Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 16, Shlok 23
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्

जो मनुष्य शास्त्रविधिको छोड़कर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को, न सुखको और न परमगतिको ही प्राप्त होता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

BengaliIND

যে ব্যক্তি শাস্ত্রের বিধি-বিধান বর্জন করে, কামনার প্ররোচনায় কাজ করে, সে পরিপূর্ণতা, সুখ বা পরম লক্ষ্য অর্জন করে না।

MarathiIND

जो धर्मग्रंथांचे नियम बाजूला सारून, इच्छेच्या आवेगाखाली कार्य करतो, त्याला परिपूर्णता, आनंद किंवा सर्वोच्च ध्येय प्राप्त होत नाही.

PunjabiIND

ਜੋ ਧਰਮ ਗ੍ਰੰਥਾਂ ਦੇ ਨਿਯਮਾਂ ਨੂੰ ਛੱਡ ਕੇ, ਇੱਛਾ ਦੇ ਪ੍ਰਭਾਵ ਅਧੀਨ ਕੰਮ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਨਾ ਸੰਪੂਰਨਤਾ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਨਾ ਸੁਖ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਪਰਮ ਟੀਚਾ।

KannadaIND

ಯಾರು, ಶಾಸ್ತ್ರಗಳ ಕಟ್ಟಳೆಗಳನ್ನು ಬದಿಗಿಟ್ಟು, ಬಯಕೆಯ ಪ್ರಚೋದನೆಯ ಅಡಿಯಲ್ಲಿ ಕಾರ್ಯನಿರ್ವಹಿಸುತ್ತಾರೆ, ಅವರು ಪರಿಪೂರ್ಣತೆಯನ್ನು ಪಡೆಯುವುದಿಲ್ಲ, ಅಥವಾ ಸಂತೋಷವನ್ನು ಅಥವಾ ಪರಮೋದ್ದೇಶವನ್ನು ಪಡೆಯುವುದಿಲ್ಲ.

SindhiIND

جيڪو، صحيفن جي حڪمن کي ڇڏي، خواهش جي جذبي تحت عمل ڪري ٿو، نه ڪمال حاصل ڪري ٿو، نه خوشي، نه اعلي مقصد.

TamilIND

வேதத்தின் விதிகளை ஒதுக்கிவிட்டு, ஆசையின் தூண்டுதலின் கீழ் செயல்படுபவர், பூரணத்துவத்தையோ, மகிழ்ச்சியையோ, உயர்ந்த இலக்கையோ அடைவதில்லை.

TeluguIND

లేఖనాల శాసనాలను పక్కనపెట్టి, కోరికల ప్రేరణతో పని చేసేవాడు పరిపూర్ణతను, ఆనందాన్ని లేదా ఉన్నతమైన లక్ష్యాన్ని పొందలేడు.

MalayalamIND

ഗ്രന്ഥങ്ങളുടെ കൽപ്പനകൾ ഉപേക്ഷിച്ച്, ആഗ്രഹത്തിൻ്റെ പ്രേരണയിൽ പ്രവർത്തിക്കുന്നവൻ പൂർണതയോ സന്തോഷമോ പരമോന്നത ലക്ഷ്യമോ നേടുന്നില്ല.

NepaliIND

जसले शास्त्रको नियमलाई त्यागेर कामनाको आवेगमा काम गर्छ, उसले न पूर्णता प्राप्त गर्छ, न सुख, न सर्वोच्च लक्ष्य।

GujaratiIND

જે શાસ્ત્રોના નિયમોને બાજુ પર મૂકીને, ઇચ્છાના આવેગ હેઠળ કાર્ય કરે છે, તે પૂર્ણતા, સુખ કે પરમ ધ્યેયને પામતો નથી.

DogriIND

जो शास्त्रां दे नियमां नूं इक पासे कर के कामना दे आवेग विच कम्म करदा है, ओह सिद्धता नहीं पांदा, ना सुख, ना परम लक्ष्य।

