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Sudarshana Chakra
Adhyay 16, Shlok 11
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्िचताः

वे मृत्युपर्यन्त रहनेवाली अपार चिन्ताओंका आश्रय लेनेवाले, पदार्थोंका संग्रह और उनका भोग करनेमें ही लगे रहनेवाले और 'जो कुछ है, वह इतना ही है' -- ऐसा निश्चय करनेवाले होते हैं। — VaniSagar

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BengaliIND

নিজেদেরকে অপরিমেয় যত্নের কাছে সমর্পণ করা যা শুধুমাত্র মৃত্যুর সাথে শেষ হয়, লালসা পরিতৃপ্তিকে তাদের সর্বোচ্চ লক্ষ্য হিসাবে বিবেচনা করে এবং নিশ্চিত বোধ করে যে এটিই সব।

MarathiIND

वासनेची तृप्ती हे त्यांचे सर्वोच्च उद्दिष्ट मानून, केवळ मृत्यूनेच संपणाऱ्या अमर्याद काळजींच्या स्वाधीन करणे आणि एवढेच आहे याची खात्री वाटणे.

MalayalamIND

മരണത്തിൽ മാത്രം അവസാനിക്കുന്ന അളവറ്റ കരുതലുകൾക്ക് സ്വയം സമർപ്പിക്കുക, കാമത്തിൻ്റെ സംതൃപ്തി തങ്ങളുടെ ഏറ്റവും ഉയർന്ന ലക്ഷ്യമായി കണക്കാക്കുകയും അത് അത്രയേയുള്ളൂ എന്ന് ഉറപ്പ് തോന്നുകയും ചെയ്യുക.

GujaratiIND

વાસનાની તૃપ્તિને તેમના સર્વોચ્ચ ધ્યેય તરીકે ગણીને, માત્ર મૃત્યુ સાથે જ સમાપ્ત થતી અમાપ ચિંતાઓને પોતાની જાતને સોંપી દેવી, અને ખાતરી કરો કે તે બધુ જ છે.

KannadaIND

ಸಾವಿನೊಂದಿಗೆ ಮಾತ್ರ ಕೊನೆಗೊಳ್ಳುವ ಅಳೆಯಲಾಗದ ಕಾಳಜಿಗಳಿಗೆ ತಮ್ಮನ್ನು ತಾವು ಅರ್ಪಿಸಿಕೊಳ್ಳುವುದು, ಕಾಮದ ತೃಪ್ತಿಯನ್ನು ತಮ್ಮ ಅತ್ಯುನ್ನತ ಗುರಿಯಾಗಿ ಪರಿಗಣಿಸುವುದು ಮತ್ತು ಅದು ಅಷ್ಟೆ ಎಂದು ಖಚಿತವಾಗಿ ಭಾವಿಸುವುದು.

TeluguIND

మరణంతో మాత్రమే ముగిసే అపరిమితమైన శ్రద్ధలకు తమను తాము అప్పగించుకోవడం, కామాన్ని సంతృప్తిపరచడం తమ అత్యున్నత లక్ష్యంగా భావించడం మరియు అంతే అని నిశ్చయించుకోవడం.

TamilIND

இறப்புடன் மட்டுமே முடிவடையும் அளவிட முடியாத அக்கறைகளுக்குத் தங்களை ஒப்படைப்பது, காமத்தின் திருப்தியை அவர்களின் உயர்ந்த நோக்கமாகக் கருதி, அவ்வளவுதான் என்று உறுதியாக உணர்கிறேன்.

SindhiIND

پنهنجو پاڻ کي بيشمار خيالات جي حوالي ڪرڻ جيڪي صرف موت سان ختم ٿين ٿا، هوس جي تسڪين کي پنهنجو اعليٰ مقصد سمجهن ٿا، ۽ اهو محسوس ڪن ٿا ته اهو سڀ ڪجهه آهي.

PunjabiIND

ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਬੇਅੰਤ ਚਿੰਤਾਵਾਂ ਦੇ ਹਵਾਲੇ ਕਰਨਾ ਜੋ ਸਿਰਫ ਮੌਤ ਨਾਲ ਖਤਮ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਵਾਸਨਾ ਦੀ ਸੰਤੁਸ਼ਟੀ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਸਭ ਤੋਂ ਉੱਚਾ ਉਦੇਸ਼ ਮੰਨਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਇਹ ਯਕੀਨੀ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਸਭ ਕੁਝ ਹੈ।

NepaliIND

आफूलाई अथाह चिन्तामा सुम्पिनु जुन मृत्युमा मात्र समाप्त हुन्छ, वासनाको तृप्तिलाई आफ्नो उच्च लक्ष्य मानेर, र त्यो सबै हो भनी विश्वस्त हुनु।

BhojpuriIND

अपना के ओह अथाह चिंता के सौंप दिहल जवन खाली मौत से खतम होला, कामवासना के तृप्ति के आपन उच्चतम लक्ष्य मान के आ एह बात के पक्का महसूस कइल कि बस एतने बा.

