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Sudarshana Chakra
Adhyay 17, Shlok 9
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः

अति कड़वे, अति खट्टे, अति नमकीन, अति गरम, अति तीखे, अति रूखे और अति दाहकारक आहार अर्थात् भोजनके पदार्थ राजस मनुष्यको प्रिय होते हैं, जो कि दुःख, शोक और रोगोंको देनेवाले हैं। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

তেতো, টক, নোনতা, অত্যধিক গরম, তীক্ষ্ণ, শুষ্ক ও পোড়া খাবার রাজসিকদের পছন্দ এবং ব্যথা, শোক ও রোগের ফলদায়ক।

TamilIND

கசப்பு, புளிப்பு, காரம், அதிக சூடு, காரமான, வறண்ட மற்றும் எரியும் உணவுகள் ராஜஸிக்ஸால் விரும்பப்பட்டு, வலி, துக்கம், நோய் ஆகியவற்றை உண்டாக்கும்.

PunjabiIND

ਕੌੜੇ, ਖੱਟੇ, ਨਮਕੀਨ, ਬਹੁਤ ਜ਼ਿਆਦਾ ਗਰਮ, ਤਿੱਖੇ, ਸੁੱਕੇ ਅਤੇ ਜਲਣ ਵਾਲੇ ਭੋਜਨ ਰਾਜਸੀ ਨੂੰ ਪਸੰਦ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਦਰਦ, ਸੋਗ ਅਤੇ ਰੋਗ ਦੇ ਉਪਜਾਊ ਹੁੰਦੇ ਹਨ।

SindhiIND

اُهي کاڌا جيڪي تلخ، ترا، لوڻ، سخت گرم، ٿلها، سڪل ۽ جلندڙ هوندا آهن، سي راجسيءَ کي پسند هوندا آهن ۽ درد، غم ۽ بيماريءَ جو ڪارڻ هوندا آهن.

NepaliIND

तीतो, अमिलो, नुनिलो, अत्याधिक तातो, तिखो, सुख्खा र पोल्ने खानेकुरा राजसिकहरूलाई मनपर्ने र पीडा, शोक र रोगको उपज हुन्।

TeluguIND

చేదు, పులుపు, లవణం, మితిమీరిన వేడి, ఘాటు, పొడి మరియు మండే ఆహారాలు రాజసిక్‌లకు ఇష్టం మరియు నొప్పి, దుఃఖం మరియు వ్యాధిని ఉత్పత్తి చేస్తాయి.

KonkaniIND

कडू, आंबट, खारें, चड गरम, खरखरीत, सुकें आनी जळपी अन्न राजसांक आवडटात आनी ते वेदना, दुख्ख आनी रोग हांचेपसून तयार करतात.

MaithiliIND

जे खाद्य पदार्थ कटु, खट्टा, नमकीन, बेसी गरम, तीखा, शुष्क, आ जरैत अछि से राजसी लोकनि केँ नीक लगैत छनि आ पीड़ा, शोक, आ रोगक उत्पादक होइत छनि |

AssameseIND

তিতা, টেঙা, নিমখীয়া, অত্যধিক গৰম, তিতা, শুকান, জ্বলন্ত খাদ্য ৰাজসিকসকলে ভাল পায় আৰু ই যন্ত্ৰণা, শোক, ৰোগৰ উৎপাদন কৰে।

MarathiIND

कडू, आंबट, खारट, अतिउष्ण, तिखट, कोरडे आणि जळणारे पदार्थ राजसिकांना आवडतात आणि ते वेदना, शोक आणि रोग उत्पन्न करणारे असतात.

GujaratiIND

કડવો, ખાટો, ખારો, અતિશય ગરમ, તીખો, શુષ્ક અને દાહક ખોરાક રાજસિકોને ગમે છે અને તે પીડા, શોક અને રોગના ઉપકારક છે.

KannadaIND

ಕಹಿ, ಹುಳಿ, ಖಾರ, ಅತಿಯಾದ ಬಿಸಿ, ಕಟು, ಒಣ ಮತ್ತು ಸುಡುವ ಆಹಾರಗಳು ರಾಜಸಿಕರಿಗೆ ಇಷ್ಟವಾಗುತ್ತವೆ ಮತ್ತು ನೋವು, ದುಃಖ ಮತ್ತು ರೋಗವನ್ನು ಉಂಟುಮಾಡುತ್ತವೆ.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- कटु -- करेला? ग्वारपाठा आदि अधिक कड़वे पदार्थ अम्ल -- इमली? अमचूर? नींबू? छाछ? सड़न पैदा करके बनाया गया सिरका आदि अधिक खट्टे पदार्थ लवणम् -- अधिक नमकवाले पदार्थ अत्युष्णम् -- जिनसे भाप निकल रही हो? ऐसे अत्यन्त गरमगरम पदार्थ तीक्ष्णम् -- जिनको खानेसे नाक? आँख? मुख और सिरसे पानी आने लगे? ऐसे लाल मिर्च आदि अधिक तीखे पदार्थ रूक्षम् -- जिनमें घी? दूध आदिका सम्बन्ध नहीं है? ऐसे भुने हुए चने? सतुआ आदि अधिक रूखे पदार्थ और विदाहिनः -- राई आदि अधिक दाहकारक पदार्थ (राईको दोतीन घंटे छाछमें भिगोकर रखा जाय? तो उसमें एक खमीर पैदा होता है? जो बहुत दाहकारक होता है)।आहारा राजसस्येष्टाः -- इस प्रकारके भोजनके (भोज्य? पेय? लेह्य और चोष्य) पदार्थ राजस मनुष्यको प्यारे होते हैं। इससे उसकी निष्ठाकी पहचान हो जाती है। दुःखशोकामयप्रदाः -- परन्तु ऐसे पदार्थ परिणाममें दुःख? शोक और रोगोंको देनेवाले होते हैं। खट्टा? तीखा और दाहकारक भोजन करते समय मुख आदिमें जो जलन होती है? यह दुःख है। भोजन करनेके बाद मनमें प्रसन्नता नहीं होती? प्रत्युत स्वाभाविक चिन्ता रहती,है? यह शोक है। ऐसे भोजनसे शरीरमें प्रायः रोग होते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

