
“इस संसारवृक्षका जैसा रूप देखनेमें आता है, वैसा यहाँ (विचार करनेपर) मिलता नहीं; क्योंकि इसका न तो आदि है, न अन्त है और न स्थिति ही है। इसलिये इस दृढ़ मूलोंवाले संसाररूप अश्वत्थवृक्षको दृढ़ असङ्गतारूप शस्त्रके द्वारा काटकर - — VaniSagar”
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इत्थै इसदा रूप इ'यां नेईं समझेआ जंदा ऐ ते ना गै इसदा अंत, उत्पत्ति, नींह्, जां विश्राम स्थल; इस मजबूत जड़ें आह्ले पीपुल दे पेड़ गी गैर-संलग्नता दी मजबूत कुल्हाड़ी कन्नै कटदे होई।
ताचें रूप हांगा तशें जाणवना, तशेंच ताचो शेवट, उत्पत्ती, बुन्याद वा विसव घेवपाची सुवात ना; अनासक्तीच्या घट कुऱ्हाडीन ह्या घट्ट मुळां आशिल्ल्या पीपुल झाडाक फातर कापून.
તેનું સ્વરૂપ અહીં જોવામાં આવતું નથી, ન તો તેનો અંત, મૂળ, પાયો, અથવા વિશ્રામ સ્થાન; બિન-આસક્તિની મજબૂત કુહાડીથી આ મજબૂત મૂળવાળા પીપુલના ઝાડને કાપી નાખ્યા.
அதன் வடிவம் இங்கே உணரப்படவில்லை, அதன் முடிவு, தோற்றம், அடித்தளம் அல்லது ஓய்வெடுக்கும் இடம்; இந்த உறுதியான வேரூன்றிய பீப்புல் மரத்தின் அடியில் பற்றற்ற வலுவான கோடரியால் வெட்டப்பட்டது.
അതിൻ്റെ രൂപമോ അതിൻ്റെ അവസാനമോ ഉത്ഭവമോ അടിത്തറയോ വിശ്രമസ്ഥലമോ ഇവിടെ കാണുന്നില്ല; ദൃഢമായി വേരുകളുള്ള ഈ പീപ്പിൾ മരത്തിൻ്റെ ചുവട്ടിൽ അറ്റാച്ച്മെൻ്റിൻ്റെ ശക്തമായ കോടാലി കൊണ്ട് മുറിച്ചശേഷം.
त्याचे स्वरूप येथे असे समजले जात नाही किंवा त्याचा अंत, मूळ, पाया किंवा विश्रांतीची जागा नाही; या घट्ट रुजलेल्या पीपुलाच्या झाडाला जोड नसलेल्या मजबूत कुऱ्हाडीने तोडून टाकले.
এর ফর্ম এখানে অনুভূত হয় না, বা এর শেষ, উত্স, ভিত্তি বা বিশ্রামের স্থানও নয়; অ-সংযোগের শক্তিশালী কুঠার দিয়ে এই দৃঢ়ভাবে শিকড়যুক্ত পিপুল গাছটি কেটে ফেলা হয়েছে।
ಅದರ ರೂಪವನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ಗ್ರಹಿಸಲಾಗಿಲ್ಲ, ಅಥವಾ ಅದರ ಅಂತ್ಯ, ಮೂಲ, ಅಡಿಪಾಯ ಅಥವಾ ವಿಶ್ರಾಂತಿ ಸ್ಥಳವಲ್ಲ; ಈ ದೃಢವಾಗಿ ಬೇರೂರಿರುವ ಪೀಪಲ್ ಮರದ ಕೆಳಗೆ ಬಾಂಧವ್ಯವಿಲ್ಲದ ಬಲವಾದ ಕೊಡಲಿಯಿಂದ ಕತ್ತರಿಸಿ.
దాని రూపం ఇక్కడ గ్రహించబడలేదు, లేదా దాని ముగింపు, మూలం, పునాది లేదా విశ్రాంతి స్థలం; అటాచ్మెంట్ లేని బలమైన గొడ్డలితో ఈ దృఢంగా పాతుకుపోయిన పీపుల్ చెట్టు కింద కత్తిరించబడింది.
ان جي شڪل هتي اهڙي طرح نه سمجهي وئي آهي، نه ئي ان جي پڇاڙي، اصل، بنياد، يا آرام جي جاء؛ هن مضبوط جڙيل پيپل جي وڻ کي غير وابستگي جي مضبوط ڪلهي سان ڪٽي ڇڏيو.