KonkaniIND

फकत मरणान सोंपपी अमाप काळजींक स्वताक सोडून दिवप, कामवासनेची तृप्ती हें तांचें सगळ्यांत व्हडलें ध्येय मानप आनी तें सगळें आसा हाची खात्री करप.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः -- आसुरीसम्पदावाले मनुष्योंमें ऐसी चिन्ताएँ रहती हैं? जिनका कोई मापतौल नहीं है। जबतक प्रलय अर्थात् मौत नहीं आती? तबतक उनकी चिन्ताएँ मिटती नहीं। ऐसी प्रलयतक रहनेवाली चिन्ताओंका फल भी प्रलयहीप्रलय अर्थात् बारबार मरना ही होता है।चिन्ताके दो विषय होते हैं -- एक पारमार्थिक और दूसरा सांसारिक। मेरा कल्याण? मेरा उद्धार कैसे हो परब्रह्म परमात्माका निश्चय कैसे हो (चिन्ता परब्रह्मविनिश्चयाय) इस प्रकार जिनको पारमार्थिक चिन्ता होती है? वे श्रेष्ठ हैं। परन्तु आसुरीसम्पदावालोंको ऐसी चिन्ता नहीं होती। वे तो इससे विपरीत सांसारिक चिन्ताओंके आश्रित रहते हैं कि हम कैसे जीयेंगे अपना जीवननिर्वाह कैसे करेंगे हमारे बिना बड़ेबूढ़े किसके आश्रित जीयेंगे हमारा मान? आदर? प्रतिष्ठा? इज्जत? प्रसिद्धि? नाम आदि कैसे बने रहेंगे मरनेके बाद हमारे बालबच्चोंकी क्या दशा होगी मर जायँगे तो धनसम्पत्ति? जमीनजायदादका क्या होगा धनके बिना हमारा काम कैसे चलेगा धनके बिना मकानकी मरम्मत कैसे होगी आदिआदि।मनुष्य व्यर्थमें ही चिन्ता करता है। निर्वाह तो होता रहेगा। निर्वाहकी चीजें तो बाकी रहेंगी और उनके रहते हुए ही मरेंगे। अपने पास एक लंगोटी रखनेवाले विरक्तसेविरक्तकी भी फटी लंगोटी और फूटी तूम्बी बाकी बचती है और मरता है पहले। ऐसे ही सभी व्यक्ति वस्तु आदिके रहते हुए ही मरते हैं। यह नियम नहीं है कि,धन पासमें होनेसे आदमी मरता न हो। धन पासमें रहतेरहते ही मनुष्य मर जाता है और धन पड़ा रहता है? काममें नहीं आता।एक बहुत बड़ा धनी आदमी था। उसने तिजोरीकी तरह लोहेका एक मजबूत मकान बना रखा था? जिसमें बहुत रत्न रखे हुए थे। उस मकानका दरवाजा ऐसा बना हुआ था? जो बंद होनेपर चाबीके बिना खुलता नहीं था। एक बार वह धनी आदमी बाहर चाबी छोड़कर उस मकानके भीतर चला गया और उसने भूलसे दरवाजा बंद कर लिया। अब चाबीके बिना दरवाना न खुलनेसे अन्न? जल? हवाके अभावमें मरते हुए उसने लिखा कि इतनी धनसम्पत्ति आज मेरे पास रहते हुए भी मैं मर रहा हूँ क्योंकि मुझे भीतर अन्नजल नहीं मिल रहा है? हवा नहीं मिल रही है ऐसे ही खाद्य पदार्थोंके रहनेसे नहीं मरेगा? यह भी नियम नहीं है। भोगोंके पासमें होते हुए भी ऐसे ही मरेगा। जैसे पेट आदिमें रोग लग जानेपर वैद्यडाक्टर उसको (अन्न पासमें रहते हुए भी) अन्न खाने नहीं देते? ऐसे ही मरना हो? तो पदार्थोंके रहते हुए भी मनुष्य मर जाता है।जो अपने पास एक कौड़ीका भी संग्रह नहीं करते? ऐसे विरक्त संतोंको भी प्रारब्धके अनुसार आवश्यकतासे अधिक चीजें मिल जाती हैं। अतः जीवननिर्वाह चीजोंके अधीन नहीं है । परन्तु इस तत्त्वको आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य नहीं समझ सकते। वे तो यही समझते हैं कि हम चिन्ता करते हैं? कामना करते हैं? विचार करते हैं? उद्योग करते हैं? तभी चीजें मिलती हैं। यदि ऐसा न करें? तो भूखों मरना पड़े कामोपभोगपरमाः -- जो मनुष्य धनादि पदार्थोंका उपभोग करनेके परायण हैं? उनकी तो हरदम यही इच्छा रहती है कि सुखसामग्रीका खूब संग्रह कर लें और भोग भोग लें। उनको तो भोगोंके लिये धन चाहिये संसारमें बड़ा बननेके लिये धन चाहिये? सुखआराम? स्वादशौकीनी आदिके लिये धन चाहिये। तात्पर्य है कि उनके लिये भोगोंसे बढ़कर कुछ नहीं है।एतावदिति निश्चिताः -- उनका यह निश्चय होता है कि सुख भोगना और संग्रह करना -- इसके सिवाय और कुछ नहीं है । इस संसारमें जो कुछ है? यही है। अतः उनकी दृष्टिमें परलोक एक ढकोसला है। उनकी मान्यता रहती है कि मरनेके बाद कहीं आनाजाना नहीं होता। बस? यहाँ शरीरके रहते हुए जितना सुख भोग लें? वही ठीक है क्योंकि मरनेपर तो शरीर यहीं बिखर जायगा । शरीर स्थिर रहनेवाला है नहीं? आदिआदि भोगोंके निश्चयके सामने वे पापपुण्य? पुनर्जन्म आदिको भी नहीं मानते।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तथा --, जिसकी इयत्ता न जानी जा सके? ऐसी अपरिमेय -- अपार? प्रलयतक -- मरणपर्यन्त रहनेवाली चिन्ताके आश्रित हुए? अर्थात् सदा चिन्ताग्रस्त हुए? तथा कामोपभोगके परायण -- जिनकी कामना की जाय वे शब्दादि विषय काम हैं? उनके उपभोगमें तत्पर हुए -- तथा विषयोंका उपभोग करना? बस यही परम पुरुषार्थ है? ऐसा निश्चय रखनेवाले।