MizoIND

Pathian Lehkha Thu-a thupekte chu paih bovin, duhna rilru pu chunga thil titu chuan famkimna a nei lo va, hlimna pawh a thleng lo va, Tum sang ber pawh a thleng lo.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते -- जो लोग शास्त्रविधिकी अवहेलना करके शास्त्रविहित यज्ञ करते हैं? दान करते हैं? परोपकार करते हैं? दुनियाके लाभके लिये तरहतरहके कई अच्छेअच्छे काम करते हैं परन्तु वह सब करते हैं -- कामकारतः अर्थात् शास्त्रविधिकी तरफ ध्यान न देकर अपने मनमाने ढङ्गसे करते हैं। मनमाने ढङ्गसे करनेमें कारण यह है कि उनके भीतर जो काम? क्रोध आदि पड़े रहते हैं? उनकी परवाह न करके वे बाहरी आचरणोंसे ही अपनेको बड़ा मानते हैं। तात्पर्य है कि वे बाहरके आचरणोंको ही श्रेष्ठ समझते हैं। दूसरे लोग भी बाहरके आचरणोंको ही विशेषतासे देखते हैं। भीतरके भावोंको? सिद्धान्तोंको जाननेवाले लोग बहुत कम होते हैं। परन्तु वास्तवमें भीतरके भावोंका ही विशेष महत्त्व है।अगर भीतरमें दुर्गुणदुर्भाव रहते हैं और बाहरसे बड़े भारी त्यागीतपस्वी बन जाते हैं? तो अभिमानमें आकर दूसरोंकी ताड़ना कर देते हैं। इस प्रकार भीतरमें ब़ढ़े हुए देहाभिमानके कारण उनके गुण भी दोषमें परिणत हो जाते हैं? उनकी महिमा निन्दामें परिणत हो जाती है? उनका त्याग रागमें? आसक्तिमें? भोगोंमें परिणत हो जाता है और आगे चलकर वे पतनमें चले जाते हैं। इसलिये भीतरमें दोषोंके रहनेसे ही वे शास्त्रविधिका त्याग करके मनमाने ढङ्गसे आचरण करते हैं।जैसे रोगी अपनी दृष्टिसे तो कुपथ्यका त्याग और पथ्यका सेवन करता है? पर वह आसक्तिवश कुपथ्य ले लेता है? जिससे उसका स्वास्थ्य और अधिक खराब हो जाता है। ऐसे ही वे लोग अपनी दृष्टिसे अच्छेअच्छे काम करते हैं? पर भीतरमें काम? क्रोध और लोभका आवेश रहनेसे वे शास्त्रविधिकी अवहेलना करके मनमाने ढङ्गसे काम करने लग जाते हैं? जिससे वे अधोगतिमें चले जाते हैं।न स सिद्धिमवाप्नोति -- आसुरीसम्पदावाले जो लोग शास्त्रविधिका त्याग करके यज्ञ आदि शुभ कर्म करते हैं? उनको धन? मान? आदर आदिके रूपमें कुछ प्रसिद्धिरूप सिद्धि मिल सकती है? पर वास्तवमें अन्तःकरणकी शुद्धिरूप जो सिद्धि है? वह उनको नहीं मिलती।न सुखम् -- उनको सुख भी नहीं मिलता क्योंकि उनके भीतरमें कामक्रोधादिकी जलन बनी रहती है। पदार्थोंके संयोगसे होनेवाला सुख उन्हें मिल सकता है? पर वह सुखदुःखोंका कारण ही है अर्थात् उससे दुःखहीदुःख पैदा होते हैं (गीता 5। 22)। तात्पर्य यह है कि पारमार्थिक मार्गमें मिलनेवला सात्त्विक सुख उनको नहीं मिलता।न परां गतिम् -- उनको परमगति भी नहीं मिलती। परमगति मिले ही कैसे पहले तो वे परमगतिको मानते ही नहीं और यदि मानते भी हैं? तो भी वह उनको मिल नहीं सकती क्योंकि काम? क्रोध और लोभके कारण उनके कर्म ही ऐसे होते हैं।सिद्धि? सुख और परमगतिके न मिलनेका तात्पर्य यह है कि वे आचरण तो श्रेष्ठ करते हैं? जिससे उन्हें सिद्धि? सुख और परमगतिकी प्राप्ति हो सके परन्तु भीतरमें काम? क्रोध? लोभ? अभिमान आदि रहनेसे उनके अच्छे आचरण भी बुराईमें ही चले जाते हैं। इससे उनको उपर्युक्त चीजें नहीं मिलतीं। यदि ऐसा मान लिया जाय कि उनके आचरण ही बुरे होते हैं? तो भगवान्का न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् -- ऐसा कहना बनेगा ही नहीं क्योंकि प्राप्ति होनेपर ही निषेध होता है -- प्राप्तौ सत्यां निषेधः। सम्बन्ध -- शास्त्रविधिका त्याग करनेसे मनुष्यको सिद्धि आदिकी प्राप्ति नहीं होती? इसलिये मनुष्यको क्या करना चाहिये -- इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इस समस्त आसुरी सम्पत्तिके त्यागका और कल्याणमय आचरणोंका? मूल कारण शास्त्र है? शास्त्रप्रमाणसे ही दोनों किये जा सकते हैं? अन्यथा नहीं? अतः --, जो मनुष्य शास्त्रके विधानको? अर्थात् कर्तव्यअकर्तव्यके ज्ञानका कारण जो विधिनिषेधबोधक आदेश है उसको? छोड़कर कामनासे प्रयुक्त हुआ बर्तता है? वह न तो सिद्धिको -- पुरुषार्थकी योग्यताको पाता है? न इस लोकमें सुख पाता है और न परम गतिको अर्थात् स्वर्ग या मोक्षको ही पाता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