यसको रूप यहाँ न त यसको अन्त्य, उत्पत्ति, जग, वा विश्राम स्थानको रूपमा बुझिएको छैन; यो बलियो जरा भएको पिपुलको रुखलाई असलग्नताको बलियो बञ्चरोले काटेर।
ਇਸ ਦੇ ਰੂਪ ਨੂੰ ਇੱਥੇ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਨਹੀਂ ਦੇਖਿਆ ਗਿਆ ਹੈ, ਨਾ ਹੀ ਇਸਦਾ ਅੰਤ, ਮੂਲ, ਨੀਂਹ, ਜਾਂ ਆਰਾਮ ਸਥਾਨ; ਇਸ ਮਜ਼ਬੂਤੀ ਨਾਲ ਜੜ੍ਹਾਂ ਵਾਲੇ ਪੀਪੁਲ ਦੇ ਦਰੱਖਤ ਨੂੰ ਗੈਰ-ਜੋਗ ਦੀ ਮਜ਼ਬੂਤ ਕੁਹਾੜੀ ਨਾਲ ਕੱਟ ਦਿੱਤਾ।
Sacred Commentaries
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Swami Ramsukhdas
व्याख्या -- न रूपमस्येह तथोपलभ्यते -- इसी अध्यायके पहले श्लोकमें संसारवृक्षके विषयमें कहा गया है कि लोग इसको अव्यय (अविनाशी) कहते हैं और शास्त्रोंमें भी वर्णन आता है कि सकामअनुष्ठान करनेसे लोकपरलोकमें विशाल भोग प्राप्त होते हैं। ऐसी बातें सुनकर मनुष्यलोक तथा स्वर्गलोकमें सुख? रमणीयता और स्थायीपन मालूम देता है। इसी कारण अज्ञानी मनुष्य काम और भोगके परायण होते हैं और इससे बढ़कर कोई सुख नहीं है -- ऐसा उनका निश्चय हो जाता है (गीता 2। 42 16। 11)। जबतक संसारसे तादात्म्य? ममता और कामनाका सम्बन्ध है? तबतक ऐसा ही प्रतीत होता है। परन्तु भगवान् कहते हैं कि विवेकवती बुद्धिसे संसारसे अलग होकर अर्थात् संसारसे सम्बन्धविच्छेद करके देखनेसे उसका जैसा रूप हमने अभी मान रखा है? वैसा उपलब्ध नहीं होता अर्थात् यह नाशवान् और दुःखरूप प्रतीत होता है।नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा -- किसी वस्तुके आदि? मध्य और अन्तका ज्ञान दो तरहका होता है -- देशकृत और कालकृत। इस संसारका कहाँसे आरम्भ है? कहाँ मध्य है और कहाँ इसका अन्त होता है -- इस प्रकारसे संसारके देशकृत आदि? मध्य? अन्तका पता नहीं और कबसे इसका आरम्भ हुआ है? कबतक यह रहेगा और कब इसका अन्त होगा -- इस प्रकारसे संसारके कालकृत आदि? मध्य? अन्तका भी पता नहीं।मनुष्य किसी विशाल प्रदर्शनीमें तरहतरहकी वस्तुओंको देखकर मुग्ध हुआ घूमता रहे? तो वह उस प्रदर्शनीका आदिअन्त नहीं जान सकता। उस प्रदर्शनीसे बाहर निकलनेपर ही वह उसके आदिअन्तको जान सकता है। इसी तरह संसारसे सम्बन्ध मानकर भोगोंकी तरफ वृत्ति रखते हुए इस संसारका आदिअन्त कभी जाननेमें नहीं आ सकता।मनुष्यके पास संसारके आदिअन्तका पता लगानेके लिये जो साधन (इन्द्रियाँ? मन और बुद्धि) हैं? वे सब संसारके ही अंश हैं। यह नियम है कि कार्य अपने कारणमें विलीन तो हो सकता है? पर उसको जान नहीं सकता। जैसे मिट्टीका घड़ा पृथ्वीको अपने भीतर नहीं ला सकता? ऐसे ही व्यष्टि इन्द्रियाँमनबुद्धि समष्टि,संसार और उसके कार्यको अपनी जानकारीमें नहीं ला सकते। अतः संसारसे (मन? बुद्धि? इन्द्रियोंसे भी) अलग होनेपर संसारका स्वरूप (स्वयंके द्वारा) ठीकठीक जाना जा सकता है।वास्तवमें संसारकी स्वतन्त्र सत्ता (स्थिति) है ही नहीं। केवल उत्पत्ति और विनाशका क्रममात्र है। संसारका यह उत्पत्तिविनाशका प्रवाह ही स्थितिरूपसे प्रतीत होता है। वास्तवमें देखा जाय तो उत्पत्ति भी नही है? केवल नाशहीनाश है। जिसका स्वरूप एक क्षण भी स्थायी न रहता हो? ऐसे संसारकी प्रतिष्ठा (स्थिति) कैसी संसारसे अपना माना हुआ सम्बन्ध छोड़ते ही उसका अपने लिये अन्त हो जाता है और अपने वास्तविक स्वरूप अथवा परमात्मामें स्थिति हो जाती है।