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Sudarshana Chakra
Adhyay 17, Shlok 16
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते

मनकी प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मनका निग्रह और भावोंकी शुद्धि -- इस तरह यह मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

মনের প্রশান্তি, সদালাপ, আত্মনিয়ন্ত্রণ এবং প্রকৃতির বিশুদ্ধতা— একে বলে মানসিক তপস্যা।

MalayalamIND

മനസ്സിൻ്റെ ശാന്തത, നല്ല മനസ്സ്, ആത്മനിയന്ത്രണം, പ്രകൃതിയുടെ പരിശുദ്ധി - ഇതിനെ മാനസിക തപസ്സ് എന്ന് വിളിക്കുന്നു.

TamilIND

மன அமைதி, நல்ல உள்ளம், தன்னடக்கம் மற்றும் இயற்கையின் தூய்மை - இது மன இறுக்கம் என்று அழைக்கப்படுகிறது.

PunjabiIND

ਮਨ ਦੀ ਸਹਿਜਤਾ, ਨੇਕਦਿਲਤਾ, ਸੰਜਮ ਅਤੇ ਕੁਦਰਤ ਦੀ ਸ਼ੁੱਧਤਾ—ਇਸ ਨੂੰ ਮਾਨਸਿਕ ਤਪੱਸਿਆ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

GujaratiIND

મનની નિર્મળતા, સારા હૃદય, આત્મ-નિયંત્રણ અને પ્રકૃતિની શુદ્ધતા - આને માનસિક તપસ્યા કહેવાય છે.

KannadaIND

ಮನಸ್ಸಿನ ಪ್ರಶಾಂತತೆ, ಒಳ್ಳೆಯ ಹೃದಯ, ಸ್ವಯಂ ನಿಯಂತ್ರಣ ಮತ್ತು ಪ್ರಕೃತಿಯ ಶುದ್ಧತೆ - ಇದನ್ನು ಮಾನಸಿಕ ತಪಸ್ಸು ಎಂದು ಕರೆಯಲಾಗುತ್ತದೆ.

ManipuriIND

ꯋꯥꯈꯂꯒꯤ ꯁꯦꯔꯦꯅꯤꯇꯤ, ꯑꯐꯕꯥ ꯊꯝꯃꯣꯌ, ꯃꯁꯥꯅꯥ ꯃꯁꯥꯕꯨ ꯊꯥꯖꯖꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯍꯧꯁꯥꯒꯤ ꯁꯦꯡꯂꯕꯥ – ꯃꯁꯤꯕꯨ ꯃꯦꯟꯇꯦꯜ ꯑꯦꯎꯁ꯭ꯇꯦꯔꯤꯇꯤ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯀꯧꯏ꯫

BhojpuriIND

मन के शांति, सद्भावना, आत्मसंयम, आ प्रकृति के शुद्धता-एह के मानसिक तप कहल जाला।

TeluguIND

మనస్సు యొక్క ప్రశాంతత, మంచి హృదయం, స్వీయ నియంత్రణ మరియు ప్రకృతి యొక్క స్వచ్ఛత-దీనినే మానసిక కాఠిన్యం అంటారు.

MarathiIND

मनाची निर्मळता, चांगुलपणा, आत्मसंयम आणि निसर्गाची शुद्धता - याला मानसिक तपस्या म्हणतात.

