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Sudarshana Chakra
Adhyay 15, Shlok 20
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ।एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत

हे निष्पाप अर्जुन ! इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। हे भरतवंशी अर्जुन ! इसको जानकर मनुष्य ज्ञानवान् (तथा प्राप्त-प्राप्तव्य) और कृतकृत्य हो जाता है। — VaniSagar

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KannadaIND

ಹೀಗೆ, ನಾನು ನಿಮಗೆ ಈ ಅತ್ಯಂತ ರಹಸ್ಯವಾದ ವಿಜ್ಞಾನವನ್ನು ನೀಡಿದ್ದೇನೆ, ಓ ಪಾಪರಹಿತ; ಇದನ್ನು ತಿಳಿದುಕೊಳ್ಳುವುದರಿಂದ, ಒಬ್ಬನು ಬುದ್ಧಿವಂತನಾಗುತ್ತಾನೆ ಮತ್ತು ಅವರ ಎಲ್ಲಾ ಕರ್ತವ್ಯಗಳು ನೆರವೇರುತ್ತವೆ, ಓ ಅರ್ಜುನ.

NepaliIND

यसरी, हे पापरहित, मैले तिमीलाई यो परम गोप्य विज्ञान सिकाएको छु; यो थाहा पाएर ज्ञानी बन्छ र सबै कर्तब्य पूरा हुन्छ, हे अर्जुन।

OdiaIND

ଅତଏବ, ହେ ପାପହୀନ, ମୁଁ ତୁମକୁ ଏହି ଗୁପ୍ତ ବିଜ୍ଞାନ ପ୍ରଦାନ କରିଛି; ଏହା ଜାଣି ଜଣେ ଜ୍ଞାନୀ ହୁଏ, ଏବଂ ସେମାନଙ୍କର ସମସ୍ତ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ସମ୍ପନ୍ନ ହୁଏ, ଅର୍ଜୁନ |

SindhiIND

اهڙيءَ طرح، مون تو کي هي سڀ کان ڳجهو علم ٻڌايو آهي، اي بي گناهه؛ هي ڄاڻڻ سان، ماڻهو عقلمند ٿي ويندو آهي، ۽ انهن جا سڀ فرض پورا ٿي ويندا آهن، اي ارجن.

PunjabiIND

ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ, ਮੈਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਇਹ ਸਭ ਤੋਂ ਗੁਪਤ ਵਿਗਿਆਨ ਸਿਖਾਇਆ ਹੈ, ਹੇ ਪਾਪ ਰਹਿਤ; ਇਸ ਨੂੰ ਜਾਣ ਕੇ, ਬੰਦਾ ਸਿਆਣਾ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਸਾਰੇ ਕਰਤੱਵ ਪੂਰੇ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ।

TeluguIND

ఈ విధంగా, ఓ పాపరహితుడా, నేను మీకు ఈ అత్యంత రహస్య శాస్త్రాన్ని అందించాను; దీనిని తెలుసుకోవడం ద్వారా, ఒక వ్యక్తి జ్ఞానవంతుడు అవుతాడు మరియు వారి విధులన్నీ నెరవేరుతాయి, ఓ అర్జునా.

GujaratiIND

આમ, હે નિર્દોષ, મેં તમને આ સૌથી ગુપ્ત વિજ્ઞાન આપ્યું છે; આ જાણીને, વ્યક્તિ જ્ઞાની બને છે, અને હે અર્જુન, તેમની બધી ફરજો પૂર્ણ થાય છે.

MalayalamIND

അങ്ങനെ, പാപമില്ലാത്തവനേ, ഈ അതിരഹസ്യമായ ശാസ്ത്രം ഞാൻ നിനക്ക് പകർന്നുതന്നിരിക്കുന്നു. ഇതറിയുന്നതിലൂടെ ഒരാൾ ജ്ഞാനിയാകുന്നു, ഹേ അർജുനാ, അവരുടെ എല്ലാ കർത്തവ്യങ്ങളും പൂർത്തീകരിക്കപ്പെടുന്നു.

TamilIND

இவ்வாறே, பாவமில்லாதவனே, இந்த மிக இரகசியமான அறிவியலை நான் உனக்குக் கொடுத்தேன்; இதை அறிந்துகொள்வதன் மூலம், ஒருவன் ஞானியாகிறான், மேலும் அவர்களது கடமைகள் அனைத்தும் நிறைவேற்றப்படுகின்றன, ஓ அர்ஜுனா.