विशेष बातइस संसारके आदि? मध्य और अन्तका पता आजतक कोई वैज्ञानिक नहीं लगा सका और न ही लगा सकता है। संसारसे सम्बन्ध रखते हुए अथवा सांसारिक भोगोंको भोगते हुए संसारके आदि? मध्य और अन्तको ढूँढ़ना चाहें? तो कोल्हूके बैलकी तरह उम्रभर रहनेपर भी कुछ हाथ आनेका नहीं।वास्तवमें इस संसारके आदि? मध्य और अन्तका पता लगानेकी जरूरत भी नहीं है। जरूरत संसारसे अपने माने हुए सम्बन्धका विच्छेद करनेकी ही है।संसार अनादिसान्त है या अनादिअनन्त है अथवा प्रतीतिमात्र है? इत्यादि विषयोंपर दार्शनिकोंमें अनेक मतभेद हैं परन्तु संसारके साथ हमारा सम्बन्ध असत् है? जिसका विच्छेद करना आवश्यक है -- इस विषयपर सभी दार्शनिक एकमत हैं।संसारसे सम्बन्धविच्छेद करनेका सुगम उपाय है -- संसारसे प्राप्त (मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर? धन? सम्पत्ति आदि) सम्पूर्ण सामग्रीको अपनी और अपने लिये न मानते हुए उसको संसारकी ही सेवामें लगा देना।सांसारिक स्त्री? पुत्र? मान? बड़ाई? धन? सम्पत्ति? आयु? नीरोगता आदि कितने ही प्राप्त हो जायँ यहाँतक कि संसारके समस्त भोग एक ही मनुष्यको मिल जायँ? तो भी उनसे मनुष्यको तृप्ति नहीं हो सकती क्योंकि जीव स्वयं अविनाशी है और सांसारिक भोग नाशवान् हैं। नाशवान्से अविनाशी कैसे तृप्त हो सकता हैअश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम् -- संसारको सुविरूढमूलम् कहनेका तात्पर्य यह है कि तादात्म्य? ममता और कामनाके कारण यह संसार (प्रतिष्ठारहित होनेपर भी) दृढ़ मूलोंवाला प्रतीत हो रहा है।व्यक्ति? पदार्थ? क्रिया आदिमें राग? ममता होनेसे सांसारिक बन्धन अधिकसेअधिक दृढ़ होता चला जाता है। जिन पदार्थों? व्यक्तियोंमें राग? ममताका घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है? उनको मनुष्य अपना स्वरूप ही मानने लग जाता है। जैसे? धनमें ममता होनेसे उसकी प्राप्तिमें मनुष्यको बड़ी प्रसन्नता होती है और मैं बड़ा धनवान् हूँ -- ऐसा अभिमान हो जाता है। धनके नाशसे वह अपना नाश मानने लग जाता है। लोभ बढ़नेसे धनकी प्राप्तिके लिये वह अन्याय? पाप आदि न करनेलायक काम भी कर बैठता है। फिर इतना लोभ बढ़ जाता है कि उसके भीतर यह दृढ़ निश्चय हो जाता है कि झूठ? कपट? बेईमानी आदिके बिना धन कमाया ही नहीं जा सकता। उसे यह विचार ही नहीं होता कि पापसे धन कमाकर मैं यहाँ कितने दिन ठहरूँगा पापसे कमाया धन तो शरीरके साथ यहीँ छूट जायगा किंतु धनके लिये किये झूठ? कपट? बेईमानी? चोरी आदि पाप तो मेरे साथ जायँगे ? जिससे परलोकमें मेरी कितनी दुर्गति होगी आदि। इतना ही नहीं? वह दूसरोंको भी प्रेरणा करने लग जाता है कि धन कमानेके लिये पाप करनेमें कोई खराबी नहीं यह तो व्यापार है? इसमें झूठ बोलना? ठगना आदि सब उचित है इत्यादि। इस दुर्भावका होना ही तादात्म्य? ममता और कामनारूप मूलोंका दृढ़ होना है। इस प्रकारके दूषित भावोंके दृढ़मूल होनेसे मनुष्य वैसा ही बन जाता है (गीता 17। 3)।