
“तेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं। — VaniSagar”
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उत्साह, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, द्वेषाचा अभाव, अभिमानाचा अभाव - हे अर्जुना, ईश्वरी स्थितीसाठी जन्मलेल्या व्यक्तीचे आहेत.
જોમ, ક્ષમા, મનોબળ, પવિત્રતા, દ્વેષની ગેરહાજરી, અભિમાનની ગેરહાજરી - આ એક દૈવી સ્થિતિ માટે જન્મેલા વ્યક્તિની છે, હે અર્જુન.
طاقت، بخشش، پختگي، پاڪيزگي، نفرت جي غير موجودگي، غرور جي غير موجودگي - اهي هڪ ديوي رياست لاء پيدا ٿيل آهن، اي ارجن.
வீரியம், மன்னிப்பு, துணிவு, தூய்மை, வெறுப்பின்மை, அகங்காரம் இல்லாமை - இவை தெய்வீக நிலைக்குப் பிறந்தவனுக்கே உரியன, அர்ஜுனா.
വീര്യം, ക്ഷമ, ധൈര്യം, പരിശുദ്ധി, വിദ്വേഷമില്ലായ്മ, അഹങ്കാരമില്ലായ്മ-ഇവ ഒരു ദൈവിക അവസ്ഥയ്ക്കായി ജനിച്ചവൻ്റേതാണ്, ഹേ അർജുനാ.
ਜੋਸ਼, ਖਿਮਾ, ਦ੍ਰਿੜਤਾ, ਸ਼ੁੱਧਤਾ, ਨਫ਼ਰਤ ਦੀ ਅਣਹੋਂਦ, ਹੰਕਾਰ ਦੀ ਅਣਹੋਂਦ - ਇਹ ਇੱਕ ਬ੍ਰਹਮ ਰਾਜ ਲਈ ਪੈਦਾ ਹੋਏ ਹਨ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ।
ఓజస్సు, క్షమాపణ, దృఢత్వం, స్వచ్ఛత, ద్వేషం లేకపోవడం, గర్వం లేకపోవడం-ఇవి దైవిక స్థితి కోసం జన్మించిన వ్యక్తికి చెందినవి, ఓ అర్జునా.
দৃঢ়তা, ক্ষমা, দৃঢ়তা, পবিত্রতা, ঘৃণার অনুপস্থিতি, অহংকার অনুপস্থিতি - এইগুলি ঐশ্বরিক অবস্থার জন্য জন্মগ্রহণকারীর জন্য, হে অর্জুন।
ಹುರುಪು, ಕ್ಷಮೆ, ಸ್ಥೈರ್ಯ, ಶುದ್ಧತೆ, ದ್ವೇಷದ ಕೊರತೆ, ಅಹಂಕಾರದ ಕೊರತೆ-ಇವುಗಳು ದೈವಿಕ ಸ್ಥಿತಿಗಾಗಿ ಹುಟ್ಟಿದವನಿಗೆ ಸೇರಿದ್ದು, ಓ ಅರ್ಜುನ.
