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Sudarshana Chakra
Adhyay 16, Shlok 18
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः

वे अहङ्कार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोधका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने और दूसरोंके शरीरमें रहनेवाले मुझ अन्तर्यामीके साथ द्वेष करते हैं तथा (मेरे और दूसरोंके गुणोंमें) दोष-दृष्टि रखते हैं। — VaniSagar

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MarathiIND

अहंकार, सामर्थ्य, अहंकार, वासना आणि क्रोध यांच्या स्वाधीन झालेले हे द्वेषी लोक स्वतःच्या शरीरात आणि इतरांच्या शरीरात माझा द्वेष करतात.

BengaliIND

অহংকার, ক্ষমতা, অহংকার, লালসা এবং ক্রোধের কাছে পতিত হয়ে, এই দূষিত লোকেরা তাদের নিজের দেহে এবং অন্যের দেহে আমাকে ঘৃণা করে।

TamilIND

அகங்காரம், அதிகாரம், அகங்காரம், காமம், கோபம் ஆகியவற்றால் இந்த தீய குணம் கொண்டவர்கள் தங்கள் உடலிலும் மற்றவர்களின் உடலிலும் என்னை வெறுக்கிறார்கள்.

NepaliIND

अहंकार, शक्ति, अहङ्कार, काम, र क्रोधको अधीनमा परेका यी दुष्ट मानिसहरूले मलाई आफ्नो शरीरमा र अरूको शरीरमा घृणा गर्छन्।

GujaratiIND

અહંકાર, શક્તિ, અભિમાની, વાસના અને ક્રોધને વશ થઈને, આ દૂષિત લોકો તેમના પોતાના શરીરમાં અને અન્યના શરીરમાં મારો દ્વેષ કરે છે.

TeluguIND

అహంభావం, అధికారం, అహంకారం, కామం మరియు కోపం కారణంగా, ఈ దుర్మార్గులు తమ శరీరాల్లో మరియు ఇతరుల శరీరంలో నన్ను ద్వేషిస్తారు.

PunjabiIND

ਹੰਕਾਰ, ਸ਼ਕਤੀ, ਹੰਕਾਰ, ਕਾਮ ਅਤੇ ਕ੍ਰੋਧ ਦੇ ਅਧੀਨ ਹੋ ਕੇ, ਇਹ ਭੈੜੇ ਲੋਕ ਮੈਨੂੰ ਆਪਣੇ ਸਰੀਰਾਂ ਵਿੱਚ ਅਤੇ ਦੂਜਿਆਂ ਦੇ ਸਰੀਰਾਂ ਵਿੱਚ ਨਫ਼ਰਤ ਕਰਦੇ ਹਨ।

MalayalamIND

അഹംഭാവം, അധികാരം, അഹങ്കാരം, കാമം, ക്രോധം എന്നിവയ്ക്ക് വിധേയരായ ഈ ദുഷ്ടന്മാർ സ്വന്തം ശരീരത്തിലും മറ്റുള്ളവരുടെ ശരീരത്തിലും എന്നെ വെറുക്കുന്നു.

KannadaIND

ಅಹಂಕಾರ, ಅಧಿಕಾರ, ಅಹಂಕಾರ, ಕಾಮ ಮತ್ತು ಕ್ರೋಧಕ್ಕೆ ಒಳಗಾಗಿರುವ ಈ ದುರುದ್ದೇಶಪೂರಿತ ಜನರು ತಮ್ಮ ದೇಹದಲ್ಲಿ ಮತ್ತು ಇತರರ ದೇಹದಲ್ಲಿ ನನ್ನನ್ನು ದ್ವೇಷಿಸುತ್ತಾರೆ.

SindhiIND

انا پرستي، طاقت، هٺ، حوس ۽ غضب جي حوالي ڪري، هي بدڪار ماڻهو پنهنجي جسمن ۽ ٻين جي جسمن ۾ مون کان نفرت ڪن ٿا.