ये तादात्म्य? ममता और कामनारूप मूल अन्तःकरणमें इतनी दृढ़तासे जमे हुए हैं कि पढ़ने? सुनने तथा विचारविवेचन करनेपर भी सर्वथा नष्ट नहीं होते। साधक प्रायः कहा करते हैं कि सत्सङ्गचर्चा सुनते समय तो इन दोषोंके त्यागकी बात अच्छी और सुगम लगती है परन्तु व्यवहारमें आनेपर ऐसा होता नहीं। इनको छोड़ना तो चाहते हैं? पर ये छूटते नहीं। इन दोषोंके न छूटनेमें खास कारण है -- सांसारिक सुख लेनेकी इच्छा। साधकसे भूल यह होती है कि वह सांसारिक सुख भी लेना चाहता है और साथ ही दोषोंसे भी बचना चाहता है। जैसे लोभी व्यक्ति विषयुक्त लड्डुओंकी मिठासको भी लेना चाहे और साथ ही विषसे भी बचना चाहे ऐसा कभी सम्भव नहीं है। संसारसे कभी किञ्चिन्मात्र भी सुखकी आशा न रखनेपर इसका दृढ़मूल स्वतः नष्ट हो जाता है।दूसरी बात यह है कि तादात्म्य? ममता और कामनाका मिटना बहुत कठिन है -- साधककी यह मान्यता ही इन दोषोंको मिटने नहीं देती। वास्तवमें तो ये स्वतः मिट रहे हैं। किसी भी मनुष्यमें ये दोष सदा नहीं रहते उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं किंतु अपनी मान्यताके कारण ये स्थायी दीखते हैं। अतः साधकको चाहिये कि वह इन दोषोंके मिटनेको कभी कठिन न माने।असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा -- भगवान् कहते हैं कि यद्यपि इस संसारवृक्षके अवान्तर मूल बहुत दृढ़ हैं? फिर भी इनको दृढ़ असङ्गतारूप शस्त्रके द्वारा काटा जा सकता है। किसी भी स्थान? व्यक्ति? वस्तु? परिस्थिति आदिके प्रति मनमें आकर्षण? सुखबुद्धिका होना और उनके सम्बन्धसे अपनेआपको बड़ा तथा सुखी मानना पदार्थोंके प्राप्त होने अथवा संग्रह होनेपर प्रसन्न होना -- यही सङ्ग कहलाता है। इसका न होना ही असङ्गता अर्थात् वैराग्य है। वैराग्यके दो प्रकार हैं -- (1) साधारण वैराग्य और (2) दृढ़ वैराग्य। दृढ़ वैराग्यको उपरति अथवा पर वैराग्य भी कहते हैं।वैराग्यसम्बन्धी विशेष बात वैराग्यके अनेक रूप हैं? जो इस प्रकार हैं -- पहला वैराग्य धन? मकान? जमीन आदि पदार्थोंसे होता है। इन पदार्थोंका स्वरूपसे त्याग कर देनेपर भी अगर मनमें उनका महत्त्व बना हुआ है और मैं त्यागी हूँ -- ऐसा अभिमान है? तो वास्तवमें यह वैराग्य नहीं है। अन्तःकरणमें जडपदार्थोंका किञ्चिन्मात्र भी महत्त्व और आकर्षण न रहे -- यही वैराग्य है। दूसरा वैराग्य अपने कहलानेवाले माता? पिता? स्त्री? पुत्र? भाई? भौजाई आदि(परिवार)से होता है। उनकी सेवा करने या उनको सुख पहुँचानेके लिये ही उनसे अपना सम्बन्ध मानना चाहिये। अपने सुखके लिये उनसे किञ्चिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध न मानना ही बन्धुबान्धवोंसे वैराग्य है।तीसरा और वास्तविक वैराग्य अपने शरीरसे होता है। अगर शरीरसे सम्बन्ध बना हुआ है तो सम्पूर्ण संसारसे सम्बन्ध बना हुआ है क्योंकि शरीर संसारका ही बीज अथवा अंश है। शरीरसे तादात्म्य न रहना ही शरीरसे वैराग्य है।तादात्म्य (शरीरके साथ मानी हुई एकता अर्थात् अहंता) का नाश करनेके लिये साधकको पहले मान? प्रतिष्ठा? पूजा? धन आदिकी कामनाका त्याग करना चाहिये। इनकी कामनाका त्याग करनेपर भी (शऱीरके) नाम में ममता रहनेके कारण यश? कीर्ति? बड़ाई आदिकी कामना रह जाती है। इसके कारण मरनेके बाद,भी अपने नामकी कीर्ति? अपना स्मारक बननेकी चाह आदि सूक्ष्म कामनाएँ रह जाती हैं। इन सब कामनाओंका नाश करना आवश्यक है। कहींकहीं साधकके भीतर दूसरोंकी प्रशंसा सुनकर? दूसरेकी बड़ाई देखकर ईर्ष्याका भाव जाग्रत् हो जाता है। अतः इसका भी नाश करना आवश्यक है।