ꯊꯧꯅꯥ, ꯊꯧꯖꯥꯜ, ꯊꯧꯅꯥ, ꯁꯦꯡꯂꯕꯥ, ꯌꯦꯛꯅꯕꯥ ꯂꯩꯇꯕꯥ, ꯆꯥꯎꯊꯣꯀꯆꯕꯥ ꯂꯩꯇꯕꯥ—ꯃꯁꯤꯁꯤꯡ ꯑꯁꯤ ꯏꯁ꯭ꯕꯔꯒꯤ ꯐꯤꯚꯝ ꯑꯃꯒꯤꯗꯃꯛ ꯄꯣꯀꯄꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯃꯒꯤꯅꯤ, ꯍꯦ ꯑꯔꯖꯨꯟ |
जोश, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, द्वेष के अभाव, अभिमान के अभाव—ई सब दिव्य अवस्था के लेल जन्मल व्यक्ति के अछि, हे अर्जुन।
जोश, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, नफरत दा अभाव, घमंड दा अभाव—एह् दिव्य अवस्था आस्तै पैदा होए दे न, हे अर्जुन।
Sacred Commentaries
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Swami Ramsukhdas
व्याख्या--'तेजः'--महापुरुषोंका सङ्ग मिलनेपर उनके प्रभावसे प्रभावित होकर साधारण पुरुष भी दुर्गुण-दुराचारोंका त्याग करके सद्गुण-सदाचारोंमें लग जाते हैं। महापुरुषोंकी उस शक्तिको ही यहाँ 'तेज' कहा है। ऐसे तो क्रोधी आदमीको देखकर भी लोगोंको उसके स्वभावके विरुद्ध काम करनेमें भय लगता है; परन्तु यह क्रोधरूप दोषका तेज है। साधकमें दैवी सम्पत्तिके गुण प्रकट होनेसे उसको देखकर दूसरे लोगोंके भीतर स्वाभाविक ही सौम्यभाव आते हैं अर्थात् उस साधकके सामने दूसरे लोग दुराचार करनेमें लज्जित होते हैं, हिचकते हैं और अनायास ही सद्भावपूर्वक सदाचार करने लग जाते हैं। यही उन दैवी-सम्पत्तिवालोंका तेज (प्रभाव) है। 'क्षमा'--बिना कारण अपराध करनेवालेको दण्ड देनेकी सामर्थ्य रहते हुए भी उसके अपराधको सह लेना और उसको माफ कर देना 'क्षमा' है। यह क्षमा मोह-ममता, भय और स्वार्थको लेकर भी की जाती है; जैसे--पुत्रके अपराध कर देनेपर पिता उसे 'क्षमा' कर देता है, तो यह क्षमा मोह-ममताको लेकर होनेसे शुद्ध नही है। इसी प्रकार किसी बलवान् एवं क्रूर व्यक्तिके द्वारा हमारा अपराध किये जानेपर हम भयवश उसके सामने कुछ नहीं बोलते, तो यह क्षमा भयको लेकर है। हमारी धन-सम्पत्तिकी जाँच-पड़ताल करनेके लिये इन्सपेक्टर आता है, तो वह हमें धमकाता है, अनुचित भी बोलता है और उसका ठहरना हमें बुरा भी लगता है तो भी स्वार्थ-हानिके भयसे हम उसके सामने कुछ नहीं बोलते, तो यह क्षमा स्वार्थको लेकर है। पर ऐसी क्षमा वास्तविक क्षमा नहीं है। वास्तविक क्षमा तो वही है, जिसमें 'हमारा अनिष्ट करनेवालेको यहाँ और परलोकमें भी किसी प्रकारका दण्ड न मिले' -- ऐसा भाव रहता है।क्षमा माँगना भी दो रीतिसे होता है --(1) हमने किसीका अपकार किया, तो उसका दण्ड हमें न मिले -- इस भयसे भी क्षमा माँगी जाती है; परन्तु इस क्षमामें स्वार्थका भाव रहनेसे यह ऊँचे दर्जेकी क्षमा नहीं है। (2) हमसे किसीका अपराध हुआ, तो अब यहाँसे आगे उम्रभर ऐसा अपराध फिर कभी नहीं करूँगा -- इस भावसे जो क्षमा माँगी जाती है, वह अपने सुधारकी दृष्टिको लेकर होती है और ऐसी क्षमा माँगनेसे ही मनुष्यकी उन्नति होती है। मनुष्य क्षमाको अपनेमें लाना चाहे तो कौन-सा उपाय करे? यदि मनुष्य अपने लिये किसीसे किसी प्रकारके सुखकी आशा न रखे और अपना अपकार करनेवालेका बुरा न चाहे? तो उसमें क्षमाभाव प्रकट हो जाता है। 