MaithiliIND

अहंकार, शक्ति, अहंकार, काम, आ क्रोध के समर्पित ई दुर्भावनापूर्ण लोक हमरा स अपन शरीर में आ दोसर के शरीर में घृणा करैत अछि |

BhojpuriIND

अहंकार, शक्ति, अहंकार, कामवासना आ क्रोध के सौंप के ई दुर्भावनापूर्ण लोग हमरा से अपना शरीर में आ दोसरा के देह में नफरत करेला.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः -- वे आसुर मनुष्य जो कुछ काम करेंगे? उसको अहङ्कार? हठ? घमण्ड? काम और क्रोधसे करेंगे। जैसे भक्त भगवान्के आश्रित रहता है? ऐसे ही वे आसुर लोग अहंकार? हठ? काम? आदिके आश्रित रहते हैं। उनके मनमें यह बात अच्छी तरहसे जँची हुई रहती है कि अहङ्कार? हठ? घमण्ड? कामना और क्रोधके बिना काम नहीं चलेगा संसारमें ऐसा होनेसे ही काम चलता है? नहीं तो मनुष्योंको दुःख ही पाना पड़ता है जो इनका (अहङ्कार? हठ आदिका) आश्रय नहीं लेते? वे बुरी तरहसे कुचले जाते हैं सीधेसादे व्यक्तिको संसारमें कौन मानेगा इसलिये अहंकारादिके रहनेसे ही अपना मान होगा? सत्कार होगा और लोगोंमें नाम होगा? जिससे लोगोंपर हमारा दबाव? आधिपत्य रहेगा।मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तः -- भगवान् कहते हैं कि मैं जो उनके शरीरमें और दूसरोंके शरीरमें रहता हूँ? उस मेरे साथ वे आसुर मनुष्य वैर रखते हैं। भगवान्के साथ वैर रखना क्या है -- श्रुतिस्मृति ममैवाज्ञे य उल्लङ्घ्य प्रवर्तते। आज्ञाभङ्गी मम द्वेषी नरके पतति ध्रुवम्।।श्रुति और स्मृति -- ये दोनों मेरी आज्ञाएँ हैं। इनका उल्लङ्घन करके जो मनमाने ढंगसे बर्ताव करता है? वह मेरी आज्ञाभङ्ग करके मेरे साथ द्वेष रखनेवाला मनुष्य निश्चित ही नरकोंमें गिरता है। वे अपने अन्तःकरणमें विराजमान परमात्माके साथ भी विरोध करते हैं अर्थात् हृदयमें जो अच्छी स्फुरणाएँ होती हैं? सिद्धान्तकी अच्छी बातें आती हैं? उनकी वे उपेक्षातिरस्कार करते हैं? उनको मानते नहीं। वे दूसरे लोगोंकी अवज्ञा करते हैं? उनका तिरस्कार करते हैं? अपमान करते हैं? उनको दुःख देते हैं? उनसे अच्छी तरहसे द्वेष रखते हैं। यह सब उन प्राणियोंके रूपमें भगवान्के साथ द्वेष करना है।अभ्यसूयकाः -- वे मेरे और दूसरोंके गुणोंमें दोषदृष्टि रखते हैं। मेरे विषयमें वे कहते हैं कि भगवान् बड़े पक्षपाती हैं वे भक्तोंकी तो रक्षा करते हैं और दूसरोंका विनाश करते हैं? यह बात बढ़िया नहीं है। आजतक जितने संतमहात्मा हुए हैं और अभी भी जो संतमहात्मा तथा अच्छी स्थितिवाले साधक हैं? उनके विषयमें वे आसुर लोग कहते हैं कि उनमें भी रागद्वेष? कामक्रोध? स्वार्थ? दिखावटीपन आदि दोष पाये जाते हैं किसी भी संतमहात्माका चरित्र ऐसा नहीं है? जिसमें ये दोष न आये हों अतः यह सब पाखण्ड है हमने भी इन सब बातोंको करके देखा है हमने भी संयम किया है? भजन किया है? व्रत किये हैं? तीर्थ किये हैं? पर वास्तवमें इनमें कोई दम नहीं है हमें तो कुछ नहीं मिला? मुफ्तमें ही दुःख पाया उनके करनेमें वह समय हमारा व्यर्थमें ही बरबाद हुआ है वे लोग भी किसीके बहकावेमें आकर अपना समय बरबाद कर रहे हैं अभी ये ऐसे प्रवाहमें बहे हुए हैं और उलटे रास्तेपर जा रहे हैं अभी इनको होश नहीं है? पर जब कभी चेतेंगे? तब उनको भी पता लगेगा आदिआदि।