उपर्युक्त कामनाओंका नाश करनेके बाद शरीरमें ममता रह जाती है। यह ममताका सम्बन्ध मृत्युके बाद भी बना रहता है। इसी कारण मृत शरीरको जला देनेके बाद भी हड्डियोंको गङ्गाजीमें डालनेसे जीव(जिसने शरीरमें ममता की है)की आगे गति होती है। विवेक (जडचेतन? प्रकृतिपुरुष अथवा शरीरशरीरीकी भिन्नताका ज्ञान) जाग्रत् होनेपर ममताका नाश हो जाता है। कामना और ममता -- दोनोंका नाश होनेके बाद तादात्म्य (अहंता) नष्टप्राय हो जाता है अर्थात् बहुत सूक्ष्म रह जाता है। तादात्म्यका अत्यन्ताभाव भगवत्प्रेमकी प्राप्ति होनेपर होता है।जब मनुष्य स्वयं यह अनुभव कर लेता है कि मैं शरीर नहीं हूँ शरीर मेरा नहीं है? तब कामना? ममता और तादात्म्य -- तीनों मिट जाते हैं। यही वास्तविक वैराग्य है।,जिसके भीतर दृढ़ वैराग्य है उसके अन्तःकरणमें सम्पूर्ण वासनाओँका नाश हो जाता है। अपने स्वरूपसे विजातीय (जड) पदार्थ -- शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि? आदिसे किञ्चिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध न मानकर -- सबका कल्याण हो? सब सुखी हों? सब नीरोग हों? कभी किसीको किञ्चिन्मात्र भी दुःख न हो -- इस भावका रहना ही दृढ़ वैराग्यका लक्षण है।यह(इदम्) रूपसे जाननेमें आनेवाले स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीरसहित सम्पूर्ण संसारको जाननेवाला,मैं? (अहम्) कहलाता है। यह? (जाननेमें आनेवाला दृश्य) और मैं (जाननेवाला द्रष्टा) कभी एक नहीं हो सकते -- यह नियम है। इस प्रकार संसार और शरीर नष्ट होनेवाले हैं और मैं (स्वयं) अविनाशी है -- इस विवेकका आदर करते हुए अपनेआपको संसार और शरीरसे सर्वथा अलग अनुभव करना ही असङ्गशस्त्रके द्वारा संसारवृक्षका छेदन करना है। इस विवेकको महत्त्व न देनेके कारण ही संसार दृढ़ मूलोंवाला प्रतीत होता है।सांसारिक वस्तुओंका अत्यन्ताभाव अर्थात् सर्वथा नाश तो नहीं हो सकता? पर उनमें रागका सर्वथा अभाव हो सकता है। अतः छेदन का तात्पर्य सांसारिक वस्तुओंका नाश करना नहीं? प्रत्युत उनसे अपना राग हटा लेना है। संसारसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर संसारका अपने लिये सर्वथा अभाव हो जाता है? जिसे,आत्यन्तिक प्रलय भी कहते हैं। जो हमारा स्वरूप नहीं है तथा जिसके साथ हमारा वास्तविक सम्बन्ध नहीं है? उसीका त्याग (छेदन) होता है। हम स्वरूपतः चेतन और अविनाशी हैं एवं संसार जड और विनाशी है अतः संसारसे हमारा सम्बन्ध अवास्तविक और भूलसे माना हुआ है। स्वरूपसे हम संसारसे असङ्ग ही हैं। पहलेसे ही जो असङ्ग है? वही असङ्ग होता है -- यह नियम है। अतः संसारसे हमारी असङ्गता स्वतःसिद्ध है -- इस वास्तविकताको दृढ़तासे मान लेना चाहिये। संसार कितना ही सुविरूढमूल क्यों न हो? उसके साथ अपना सम्बन्ध न माननेसे वह स्वतः कट जाता है क्योंकि संसारके साथ अपना सम्बन्ध है नहीं? केवल माना हुआ है। अतः संसारके साथ अपना सम्बन्ध न माननेसे उसका छेदन हो जाता है -- इसमें साधकको सन्देह नहीं करना चाहिये चाहे (आरम्भमें) व्यवहारमें ऐसा दिखायी दे या न दे।