'धृतिः'--किसी भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिमें विचलित न होकर अपनी स्थितिमें कायम रहनेकी शक्तिका नाम 'धृति' (धैर्य) है (गीता 18। 33)। वृत्तियाँ सात्त्विक होती हैं तो धैर्य ठीक रहता है और वृत्तियाँ राजसी-तामसी होती हैं तो धैर्य वैसा नहीं रहता। जैसे बद्रीनारायणके रास्तेपर चलनेवालेके लिये कभी गरमी, चढ़ाई आदि प्रतिकूलताएँ आती हैं और कभी ठण्डक, उतराई आदि अनुकूलताएँ आती हैं, पर चलनेवालेको उन प्रतिकूलताओं और अनूकूलताओंको देखकर ठहरना नहीं है, प्रत्युत 'हमें तो बद्रीनारायण पहुँचना है' -- इस उद्देश्यसे धैर्य और तत्परतापूर्वक चलते रहना है। ऐसे ही साधकको अच्छी-मन्दी वृत्तियों और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंकी ओर देखना ही नहीं चाहिये। इनमें उसे धीरज धारण करना चाहिये; क्योंकि जो अपना उद्देश्य सिद्ध करना चाहता है, वह मार्गमें आनेवाले सुख और दुःखको नहीं देखता-- मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम्।। (भर्तृहरिनीतिशतक) 'शौचम्'--बाह्यशुद्धि एवं अन्तःशुद्धिका नाम 'शौच' है । परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखनेवाला साधक बाह्यशुद्धिका भी खयाल रखता है; क्योंकि बाह्यशुद्धि रखनेसे अन्तःकरणकी शुद्धि स्वतः होती है और अन्तःकरण शुद्ध होनेपर बाह्य-अशुद्धि उसको सुहाती नहीं। इस विषयपर पतञ्जलि महाराजने कहा है -- शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः।(योगदर्शन 2। 40)'शौचसे साधककी अपने शरीरमें घृणा अर्थात् अपवित्र-बुद्धि और दूसरोंसे संसर्ग न करनेकी इच्छा होती है।' तात्पर्य यह है कि अपने शरीरको शुद्ध रखनेसे शरीरकी अपवित्रताका ज्ञान होता है। शरीरकी अपवित्रताका ज्ञान होनेसे सम्पूर्ण शरीर इसी तरहके हैं -- इसका बोध होता है। इस बोधसे दूसरे शरीरोंके प्रति जो आकर्षण होता है, उसका अभाव हो जाता है अर्थात् दूसरे शरीरोंसे सुख लेनेकी इच्छा मिट जाती है। बाह्यशुद्धि चार प्रकारसे होती है -- (1) शारीरिक (2) वाचिक, (3) कौटुम्बिक और (4) आर्थिक। (1) 'शारीरिक शुद्धि'--प्रमाद, आलस्य, आरामतलबी, स्वाद-शौकीनी आदिसे शरीर अशुद्ध हो जाता है और इनके विपरीत कार्य-तत्परता, पुरुषार्थ, उद्योग, सादगी आदि रखते हुए आवश्यक कार्य करनेपर शरीर शुद्ध हो जाता है। ऐसे ही जल, मृत्तिका आदिसे भी शारीरिक शुद्धि होती है। (2) 'वाचिक शुद्धि'--झूठ बोलने, कड़ुआ बोलने, वृक्षा बकवाद करने, निन्दा करने, चुगली करने आदिसे वाणी अशुद्ध हो जाती है। इन दोषोंसे रहित होकर सत्य, प्रिय एवं हितकारक आवश्यक वचन बोलना (जिससे दूसरोंकी पारमार्थिक उन्नति होती हो और देश, ग्राम, मोहल्ले, परिवार, कुटुम्ब आदिका हित होता हो) और अनावश्यक बात न करना -- यह वाणीकी शुद्धि है। (3) 'कौटुम्बिक शुद्धि'--अपने बाल-बच्चोंको अच्छी शिक्षा देना; जिससे उनका हित हो, वही आचरण करना; कुटुम्बियोंका हमपर जो न्याययुक्त अधिकार है, उसको अपनी शक्तिके अनुसार पूरा करना; कुटुम्बियोंमें किसीका पक्षपात न करके सबका समानरूपसे हित करना -- यह कौटुम्बिक शुद्धि है। (4) 'आर्थिक शुद्धि'--न्याययुक्त, सत्यतापूर्वक, दूसरोंके हितका बर्ताव करते हुए जिस धनका उपार्जन किया गया है, उसको यथाशक्ति, अरक्षित, अभावग्रस्त, दरिद्री, रोगी, अकालपीड़ित, भूखे आदि आवश्यकतावालोंको देनेसे एवं गौ, स्त्री, ब्राह्मणोंकी रक्षामें लगानेसे द्रव्यकी शुद्धि होती है।