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Sri Harikrishnadas Goenka

अहंकार -- हमहम करनेका नाम अहंकार है? जिसके द्वारा अपनेमें आरोपित किये हुए विद्यमान और अविद्यमान गुणोंसे अपनेको युक्त मानकर मनुष्य हम हैं ऐसा मानता है? उसे अहंकार कहते हैं। यह अविद्या नामका बड़ा कठिन दोष? समस्त दोषोंका और समस्त अनर्थमय प्रवृत्तियोंका मूल कारण है। कामना और आसक्तिसे युक्त? दूसरेका पराभव करनेके लिये होनेवाला बल? दर्प -- जिसके उत्पन्न होनेपर मनुष्य धर्मको अतिक्रमण कर जाता है? अन्तःकरणके आश्रित उस दोषविशेषका नाम दर्प है। तथा स्त्री आदिके विषयमें होनेवाला काम और किसी प्रकारका अनिष्ट होनेसे होनेवाला क्रोध? इन सब,दोषोंको तथा अन्यान्य महान् दोषोंको भी अवलम्बन करनेवाले होते हैं। इसके सिवा वे अपने और दूसरोंके शरीरमें स्थित? उनकी बुद्धि और कर्मके साक्षी? मुझ ईश्वरसे द्वेष करनेवाले होते हैं -- मेरी आज्ञाको उल्लङ्घन करके चलना ही मुझसे द्वेष करना है? वे वैसा करनेवाले हैं और सन्मार्गमें स्थित पुरुषोंके गुणोंको सहन न करके? उनकी निन्दा करनेवाले होते हैं।

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Sri Anandgiri

आसुरीं संपदमभिजातैरधर्मजातमेव संचीयते प्रवृत्तेरपि वैदिके नैव पुण्यमित्युक्तम्। ब्रह्मज्ञानात्पुनरासुरा दूरादेवोद्विजन्त इत्याह -- अहंकारमिति। अहंकारमेव स्फोरयति -- विद्यमानैरिति। अध्यारोपितवैशिष्ट्यविषयत्वादहंकारस्याविद्यामूलत्वेनाविद्यात्वमाह -- अविद्याख्य इति। विवेकिभिस्तस्यातियत्नादेव हेयत्वं सूचयति -- कष्टतम इति। तदेव स्पष्टयति -- सर्वेति। तं संश्रिता इति संबन्धः। कार्यकरणसामर्थ्यमुक्तविशेषणं बलम्। अहंकार एव महवदधीरणापर्यन्तत्वेन परिणतो दर्पस्तं व्याकरोति -- दर्पो नामेत्यादिना। अन्यांश्च दोषान्मात्सर्यादीन्। न केवलमुक्तमेव तेषां विशेषणं किंतु कष्टतममस्ति विशेषणान्तरमित्याह -- किञ्चेति। यद्यपीश्वरं प्रति द्वेषस्तेषां संभाव्यते तथापि कथं स्वदेहे परदेहेषु च तं प्रति द्वेषो नहि तत्र भोक्तारमन्तरेणेश्वरस्यावस्थानमित्याशङ्क्याह -- तद्बुद्धीति। तेषामीश्वरं प्रति द्वेषमेव प्रकटयति, -- मच्छासनेति। ईश्वरस्य शासनं श्रुतिस्मृतिरूपं तदतिवर्तित्वं तदुक्तार्थज्ञानानुष्ठानपराङ्मुखत्वम्।