जीवने अपनी भूलसे शरीरसंसारसे सम्बन्ध माना था। इसलिये इसका छेदन करनेकी जिम्मेवारी भी जीवपर ही है। अतः भगवान् इसे ही छेदन करनेके लिये कह रहे हैं। संसारसे सम्बन्धविच्छेदके कुछ सुगम उपाय(1) कुछ भी लेनेकी इच्छा न रखकर संसारसे प्राप्त सामग्रीको संसारकी सेवामें ही लगा देना।(2) सांसारिक सुख(भोग और संग्रह) की कामनाका सर्वथा त्याग करना।(3) संसारके आश्रयका सर्वथा त्याग करना।(4) शरीरसंसारसे मैं और मेरापनको बिलकुल हटा लेना।(5) मैं भगवान्का हूँ भगवान् मेरे हैं -- इस वास्तविकतापर दृढ़तासे डटे रहेना।(6) मुझे एक परमात्माकी तरफ ही चलना है -- ऐसे दृढ़ निश्चय(व्यवसायात्मिका बुद्धि) का होना।(7) शास्त्रविहित अपनेअपने कर्तव्यकर्मों(स्वधर्म) का तत्परतापूर्वक पालन करना (गीता 18। 45)।(8) बचपनमें शरीर? पदार्थ? परिस्थिति? विद्या? सामर्थ्य आदि जैसे थे? वैसे अब नहीं हैं अर्थात् वे सबकेसब बदल गये? पर मैं स्वयं वही हूँ? बदला नहीं -- अपने इस अनुभवको महत्त्व देना।(9) संसारसे माने हुए सम्बन्धका सद्भाव (सत्ताभाव) मिटाना। सम्बन्ध -- संसारवृक्षका छेदन करनेके बाद साधकको क्या करना चाहिये -- इसका विवेचन आगेके श्लोकमें करते हैं।
Sri Harikrishnadas Goenka
यह जो वर्णन किया हुआ संसारवृक्ष है --, इसका स्वरूप जैसा यहाँ वर्णन किया गया है? वैसा उपलब्ध नहीं होता क्योंकि यह स्वप्नकी वस्तु? मृगतृष्णाके जल और मायारचित गन्धर्वनगरके समान होनेसे? देखतेदेखते नष्ट होनेवाला है। इसी कारण इसका अन्त अर्थात् अन्तिमावस्थाअवसान या समाप्ति भी नहीं है। तथा इसका आदि भी नहीं है? अर्थात् यहाँसे आरम्भ होकर यह संसार चला है? ऐसा किसीसे नहीं जाना जा सकता और इसकी संप्रतिष्ठास्थिति भी नहीं है यानी आदि और अन्तके बीचकी अवस्था भी किसीको उपलब्ध नहीं होती। इस उपर्युक्त सुविरूढमूल यानी जिसकी मूलें -- जड़ें अत्यन्त दृढ़ हो गयी हैं -- भली प्रकार संगठित हो चुकी हैं? ऐसे संसाररूप अश्वत्थको? असङ्गशस्त्रसे छेदन करके यानी पुत्रैषणा? वित्तैषणा और लोकैषणादिसे उपराम हो जाना ही असङ्ग है? ऐसे असङ्गशस्त्रसे जो कि परमात्माके सम्मुख होनारूप निश्चयसे दृढ़ किया हुआ है और बारंबार विवेकाभ्यासरूप पत्थरपर घिसकर पैना किया हुआ है? इस संसारवृक्षको बीजसहित उखाड़कर।
Sri Anandgiri
पुनःपुना रागादीना प्रवृत्तत्वेनानादित्वान्न संसारवृक्षः स्वयमुच्छिद्यते न चोच्छेत्तुं शक्यते केनापीत्याशङ्क्याह -- यस्त्विति। यथा पूर्वं वर्णितं यथा च लोके प्रसिद्धं तथास्य रूपमिह शास्त्रादनुमीयते तथाचास्य ज्ञानापनोद्यत्वं युक्तमित्याह -- यथेति। तस्याप्रमितत्वे हेतुमाह -- स्वप्नेति। तस्य स्वप्नादिसमत्वे दृष्टनष्टस्वरूपत्वं हेतुं करोति -- दृष्टेति। इत्यमेयतेति शेषः। तमेवामेयत्वं हेतुं कृत्वावसानमपि तस्य न भातीत्याह -- अत एवेति। ज्ञानं विना भ्रान्तिवासनाकर्मणामन्योन्यनिमित्तत्वान्नावसानमस्तीत्यर्थः। इदंप्रथमत्वमपि नास्य परिच्छेत्तुं शक्यमित्याह -- तथेति। आद्यन्तवन्मध्यमपि नास्य प्रामाणिकमित्याह -- मध्यमिति। संसारवृक्षस्याश्वत्थशब्दितस्य क्षणभङ्गुरस्य स्वयमेवोच्छेदसंभवात्तदुच्छेदार्थं न प्रयतितव्यमित्याशङ्क्याह -- अश्वत्थमिति। व्युत्थानं वैराग्यपूर्वकं पारिव्राज्यम्। दृढीकृतत्वमेव विवेकपूर्वकत्वेन स्फुटयति -- पुनःपुनरिति।