त्यागी-वैरागी-तपस्वी सन्त-महापुरुषोंकी सेवामें लगानेसे एवं सद्ग्रन्थोंको सरल भाषामें छपवाकर कम मूल्यमें देनेसे तथा उनका लोगोंमें प्रचार करनेसे धनकी महान् शुद्धि हो जाती है।परमात्मप्राप्तिका ही उद्देश्य हो जानेपर अपनी (स्वयंकी) शुद्धि हो जाती है। स्वयंकी शुद्धि होनेपर शरीर, वाणी, कुटुम्ब, धन आदि सभी शुद्ध एवं पवित्र होने लगते हैं। शरीर आदिके शुद्ध हो जानेसे वहाँका स्थान? वायुमण्डल आदि भी शुद्ध हो जाते हैं। बाह्यशुद्धि और पवित्रताका खयाल रखनेसे शरीरकी वास्तविकता अनुभवमें आ जाती है? जिससे शरीरसे अंहताममता छोड़नेमें सहायता मिलती है। इस प्रकार यह साधन भी परमात्मप्राप्तिमें निमित्त बनता है। 'अद्रोहः'--बिना कारण अनिष्ट करनेवालेके प्रति भी अन्तःकरणमें बदला लेनेकी भावनाका न होना 'अद्रोह' है। साधारण व्यक्तिका कोई अनिष्ट करता है, तो उसके मनमें अनिष्ट करनेवालेके प्रति द्वेषकी एक गाँठ बँध जाती है कि मौका पड़नेपर मैं इसका बदला ले ही लूँगा; किन्तु जिसका उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका है, उस साधकका कोई कितना ही अनिष्ट क्यों न करे, उसके मनमें अनिष्ट करनेवालेके प्रति बदला लेनेकी भावना ही पैदा नहीं होती। कारण कि कर्मयोगका साधक सबके हितके लिये कर्तव्य-कर्म करता है, ज्ञानयोगका साधक सबको अपना स्वरूप समझता है और भक्तियोगका साधक सबमें अपने इष्ट भगवान्को समझता है। अतः वह किसीके प्रति कैसे द्रोह कर सकता है।'निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध'।।(मानस 7। 112 ख) 'नातिमानिता'--एक 'मानिता' होती है और एक 'अतिमानिता' होती है। सामान्य व्यक्तियोंसे मान चाहना 'मानिता' है और जिनसे हमने शिक्षा प्राप्त की, जिनका आदर्श ग्रहण किया और ग्रहण करना चाहते हैं, उनसे भी अपना मान, आदर-सत्कार चाहना 'अतिमानिता' है। इन मानिता और अतिमानिताका न होना 'नातिमानिता' है।स्थूल दृष्टिसे मानिता के दो भेद होते हैं -- (1) 'सांसारिक मानिता'--धन, विद्या, गुण, बुद्धि, योग्यता, अधिकार, पद, वर्ण, आश्रम आदिको लेकर दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें एक श्रेष्ठताका भाव होता है कि 'मैं साधारण मनुष्योंकी तरह थोड़े ही हूँ, मेरा कितने लोग आदरसत्कार करते हैं! वे आदर करते हैं तो यह ठीक ही है; क्योंकि मैं आदर पानेयोग्य ही हूँ' -- इस प्रकार अपने प्रति जो मान्यता होती है, वह सांसारिक मानिता कहलाती है। (2) 'पारमार्थिक मानिता'--प्रारम्भिक साधनकालमें जब अपनेमें कुछ दैवी-सम्पत्ति प्रकट होने लगती है, तब साधकको दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें कुछ विशेषता दीखती है। साथ ही दूसरे लोग भी उसे परमात्माकी ओर चलनेवाला साधक मानकर उसका विशेष आदर करते हैं और साथ-ही-साथ 'ये साधन करनेवाले हैं, अच्छे सज्जन हैं' -- ऐसी प्रशंसा भी करते