कड़वे? खट्टे? लवणयुक्त? आति उष्ण? तीक्ष्ण? रूखे और दाहकारक? एवं दुःख? चिन्ता और रोगोंको उत्पन्न करनेवाले अर्थात् जो दुःख? शोक और रोगोंको उत्पन्न करते हों? ऐसे आहार राजस पुरुषको प्रिय होते हैं। यहाँ अति शब्द सबके साथ जो़ड़ना चाहिये? जैसे अति कड़वे? अत्यन्त खट्टे? अति तीक्ष्ण इत्यादि।

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Sri Anandgiri

राजसप्रीतिविषयमाहारविशेषं दर्शयति -- कट्विति। कटुस्तिक्तः कटुकस्य तीक्ष्णशब्देनोक्तत्वात्? रूक्षो विस्नेहः? विदाही संतापकः। अतिशब्दस्य सर्वत्र योजनमेवाभिनयति -- अतिकटुरिति। दुःखं तात्कालिकी पीडा? इष्टवियोगजं दुःखं शोकः? आमयो रोगः।

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Sri Dhanpati

राजसप्रियाहारानुदाहरति -- कट्विति। अतिशब्दः कट्वादिषु सर्वेषु संबन्धनीयः। अतिकतुर्निम्बादिः? अत्यम्लं जम्बीरादि? अतिलवणं बहुक्षप्तिसैन्धवादि? अत्युष्णं मुखादिदाहकं? अतितीक्ष्णं मरीचादि? अतिरुक्षः स्नेहलेशेनापि? अत्यम्लं जम्बीरादि? अतिलवणं बहुक्षिप्तसैन्यवादि? अत्युष्णं मुखादिदाहकं? अतितीक्ष्णं मरीचादि? अतिरुक्षः स्नेहलेशेनापि रहितः कङ्गुकोद्रवादिः? अतिविदाही संतापकः सर्षपादिः? एवंविधा अतिकट्वादयो दुःखं तात्कालिकी पीडा? पश्चादुत्पन्नरोगे तज्जन्यं दौर्म नस्यं शोकः आमयो रोगः तान्प्रयच्छन्तीति दुःखशोकामयप्रदाः आहारा राजसप्रिया राजसस्येष्टा एतादृशाहारप्रतिमन्तो राजसा ज्ञातव्याः श्रेयोर्थिभिश्चैवंविधा आहाराः परिहरणीया इत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
kaṭubitter
amlasour
lavaṇasalty
atiuṣhṇa
tīkṣhṇapungent
rūkṣhadry
vidāhinaḥchiliful
āhārāḥfood
rājasasyato persons in the mode of passion
iṣhṭāḥdear
duḥkhapain
śhokagrief
āmayadisease
pradāḥproduce
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 17.8
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः

आयु, सत्त्वगुण, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता बढ़ानेवाले, स्थिर रहनेवाले, हृदयको शक्ति देनेवाले, रसयुक्त तथा चिकने -- ऐसे आहार अर्थात् भोजन करनेके पदार्थ सात्त्विक मनुष्यको प्रिय होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 17.10
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्

जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धित, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो महान् अपवित्र भी है, वह तामस मनुष्यको प्रिय होता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 17Shlok 9
Bhagavad Gita · Adhyay 17, Shlok 9
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः

अति कड़वे, अति खट्टे, अति नमकीन, अति गरम, अति तीखे, अति रूखे और अति दाहकारक आहार अर्थात् भोजनके पदार्थ राजस मनुष्यको प्रिय होते हैं, जो कि दुःख, शोक और रोगोंको देनेवाले हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 9 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 9 का हिंदी अर्थ: "अति कड़वे, अति खट्टे, अति नमकीन, अति गरम, अति तीखे, अति रूखे और अति दाहकारक आहार अर्थात् भोजनके पदार्थ राजस मनुष्यको प्रिय होते हैं, जो कि दुःख, शोक और रोगोंको देनेवाले हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 9?

Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 9 translates to: "The foods that are bitter, sour, salty, overly hot, pungent, dry, and burning are liked by the Rajasic and are productive of pain, grief, and disease. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 17, श्लोक 9 है जो Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga में संकलित है। अति कड़वे, अति खट्टे, अति नमकीन, अति गरम, अति तीखे, अति रूखे और अति दाहकारक आहार अर्थात् भोजनके पदार्थ राजस मनुष्यको प्रिय होते हैं, जो कि दुःख, शोक और रोगोंको देनेवाले हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "kaṭv-amla-lavaṇāty-uṣhṇa- tīkṣhṇa-rūkṣha-vidāhinaḥ" mean in English?

"kaṭv-amla-lavaṇāty-uṣhṇa- tīkṣhṇa-rūkṣha-vidāhinaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 9. The foods that are bitter, sour, salty, overly hot, pungent, dry, and burning are liked by the Rajasic and are productive of pain, grief, and disease. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.