Sri Dhanpati
को अद्धा वेद क इह प्रवोचत्कृत आजाता कुत इयं विसृष्टिः। अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव इत्यादिश्रुतिबोधितं संसारस्यानिर्वचनीयत्वं वदन्नास्य ज्ञानायोद्यतत्वं युक्तमपितुच्छेदायेति बोधयति -- नेति। अस्य वर्णितस्य संसारवृक्षस्य रुपमिह शास्त्रे यथा र्णितं तथा नैवोपलभ्यते। इह संसारे स्थितैः प्राणिभिरुधर्वमूलत्वादि यथा वर्णितं तथा नोपलभ्यत इति वा। दृष्टनष्टस्वरुपत्वेन स्वप्नमरीच्युदकमायागन्धर्वनगररज्जूरगशुक्तिरुप्यद्विजन्द्रसमत्वात्। एवंच यथा सत्त्वा सत्त्वाभ्यामनिर्वाच्यत्वात्स्वप्नादिकममेयं तथायं संसारोऽपीति भावः। अमेयत्वादेवास्य संसारस्यान्तः कदायं समाप्यत इति परिसमाप्तिर्नोपलभ्यते ज्ञानं विनाऽनन्तत्वात्। तथेत आरभ्यायं प्रवृत्त इत्यादिरस्य न चोपलभ्यते कैश्चिन्न गम्यते अनादित्वात्। नच संप्रतिष्ठा संस्थितिः। मध्यमस्य केनचिदुपलभ्यते। आद्यन्तज्ञानाधीनत्वादस्य तस्मादेनं यथोक्तमश्वत्थं संसारवृक्षं सर्वानर्थकरं सुष्टु विरुढानि विरोहं गतानि सुदृढानि मूलान्यविद्याकामकर्मवासनारुपाणि यस्य ते सुविरुढमूलत्वाद्दुरुच्छेदमसङ्गशस्त्रेण सङ्गस्य पुत्रवित्तलोकैषणादिरुपस्य परित्यागोऽसङ्गः स एव शस्त्रं संसारवृक्षच्छेदनसाधनं तेन दृढेन परमात्माभिमुख्यनिश्चयदृढीकृतेन पुनः पुनर्निवेकाब्यासशिलापादिततैक्ष्ण्येन छित्त्वा संसारवृक्षं समलमुत्कृत्य ततः पदं तत्परिमार्गितव्यमन्विष्य ज्ञातव्यमित्यर्थः।सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः इति श्रुतेः। किं तदिति तत्राह। यस्मिन्पदे परमं पदं तत्परिमार्गितव्यमन्विष्य ज्ञातव्यमित्यर्थः।सोऽन्वेष्टव्यः स विजज्ञासितव्यः इति श्रुतेः। किं तदिति तत्राह। यस्मिन्पदे गताः प्रविष्टा भूयः पुनर्न निवर्तन्ते संसाराय नावर्तन्तेन स पुनरावर्तते न स पुनरावर्तते इति श्रुतेः। तत्कथं परिमार्गितव्यमित्याकाङ्क्षायामाह -- तमिति। यः यच्छब्देनोक्तस्तमेवादौ भवमाद्यं पुरुषं पूर्णं प्रपद्ये शरणं कतोस्मीत्येवं तच्छरणतया परिमार्गितव्यमित्यर्थः। तथाच श्रुतिःयो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये।परीत्य भूतानि परीत्य लोकान्परीत्य सर्वाः प्रदिशो दिशश्च। उपस्थाय प्रतमजामृतस्यात्मनात्मानभिसंविवेष इत्याद्या। सर्वे? भूतेष्वहमस्मि सर्वाणि भूतानि च मयि सन्तीति परिज्ञाय। एवमग्रेऽपि प्रथमजां वाचं ऋतस्य श्रीविष्णोरात्मानं स्वरुपमभिसंविवेश आश्रितवानित्यर्थः। कोऽसौ पुरुष इति तत्राह। यतो यस्मान्मायामयस्य संसारवृक्षस्य प्रवृत्तिः प्रसृता निःसृता ऐन्द्रजालिकादिव मायामयवृक्षप्रवृत्तिः। इतआरभ्य प्रवृत्ता इति तु वक्तुं न शक्यत इत्याशयेनाह। पुराणी चिरंतनी। यत्तु संसारिणां मोक्षप्रवृत्तिसिद्धये स्वयमसंसार्यपि भगवान्साक्षात्कर्तव्यं प्राप्यं चाविद्यातीतमात्मानं स्वस्यापि प्राप्यस्थानत्वेनाऽऽकारेण प्रकटयति तमेवेति। यतः यत्र अपुराणी नूतनेति तन्नोषादेयम्।मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय।ब्राह्मणो हि प्रतिष्ठाहं -- शाश्वतस्यामृतस्य च।नान्तो न चादिः इत्यादिभगवद्वचनाननुरुपत्वात्।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| na | not |