हैं। इससे साधकको अपनेमें विशेषता मालूम देती है, पर वास्तवमें यह विशेषता अपने साधनमें कमी होनेके कारण ही दीखती है। यह विशेषता दीखना पारमार्थिक मानिता है। जबतक अपनेमें व्यक्तित्व (एकदेशीयता, परिछिन्नता) रहता है, तभीतक अपनेमें दूसरोंकी अपेक्षा विशेषता दिखायी दिया करती है। परन्तु ज्यों-ज्यों व्यक्तित्व मिटता चला जाता है, त्यों-ही-त्यों साधकका दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषताका भाव मिटता चला जाता है। अन्तमें इन सभी मानिताओंका अभाव होकर साधकमें दैवी-सम्पत्तिका गुण 'नातिमानिता' प्रकट हो जाती है।दैवीसम्पत्तिके जितने सद्गुण-सदाचार हैं, उनको पूर्णतया जाग्रत् करनेका उद्देश्य तो साधकका होना ही चाहिये। हाँ, प्रकृति-(स्वभाव-) की भिन्नतासे किसीमें किसी गुणकी कमी, तो किसीमें किसी गुणकी कमी रह सकती है। परन्तु वह कमी साधकके मनमें खटकती रहती है और वह प्रभुका आश्रय लेकर अपने साधनको तत्परतासे करते रहता है; अतः भगवत्कृपासे वह कमी मिटती जाती है। कमी ज्यों-ज्यों मिटती जाती है, त्यों-त्यों उत्साह और उस कमीके उत्तरोत्तर मिटनेकी सम्भावना भी बढ़ती जाती है। इससे दुर्गुण-दुराचार सर्वथा नष्ट होकर सद्गुण-सदाचार अर्थात् दैवी-सम्पत्ति प्रकट हो जाती है। 'भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत'--भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! ये सभी दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त हुए मनुष्योंके लक्षण हैं। परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य होनेपर ये दैवी-सम्पत्तिके लक्षण साधकमें स्वाभाविक ही आने लगते हैं। कुछ लक्षण पूर्वजन्मोंके संस्कारोंसे भी जाग्रत् होते हैं। परन्तु साधक इन गुणोंको अपने नहीं मानता और न उनको अपने पुरुषार्थसे उपार्जित ही मानता है, प्रत्युत गुणोंके आनेमें वह भगवान्की ही कृपा मानता है। कभी खयाल करनेपर साधकके मनमें ऐसा विचार होता है कि मेरेमें पहले तो ऐसी वृत्तियाँ नहीं थीं, ऐसे सद्गुण नहीं थे, फिर ये कहाँसे आ गये? तो ये सब भगवान्की कृपासे ही आये हैं -- ऐसा अनुभव होनेसे उस साधकको दैवी-सम्पत्तिका अभिमान नहीं आता। साधकको दैवी-सम्पत्तिके गुणोंको अपने नहीं मानना चाहिये; क्योंकि यह देव -- परमात्माकी सम्पत्ति है, व्यक्तिगत (अपनी) किसीकी नहीं है। यदि व्यक्तिगत होती, तो यह अपनेमें ही रहती, किसी अन्य व्यक्तिकी नहीं रहती। इसको व्यक्तिगत माननेसे ही अभिमान आता है। अभिमान आसुरी-सम्पत्तिका मुख्य लक्षण है। अभिमानकी छायामें ही आसुरी-सम्पत्तिका मुख्य लक्षण है। अभिमानकी छायामें ही आसुरी-सम्पत्तिके सभी अवगुण रहते हैं। यदि दैवी-सम्पत्तिसे आसुरी-सम्पत्ति (अभिमान) पैदा हो जाय, तो फिर आसुरीसम्पत्ति कभी मिटेगी ही नहीं। परन्तु दैवी-सम्पत्तिसे आसुरी-सम्पत्ति कभी पैदा नहीं होती, प्रत्युत दैवी-सम्पत्तिके गुणोंके साथसाथ आसुरीसम्पत्तिके जो अवगुण रहते हैं, उनसे ही गुणोंका अभिमान पैदा होता है अर्थात् साधनके साथ कुछ-कुछ असाधन रहनेसे ही अभिमान आदि दोष पैदा होते हैं। जैसे, किसीको सत्य बोलनेका