OdiaIND

ମନର ଶାନ୍ତି, ଉତ୍ତମ ହୃଦୟ, ଆତ୍ମ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ, ଏବଂ ପ୍ରକୃତିର ଶୁଦ୍ଧତା - ଏହାକୁ ମାନସିକ ତୀବ୍ରତା କୁହାଯାଏ |

KonkaniIND

मनाची शांती, बऱ्या मनाची, आत्मसंयम आनी सैमाची शुध्दताय-हाका मानसीक तप अशें म्हण्टात.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- मनःप्रसादः -- मनकी प्रसन्नताको मनःप्रसाद कहते हैं। वस्तु? व्यक्ति? देश? काल? परिस्थिति? घटना आदिके संयोगसे पैदा होनेवाली प्रसन्नता स्थायीरूपसे हरदम नहीं रह सकती क्योंकि जिसकी उत्पत्ति होती है? वह वस्तु स्थायी रहनेवाली नहीं होती। परन्तु दुर्गुणदुराचारोंसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर जो स्थायी तथा स्वाभाविक प्रसन्नता प्रकट होती है? वह हरदम रहती है और वही प्रसन्नता मन? बुद्धि आदिमें आती है? जिससे मनमें कभी अशान्ति होती ही नहीं अर्थात् मन हरदम प्रसन्न रहता है।मनमें अशान्ति? हलचल आदि कब होते हैं जब मनुष्य धनसम्पत्ति? स्त्रीपुत्र आदि नाशवान् चीजोंका सहारा ले लेता है। जिसका सहारा उसने ले रखा है? वे सब चीजें आनेजानेवाली हैं? स्थायी रहनेवाली नहीं हैं। अतः उनके संयोगवियोगसे उसके मनमें हलचल आदि होती है। यदि साधक न रहनेवाली चीजोंका सहारा छोड़कर नित्यनिरन्तर रहनेवाले प्रभुका सहारा ले ले? तो फिर पदार्थ? व्यक्ति आदिके संयोगवियोगको लेकर उसके मनमें कभी अशान्ति? हलचल नहीं होगी।मनकी प्रसन्नता प्राप्त करनेके उपाय(1) सांसारिक वस्तु? व्यक्ति? परिस्थिति? देश? काल? घटना आदिको लेकर मनमें राग और द्वेष पैदा न होने दे।(2) अपने स्वार्थ और अभिमानको लेकर किसीसे पक्षपात न करे।(3) मनको सदा दया? क्षमा? उदारता आदि भावोंसे परिपूर्ण रखे।(4) मनमें प्राणिमात्रके हितका भाव हो।(5) हितपरिमितभोजी नित्यमेकान्तसेवी सकृदुचितहितोक्तिः स्वल्पनिद्राविहारः। अनुनियमनशीलो यो भजत्युक्तकाले स लभत इव शीघ्रं साधुचित्तप्रसादम्।।(सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह 372) जो शरीरके लिये हितकारक एवं नियमित भोजन करनेवाला है? सदा एकान्तमें रहनेके स्वभाववाला है? किसीके पूछनेपर कभी कोई हितकी उचित बात कह देता है अर्थात् बहुत ही कम मात्रामें बोलता है? जो सोना और घूमना बहुत कम करनेवाला है। इस प्रकार जो शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार खानपानविहार आदिका सेवन करनेवाला है? वह साधक बहुत ही जल्दी चित्तकी प्रसन्नताको प्राप्त हो जाता है। -- इन उपायोंसे मन सदा प्रसन्न रहता है।