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Sri Dhanpati

न केवलं दभमेनाविधिपूर्वकं यजन्त इत्येतावदेवापि त्वहंकारं विद्यामानैरविद्य मानौश्च गुणैरात्मन्यध्यारोपितैरात्मनो विशिष्टत्वाभिमानमविद्याख्यं कष्टतमं सर्वदोषाणां सर्वानर्थप्रवत्तीनां च मूलं तथा बलं पराभिभवमिमित्तं शरीरादिसामर्थ्यं कामरागान्वितं दर्प धर्मातिक्रमतेमन्तःकरणाश्रयं दोषाविशेषं कामं स्त्र्यादिविषयं क्रोधमनिष्टविषयं चतादेतानन्यांश्च मात्सर्यादीन्महतो दोषान् संश्रिताः। किंच न केवलमहंकारादीनेव संश्रिताः कुंतु तदाश्रयेण मामीश्वरमात्मपरदेहेषु स्वदेहेषु परदेहेषु च तद्धुद्धिकर्मसाक्षिणं मां प्रद्विषन्तः श्रुतिस्मृतिरुपमच्छासनातिवर्तत्वं तदुक्तार्थानुष्ठानपराङ्युखत्वं मद्वेषस्तं कुर्वन्तः दम्भेनाविधिपूर्वकं यजनं स्वदेहपीडनमहंकारदिकं मदवज्ञानं च श्रुतिस्मृतिप्रतिषिद्धं समाश्रिता मदाज्ञातिवर्तन इत्यर्थः। ननु सत्कर्मस्थानामनुवृत्तिं किमिति न कुर्वन्तीतिचेत्तत्राह। तेषां गुणेष्वभ्यसूयकाः दोषाविष्करणशीलाः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
ahankāramegotism
balamstrength
darpamarrogance
kāmamdesire
krodhamanger
chaand
sanśhritāḥcovered by
māmme
ātmapara
pradviṣhantaḥabuse
abhyasūyakāḥthe demoniac
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Bhagavad Gita · 16.17
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्

अपनेको सबसे अधिक पूज्य माननेवाले, अकड़ रखनेवाले तथा धन और मानके मदमें चूर रहनेवाले वे मनुष्य दम्भसे अविधिपूर्वक नाममात्रके यज्ञोंसे यजन करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 16.19
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु

उन द्वेष करनेवाले, क्रूर स्वभाववाले और संसारमें महान् नीच, अपवित्र मनुष्योंको मैं बार-बार आसुरी योनियोंमें गिराता ही रहता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 16Shlok 18
Bhagavad Gita · Adhyay 16, Shlok 18
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः

वे अहङ्कार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोधका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने और दूसरोंके शरीरमें रहनेवाले मुझ अन्तर्यामीके साथ द्वेष करते हैं तथा (मेरे और दूसरोंके गुणोंमें) दोष-दृष्टि रखते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 16 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 16 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ: "वे अहङ्कार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोधका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने और दूसरोंके शरीरमें रहनेवाले मुझ अन्तर्यामीके साथ द्वेष करते हैं तथा (मेरे और दूसरोंके गुणोंमें) दोष-दृष्टि रखते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Daivaasura-Sampad-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 18?

Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 18 translates to: "Given over to egoism, power, haughtiness, lust, and anger, these malicious people hate Me in their own bodies and in the bodies of others. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 16, श्लोक 18 है जो Bhagavad Gita के Daivaasura-Sampad-Vibhaga Yoga में संकलित है। वे अहङ्कार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोधका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने और दूसरोंके शरीरमें रहनेवाले मुझ अन्तर्यामीके साथ द्वेष करते हैं तथा (मेरे और दूसरोंके गुणोंमें) दोष-दृष्टि रखते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "ahankāraṁ balaṁ darpaṁ kāmaṁ krodhaṁ cha sanśhritāḥ" mean in English?

"ahankāraṁ balaṁ darpaṁ kāmaṁ krodhaṁ cha sanśhritāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 18. Given over to egoism, power, haughtiness, lust, and anger, these malicious people hate Me in their own bodies and in the bodies of others. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.