अभिमान होता है, तो उसके मूलमें वह सत्यके साथ-साथ असत्य भी बोलता है, जिसके कारण सत्यका अभिमान आता है। तात्पर्य यह है कि दैवी-सम्पत्तिके गुणोंको अपना माननेसे एवं गुणोंके साथ अवगुण रहनेसे ही अभिमान आता है। सर्वथा गुण आनेपर गुणोंका अभिमान हो ही नहीं सकता। यहाँ दैवी-सम्पत्ति कहनेका तात्पर्य है कि यह भगवान्की सम्पत्ति है। अतः भगवान्का सम्बन्ध होनेसे, उनका आश्रय लेनेसे शरणागत भक्तमें यह स्वाभाविक ही आती है। जैसे शबरीके प्रसङ्गमें रामजीने कहा है --, नवधा भगति कहउँ तोहिं पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।। नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई।। सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें।।
Sri Harikrishnadas Goenka
तथा --, तेज प्रागल्भ्य ( तेजस्विता )? चमड़ीकी चमक नहीं। क्षमा -- गाली दी जाने या ताड़ना दी जानेपर भी अन्तःकरणमें विकार उत्पन्न न होना। उत्पन्न हुए विकारको शान्ति कर देना तो पहले अक्रोधके नामसे कह चुके हैं। क्षमा और अक्रोधका इतना ही भेद है। धृति शरीर और इन्द्रियादिमें थकावट उत्पन्न होनेपर? उस थकावटको हटानेवाली जो अन्तःकरणकी वृत्ति है? उसका नाम धृति है? जिसके द्वारा उत्साहित की हुई इन्द्रियाँ और शरीर कार्यमें नहीं थकते। शौच दो प्रकारकी शुद्धि? अर्थात् मिट्टी और जल आदिसे बाहरकी शुद्धि? एवं कपट और रागादिकी कालिमाका अभाव होकर मनबुद्धिकी निर्मलतारूप भीतरकी शुद्धि? इस प्रकार दो तरह की शुद्धि। अद्रोह -- दूसरेका घात करनेकी इच्छाका अभाव? यानी हिंसा न करना। अतिमानिताका अभाव अत्यन्त मानका नाम अतिमान है? वह जिसमें हो वह अतिमानी है? उसका भाव अतिमानिता है? उसका जो अभाव है वह नातिमानिता है? अर्थात् अपनेमें अतिशय पूज्य भावनाका न होना। हे भारत अभय से लेकर यहाँतकके ये सब लक्षण? सम्पत्तियुक्त उत्पन्न हुए पुरुषमें होते हैं। कैसी सम्पत्तिसे युक्त पुरुषमें होते हैं जो दैवी सम्पत्तिको साथ लेकर उत्पन्न हुआ है? अर्थात् जो देवताओंकी विभूतिका योग्य पात्र है और भविष्यमें जिसका कल्याण होना निश्चित है? उस पुरुषके ये लक्षण होते हैं।
Sri Anandgiri
दैवीं संपदं प्राप्तस्य विशेषणान्तराण्यपि सन्तीत्याह -- किञ्चेति। व्यावर्त्यं कीर्तयति -- नेति। अध्यात्माधिकारादिति शेषः। क्षमाक्रोधयोरेकार्थत्वेन पौनरुक्त्यमाशङ्क्य परिहरति -- उत्पन्नायामिति। तयोरेवं विशेषादपौनरुक्त्यं फलतीत्याह -- इत्थमिति। वृत्तिविशेषमेव विशदयति -- येनेति। शौचस्य द्वैविध्यमेव प्रकटयति -- मृज्जलेत्यादिना। नैर्मल्यमेव स्फोरयति -- मायेति। उक्तमुपसंहरति -- एवमिति। अतिमानित्वाभावमेव व्यनक्ति -- आत्मन इति। कस्यैतानि विशेषणानीत्यपेक्षायामाह -- भवन्तीति। साधकस्य मनुष्यदेहस्थस्यैव कथं दैवीं संपदमभिलक्ष्य जातत्वमित्याशङ्क्याह -- दैवीति।
Sri Dhanpati