सौम्यत्वम् -- हृदयमें हिंसा? क्रूरता? कुटिलता? असहिष्णुता? द्वेष आदि भावोंके न रहनेसे एवं भगवान्के गुण? प्रभाव? दयालुता? सर्वव्यापकता आदिपर अटल विश्वास होनेसे साधकके मनमें स्वाभाविक ही सौम्यभाव रहता है। फिर उसको कोई टेढ़ा वचन कह दे? उसका तिरस्कार कर दे? उसपर बिना कारण दोषारोपण करे? उसके साथ कोई वैरद्वेष रखे अथवा उसके धन? मान? महिमा आदिकी हानि हो जाय? तो भी उसके सौम्यभावमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता।मौनम् -- अनुकूलताप्रतिकूलता? संयोगवियोग? रागद्वेष? सुखदुःख आदि द्वन्द्वोंको लेकर मनमें हलचलका न होना ही वास्तवमें मौन है ।शास्त्रों? पुराणों और सन्तमहापुरुषोंकी वाणियोंका तथा उनके गहरे भावोंका मनन होता रहे गीता? रामायण? भागवत आदि भगवत्सम्बन्धी ग्रन्थोंमें कहे हुए भगवान्के गुणोंका? चरित्रोंका सदा मनन होता रहे संसारके प्राणी किस प्रकार सुखी हो सकते हैं सबका कल्याण किनकिन उपायोंसे हो सकता है किनकिन सरल युक्तियोंसे हो सकता है उनउन उपायोंका और युक्तियोंका मनमें हरदम मनन होता रहे -- ये सभी मौन शब्दसे कहे जा सकते है।आत्मविनिग्रहः -- मन बिलकुल एकाग्र हो जाय और तैलधारावत् एक ही चिन्तन करता रहे -- इसको भी मनका निग्रह कहते हैं परन्तु मनका सच्चा निग्रह यही है कि मन साधकके वशमें रहे अर्थात् मनको जहाँसे हटाना चाहें? वहाँसे हट जाय और जहाँ जितनी देर लगाना चाहें? वहाँ उतनी देर लगा रहे। तात्पर्य यह है कि साधक मनके वशीभूत होकर काम नहीं करे? प्रत्युत मन ही उसके वशीभूत होकर काम करता रहे। इस प्रकार मनका वशीभूत होना ही वास्तवमें आत्मविनिग्रह है।भावसंशुद्धिः -- जिस भावमें अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग हो और दूसरोंकी हितकारिता हो? उसे,भावसंशुद्धि अर्थात् भावकी महान् पवित्रता कहते हैं। जिसके भीतर एक भगवान्का ही आसरा? भरोसा है? एक भगवान्का ही चिन्तन है और एक भगवान्की तरफ चलनेका ही निश्चय है? उसके भीतरके भाव बहुत जल्दी शुद्ध हो जाते हैं। फिर उसके भीतर उत्पत्तिविनाशशील संसारिक वस्तुओंका सहारा नहीं रहता क्योंकि संसारका सहारा रखनेसे ही भाव अशुद्ध होते हैं।इत्येतत्तपो मानसमुच्यते -- इस प्रकार जिस तपमें मनकी मुख्यता होती है? वह मानस (मनसम्बन्धी) तप कहलाता है। सम्बन्ध -- अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें क्रमशः सात्त्विक? राजस और तामस तपका वर्णन करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

