसंभवात्प्रत्योजनशून्यक्लिष्टकल्पनाया अयुक्तत्वाच्चैवं न व्याख्यातम्। तथाच क्रियाकारकफललक्षणः सर्वोऽपि संसारः सत्त्वरजस्तमोगुणात्मकोऽविद्यापरिकल्पितः समूलोऽनर्थः आत्मज्ञानेनाविद्यानिवृत्त्या इति भावः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
nano
tatthat
astiexists
pṛithivyāmon earth
or
divithe higher celestial abodes
deveṣhuamongst the celestial gods
or
punaḥagain
sattvamexistence
prakṛitijaiḥ
muktamliberated
yatthat
ebhiḥfrom the influence of these
syātis
tribhiḥthree
guṇaiḥmodes of material nature
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.39
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्

निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है, वह सुख तामस कहा गया है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.41
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः

हे परंतप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न हुए तीनों गुणोंके द्वारा विभक्त किये गये हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 40
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 40
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्ित्रभिर्गुणैः

पृथ्वीमें या स्वर्गमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवाय और कहीं भी वह ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 40 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 40 का हिंदी अर्थ: "पृथ्वीमें या स्वर्गमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवाय और कहीं भी वह ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 40?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 40 translates to: "There is no being on earth or in heaven among the gods that is liberated from the three qualities born of Nature. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 40 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। पृथ्वीमें या स्वर्गमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवाय और कहीं भी वह ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "na tad asti pṛithivyāṁ vā divi deveṣhu vā punaḥ" mean in English?

"na tad asti pṛithivyāṁ vā divi deveṣhu vā punaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 40. There is no being on earth or in heaven among the gods that is liberated from the three qualities born of Nature. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.