| rūpam | form |
| asya | of this |
| iha | in this world |
| tathā | as such |
| upalabhyate | is perceived |
| na | neither |
| antaḥ | end |
| na | nor |
| cha | also |
| ādiḥ | beginning |
| na | never |
| cha | also |
| sampratiṣhṭhā | the basis |
| aśhvattham | sacred fig tree |
| enam | this |
| su | virūḍha |
| asaṅga | śhastreṇa |
| dṛiḍhena | strong |
| chhittvā | having cut down |
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उस संसारवृक्षकी गुणों-(सत्त्व, रज और तम-) के द्वारा बढ़ी हुई तथा विषयरूप कोंपलोंवाली शाखाएँ नीचे, मध्यमें और ऊपर सब जगह फैली हुई हैं। मनुष्यलोकमें कर्मोंके अनुसार बाँधनेवाले मूल भी नीचे और ऊपर (सभी लोकोंमें) व्याप्त हो रहे हैं। — VaniSagar
उसके बाद उस परमपद-(परमात्मा-) की खोज करनी चाहिये जिसको प्राप्त होनेपर मनुष्य फिर लौटकर संसारमें नहीं आते और जिससे अनादिकालसे चली आनेवाली यह सृष्टि विस्तारको प्राप्त हुई है, उस आदिपुरुष परमात्माके ही मैं शरण हूँ। — VaniSagar
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“इस संसारवृक्षका जैसा रूप देखनेमें आता है, वैसा यहाँ (विचार करनेपर) मिलता नहीं; क्योंकि इसका न तो आदि है, न अन्त है और न स्थिति ही है। इसलिये इस दृढ़ मूलोंवाले संसाररूप अश्वत्थवृक्षको दृढ़ असङ्गतारूप शस्त्रके द्वारा काटकर - — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ: "इस संसारवृक्षका जैसा रूप देखनेमें आता है, वैसा यहाँ (विचार करनेपर) मिलता नहीं; क्योंकि इसका न तो आदि है, न अन्त है और न स्थिति ही है। इसलिये इस दृढ़ मूलोंवाले संसाररूप अश्वत्थवृक्षको दृढ़ असङ्गतारूप शस्त्रके द्वारा काटकर - — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Purushottama Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 3?
Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 3 translates to: "Its form is not perceived here as such, nor its end, origin, foundation, or resting place; having cut asunder this firmly rooted peepul tree with the strong axe of non-attachment. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 15, श्लोक 3 है जो Bhagavad Gita के Purushottama Yoga में संकलित है। इस संसारवृक्षका जैसा रूप देखनेमें आता है, वैसा यहाँ (विचार करनेपर) मिलता नहीं; क्योंकि इसका न तो आदि है, न अन्त है और न स्थिति ही है। इसलिये इस दृढ़ मूलोंवाले संसाररूप अश्वत्थवृक्षको दृढ़ असङ्गतारूप शस्त्रके द्वारा काटकर - — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "na rūpam asyeha tathopalabhyate" mean in English?
"na rūpam asyeha tathopalabhyate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 3. Its form is not perceived here as such, nor its end, origin, foundation, or resting place; having cut asunder this firmly rooted peepul tree with the strong axe of non-attachment. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.