आसुर्याः संपदो वर्जने श्रेयसश्च करणे किं कारणं तदाह -- सर्वस्येति। तस्य कारणत्वं साधयति -- शास्त्रेति। उक्तमुपजीव्यानन्तरश्लोकं प्रवर्तयति -- अत इति। शिष्यतेऽनुशिष्यते बोध्यतेऽनेनापूर्वोऽर्थ इति शास्त्रं तच्च विधिनिषेधात्मकमित्युपेत्य व्याचष्टे -- कर्तव्येति। कामस्य करणं कामकारस्तस्माद्धेतोरित्युपेत्य कामाधीना शास्त्रविमुखस्य प्रवृत्तिरित्याह -- कामेति। कामाधीनप्रवृत्तेः सदा पुमर्थायोग्यस्य सर्वपुरुषार्थासिद्धिरित्याह -- नापीति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

आसुर्याः संपदः परिवर्जनस्य श्रेयआचरणस्य च किं कारणमित्यपेक्षायामुभयं शास्त्रप्रमाणाच्छक्यं कर्तुं नान्यथाऽत उभयोः शास्त्रं कारणमिति बोधयितुं शास्त्रविधित्यागेऽनर्थमाह -- य इति। शिष्यतेऽनुशिष्यते बोध्यतेऽनेनाज्ञातोऽर्थ इति शास्त्रं वेदस्तदुपजीविस्मृतीतिहासपुराणादि च तस्य विधिः कुर्यान्न कुर्यादिति कर्तव्याकर्तव्यज्ञानकारणं शास्त्र संबन्धिविधिनिषेधाख्यस्तं यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य विहाय कामकारतः स्वेच्छानुसारेण वर्तते कामस्य करणं कामकारस्तस्माद्वेतोः शास्त्रविधिमुत्सृत्येति वा संबन्धः। संसिद्धिं पुरुषार्थयोग्यतां चित्तशुद्य्धादिलक्षणआं नावप्नोति नास्िमँल्लोके सुखं नापि परां प्रकृष्टां गतिं स्वर्गं मोक्षं चाप्नोति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yaḥwho
śhāstravidhim
utsṛijyadiscarding
vartateact
kāmakārataḥ
naneither
saḥthey
siddhimperfection
avāpnotiattain
nanor
sukhamhappiness
nanor
parāmthe supreme
gatimgoal
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 16.22
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्

हे कुन्तीनन्दन ! इन नरकके तीनों दरवाजोंसे रहित हुआ जो मनुष्य अपने कल्याणका आचरण करता है, वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 16.24
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि

अतः तेरे लिये कर्तव्य-अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है -- ऐसा जानकर तू इस लोकमें शास्त्र-विधिसे नियत कर्तव्य कर्म करनेयोग्य है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 16Shlok 23
Bhagavad Gita · Adhyay 16, Shlok 23
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्

जो मनुष्य शास्त्रविधिको छोड़कर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को, न सुखको और न परमगतिको ही प्राप्त होता है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 16 श्लोक 23 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 16 श्लोक 23 का हिंदी अर्थ: "जो मनुष्य शास्त्रविधिको छोड़कर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को, न सुखको और न परमगतिको ही प्राप्त होता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Daivaasura-Sampad-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 23?

Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 23 translates to: "He who, having cast aside the ordinances of the scriptures, acts under the impulse of desire, does not attain perfection, nor happiness, nor the Supreme Goal. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 16, श्लोक 23 है जो Bhagavad Gita के Daivaasura-Sampad-Vibhaga Yoga में संकलित है। जो मनुष्य शास्त्रविधिको छोड़कर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को, न सुखको और न परमगतिको ही प्राप्त होता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yaḥ śhāstra-vidhim utsṛijya vartate kāma-kārataḥ" mean in English?

"yaḥ śhāstra-vidhim utsṛijya vartate kāma-kārataḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 23. He who, having cast aside the ordinances of the scriptures, acts under the impulse of desire, does not attain perfection, nor happiness, nor the Supreme Goal. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.