मनका प्रसाद अर्थात् मनकी परम शान्ति -- स्वच्छता सम्पादन कर लेना? सौम्यता -- जिसको सुमनसता कहते हैं वह मुखादिको प्रसन्न करनेवाली अन्तःकरणकी शुद्धवृत्ति? मौन -- अन्तःकरणका संयम? क्योंकि वाणीका संयम भी मनःसंयमपूर्वक ही होता है? अतः कार्यसे कारण कहा जाता है? मनका निरोध अर्थात् सब ओरसे साधारणभावसे मनका निग्रह और भली प्रकार भावकी शुद्धि अर्थात् दूसरोंके साथ व्यवहार करनेमें छलकपटसे रहित होना? यह मानसिक तप कहलाता है। केवल वाणीविषयक मनके संयमका नाम मौन है और सामान्यभावसे संयम करनेका नाम आत्मनिग्रह है -- यह भेद है।

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Sri Anandgiri

मानसं तपः संक्षिपति -- मन इति। प्रशान्तिफलमेव व्यनक्ति -- स्वच्छतेति। मनसः स्वाच्छ्यमनाकुलता। नैश्चिन्त्यमित्यर्थः। सौमनस्यं सर्वेभ्यो हितैषित्वमहिताचिन्तनं च। तत् कथं गम्यते तत्राह, -- मुखादीति। तस्य स्वरूपमाह -- अन्तःकरणस्येति। ननु मौनं वाङ्नियमनं वाङ्मये तपस्यन्तर्भवति तत्कथं मानसे तपसि व्यपदिश्यते तत्र वाचः संयमस्य कार्यत्वान्मनःसंयमस्य कारणत्वात् कार्येण कारणग्रहणान्मानसे तपसि मौनमुक्तमित्याह -- वागिति। यद्वा मौनं मुनिभावो मननमात्मनो मनसो विनिग्रहो निरोधः। नन्वेनं मौनस्य मनोनिग्रहस्य च मनःसंयमत्वेनैकत्वात्पौनरुक्त्यं नेत्याह -- सर्वत इति। भावस्य हृदयस्य संशुद्धी रागादिमलविकलतेति व्याचष्टे -- परैरिति। मानसं मनसा प्रधानेन निर्वर्त्यमित्यर्थः।

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Sri Dhanpati

एवं वाक्प्रधानं तप उक्त्वा मनःप्रधानं तदाह -- मनःप्रसादो मनसः शान्तिः स्वच्छतापदनं चिन्ताव्याकुलत्वादिहीनतासंपादनमितियावत्? सौम्यत्वं? सुखादिप्रसादकार्यगम्यं सौमनस्यं? मौनं वाक्यसंयमस्य मनसः संयमपूर्वकत्वात्। वाग्विषयो मनसः संयमो मौनं? सर्वतः समान्यरुपो मनोनिरोध आत्मविनिग्रह इति विशेषः। ननु मुनेर्भावो मौनमेकाग्रतया आत्मचिन्तनं निदिध्यासनाख्यमिति मौनशब्दार्थ आचार्यैः कुतो न दर्शित इतिचेत्त्वदुक्तमुनि भावस्य राजसत्वाद्यभावेन राजसतामसतपोभ्यामस्याग्रहणापत्तेरिति गृहाण। भावसंशुद्धिः परैर्व्यवहारकालेऽमायावित्त्वम्। यत्तु भावस्य हृदयस्य शुद्धिः कामक्रोधलोभादिमलनिवृत्तिः पुनरशुद्य्धुत्पादराहित्येन सम्यक्त्वेन विशिष्टा सा भावसंशुद्धिरित तन्नोपादेयमाचार्यैरनुक्तत्वात्। राजसे तामसे च तपस्येतादृशभावसंशुद्धेरसंभवाच्च इत्येतत्तपो मानसं मनसा प्रधानेन निर्वर्त्यमुच्यते।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
manaḥprasādaḥ
saumyatvamgentleness
maunamsilence
ātmavinigrahaḥ
bhāvasanśhuddhiḥ
itithus
etatthese
tapaḥausterity
mānasamof the mind
uchyateare declared as
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 17.15
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते

उद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 17.17
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्ित्रविधं नरैः।अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते

परम श्रद्धासे युक्त फलेच्छारहित मनुष्योंके द्वारा तीन प्रकार-(शरीर, वाणी और मन-) का तप किया जाता है, उसको सात्त्विक कहते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 17Shlok 16
Bhagavad Gita · Adhyay 17, Shlok 16
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते

मनकी प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मनका निग्रह और भावोंकी शुद्धि -- इस तरह यह मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ: "मनकी प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मनका निग्रह और भावोंकी शुद्धि -- इस तरह यह मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 16?

Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 16 translates to: "Serenity of mind, good-heartedness, self-control, and purity of nature—this is called mental austerity. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 17, श्लोक 16 है जो Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga में संकलित है। मनकी प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मनका निग्रह और भावोंकी शुद्धि -- इस तरह यह मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "manaḥ-prasādaḥ saumyatvaṁ maunam ātma-vinigrahaḥ" mean in English?

"manaḥ-prasādaḥ saumyatvaṁ maunam ātma-vinigrahaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 16. Serenity of mind, good-heartedness, self-control, and purity of nature—this is called mental austerity. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.