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Sri Anandgiri

तानेव विधान्तरेण विशिनष्टि -- किञ्चेति। चिन्तामात्मीययोगक्षेमोपायालोचनात्मिकामपरिमेयविषयत्वात्परिमातुमशक्यामाश्रिता इति संबन्धः। एष कामोपभोगः परमयनं सुखस्येत्येतावत्पारत्रिकं नु नास्ति सुखमिति निश्चयवन्त इत्याह -- एतावदितीति।

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Sri Dhanpati

आसुरानेव विधान्तरेण पुनर्विशिनष्टि। चिन्तां योगक्षेमोपायालोचनात्मिकामपरिमेयविषयत्वात् यस्याश्चिन्ताया इयत्ता न परिमातुं शक्यते सा परिमातुमशक्या तां प्रलयान्तां मरणपर्यन्तामुपाश्रिताः। सदाचिन्तापरा इत्यर्थः। काम्यन्त इति कामाः शब्दादयस्तदुपभोगः परमपुरुषार्थो येषामयमेव परमः पुरुषार्थो यः कामोपभोगः पारत्रिकं तु सुखं नास्तयेवेत्येवं निश्चितात्मानः एतत्कायातिरिक्तस्य भोक्तुरभावात्। तथाच बार्हस्पत्ये सूत्रेचैतन्यविशिष्टः कामः पुरुषः? काम एवैकः पुरुषार्थः इति च।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
chintāmanxieties
aparimeyāmendless
chaand
pralayaantām
upāśhritāḥtaking refuge
kāmaupabhoga
paramāḥthe purpose of life
etāvatstill
itithus
niśhchitāḥwith complete assurance
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Bhagavad Gita · 16.10
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः

कभी पूरी न होनेवाली कामनाओंका आश्रय लेकर दम्भ, अभिमान और मदमें चूर रहनेवाले तथा अपवित्र व्रत धारण करनेवाले मनुष्य मोहके कारण दुराग्रहोंको धारण करके संसारमें विचरते रहते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 16.12
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्

वे आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोधके परायण होकर पदार्थोंका भोग करनेके लिये अन्यायपूर्वक धन-संचय करनेकी चेष्टा करते रहते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 16Shlok 11
Bhagavad Gita · Adhyay 16, Shlok 11
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्िचताः

वे मृत्युपर्यन्त रहनेवाली अपार चिन्ताओंका आश्रय लेनेवाले, पदार्थोंका संग्रह और उनका भोग करनेमें ही लगे रहनेवाले और 'जो कुछ है, वह इतना ही है' -- ऐसा निश्चय करनेवाले होते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 16 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 16 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ: "वे मृत्युपर्यन्त रहनेवाली अपार चिन्ताओंका आश्रय लेनेवाले, पदार्थोंका संग्रह और उनका भोग करनेमें ही लगे रहनेवाले और 'जो कुछ है, वह इतना ही है' -- ऐसा निश्चय करनेवाले होते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Daivaasura-Sampad-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 11?

Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 11 translates to: "Giving themselves over to immeasurable cares that end only with death, regarding the gratification of lust as their highest aim, and feeling sure that that is all. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्िचताः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 16, श्लोक 11 है जो Bhagavad Gita के Daivaasura-Sampad-Vibhaga Yoga में संकलित है। वे मृत्युपर्यन्त रहनेवाली अपार चिन्ताओंका आश्रय लेनेवाले, पदार्थोंका संग्रह और उनका भोग करनेमें ही लगे रहनेवाले और 'जो कुछ है, वह इतना ही है' -- ऐसा निश्चय करनेवाले होते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "chintām aparimeyāṁ cha pralayāntām upāśhritāḥ" mean in English?

"chintām aparimeyāṁ cha pralayāntām upāśhritāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 11. Giving themselves over to immeasurable cares that end only with death, regarding the gratification of lust as their highest aim, and feeling sure that that is all. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.