किंच तेजः प्रागल्भ्यं मूढैरभिभवितुमशक्यत्वम्। सत्यपि विक्रियाकारणाक्रोशादौ विक्रियानुत्पत्तिः क्षमा। उत्पन्नाया विक्रियाया उपशमनक्रोध मूढैरभिभवितुमशक्यत्वम्। सत्यपि विक्रियाकारणाक्रोशादौ विक्रियानुत्पत्तिः क्षमा। उत्पन्नाया विक्रियाया उपशमनक्रोध इत्यक्रोधेनापौनरुक्त्यम्। धृतिर्धैर्यमन्तःकरणस्य वृत्तिविशेषो येनोत्तम्भितानि करणानि देहश्चावसादकारणे सत्यपि नावसीदति। शौचं द्विविधं बाह्यमाभ्यन्तरं च मृज्जलाभ्यां कृतं बाह्यं मायारागादिकालुष्याभावेन मनोबुद्य्धोर्नैर्मल्यमाभ्यन्तरम्। स्वाध्यायादिवद्वाह्यशोचस्यापि सात्त्विकवासनाधीनत्वेन बाह्यं शौचमत्र न ग्राह्यं तस्य शरीरशुद्धिरुपतया बाह्यत्वेनान्तःकरणवासनाशोधकत्वाभावादिति प्रत्युक्तम्। परिजिघांसाभावोऽद्रोहः। आत्मनः पूज्यतातिशयभावनाऽतिमानिता तदभावो नातिमानिता। एतान्यभयादीनि एतदन्तानि सात्त्विकीं सत्त्वप्रधानां दैवीं देवानां संपदमभिलक्ष्य जातस्य दैवीविभूत्यर्हस्य भाविकल्याणस्य भवन्ति। त्वमपि उत्तमवंशोद्भवत्वाद्दैवीं संपदमभिलक्ष्य जातोऽसीति सूचयन्नाह भारतेति।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| tejaḥ | vigor |
| kṣhamā | forgiveness |
| dhṛitiḥ | fortitude |
| śhaucham | cleanliness |
| adrohaḥ | bearing enmity toward none |
| na | not |
| ati | mānitā |
| bhavanti | are |
| sampadam | qualities |
| daivīm | godly |
| abhijātasya | of those endowed with |
| bhārata | scion of Bharat |
Related Shloks
अहिंसा, सत्यभाषण; क्रोध न करना; संसारकी कामनाका त्याग; अन्तःकरणमें राग-द्वेषजनित हलचलका न होना; चुगली न करना; प्राणियोंपर दया करना सांसारिक विषयोंमें न ललचाना; अन्तःकरणकी कोमलता; अकर्तव्य करनेमें लज्जा; चपलताका अभाव। — VaniSagar
हे पृथानन्दन ! दम्भ करना, घमण्ड करना, अभिमान करना, क्रोध करना, कठोरता रखना और अविवेकका होना भी -- ये सभी आसुरीसम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं। — VaniSagar
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“तेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 16 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 16 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ: "तेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Daivaasura-Sampad-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 3?
Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 3 translates to: "Vigor, forgiveness, fortitude, purity, absence of hatred, absence of pride—these belong to one born for a divine state, O Arjuna. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 16, श्लोक 3 है जो Bhagavad Gita के Daivaasura-Sampad-Vibhaga Yoga में संकलित है। तेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "tejaḥ kṣhamā dhṛitiḥ śhaucham adroho nāti-mānitā" mean in English?
"tejaḥ kṣhamā dhṛitiḥ śhaucham adroho nāti-mānitā" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 3. Vigor, forgiveness, fortitude, purity, absence of hatred, absence of pride—these belong to one born for a divine state, O Arjuna. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.