MarathiIND

अशा प्रकारे, हे परम गुप्त शास्त्र मी तुला दिले आहे, हे पापरहित; हे जाणून घेतल्याने मनुष्य ज्ञानी होतो आणि हे अर्जुना, त्यांची सर्व कर्तव्ये पूर्ण होतात.

BengaliIND

এইভাবে, আমি তোমাকে এই অতি গোপন বিজ্ঞান প্রদান করেছি, হে পাপহীন; এই জানার দ্বারা, মানুষ জ্ঞানী হয়, এবং তাদের সমস্ত কর্তব্য সম্পন্ন হয়, হে অর্জুন।

MaithiliIND

एहि तरहें हम अहाँ केँ ई अत्यंत गुप्त विज्ञान प्रदान केलहुँ, हे पाप; ई जानि ज्ञानी भऽ जाइत अछि, आ हुनका लोकनिक सब कर्तव्य सिद्ध होइत छनि हे अर्जुन |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- अनघ -- अर्जुनको निष्पाप इसलिये कहा गया है कि वे दोषदृष्टि(असूया) से रहित थे। दोषदृष्टि करना पाप है। इससे अन्तःकरण अशुद्ध होता है। जो दोषदृष्टिसे रहित होता है? वही भक्तिका पात्र होता है।गोपनीय बात दोषदृष्टिसे रहित मनुष्यके सामने ही कही जाती है । यदि दोषदृष्टिवाले मनुष्यके सामने गोपनीय बात कह दी जाय? तो उस मनुष्यपर उस बातका उलटा असर पड़ता है अर्थात् वह उस गोपनीय बातका उलटा अर्थ लगाकर वक्तामें भी दोष देखने लगता है कि यह आत्मश्लाघी है दूसरोंको मोहित करनेके लिये कहता है इत्यादि। इससे दोषदृष्टिवाले मनुष्यकी बहुत हानि होती है।दोषदृष्टि होनेमें खास कारण है -- अभिमान। मनुष्यमें जिस बातका अभिमान हो? उस बातकी उसमें कमी होती है। उस कमीको वह दूसरोंमें देखने लगता है। अपनेमें अच्छाईका अभिमान होनेसे दूसरोंमें बुराई दीखती है और दूसरोंमें बुराई देखनेसे ही अपनमें अच्छाईका अभिमान आता है।यदि दोषदृष्टिवाले मनुष्यके सामने भगवान् अपनेको सर्वोपरि पुरुषोत्तम कहें? तो उसको विश्वास नहीं होगा? उलटे वह यह सोचेगा कि भगवान् आत्मश्लाघी (अपने मुँह अपने बड़ाई करनेवाले) हैं --,निज अग्यान राम पर धरहीं। (मानस 7। 73। 5)भगवान्के प्रति दोषदृष्टि होनेसे उसकी बहुत हानि होती है। इसलिये भगवान् और संतजन दोषदृष्टिवाले अश्रद्धालु मनुष्यके सामने गोपनीय बातें प्रकट नहीं करते (गीता 18। 67)। वास्तवमें देखा जाय तो दोषदृष्टिवाले मनुष्यके सामने गोपनीय (रहस्ययुक्त) बातें मुखसे निकलती ही नहीं अर्जुनके लिये अनघ सम्बोधन देनेमें यह भाव भी हो सकता है कि इस अध्यायमें भगवान्ने जो परमगोपनीय प्रभाव बताया है? वह अर्जुनजैसे दोषदृष्टिसे रहित सरल पुरुषके सम्मुख ही प्रकट किया जा सकता है।इति गुह्यतमं शास्त्रमिदम् -- चौदहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें अव्यभिचारिणी भक्तिकी बात कहनेके बाद भगवान्ने पन्द्रहवें अध्यायके पहले श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक जिस (क्षर? अक्षर और पुरुषोत्तमके) विषयका वर्णन किया है? उस विषयकी पूर्णता और लक्ष्यका निर्देश यहाँ इति इदम् पदोंसे किया गया है।इस अध्यायमें पहले भगवान्ने क्षर (संसार) और अक्षर(जीवात्मा) का वर्णन करके अपना अप्रतिम प्रभाव (बारहवेंसे पंद्रहवें श्लोकतक) प्रकट किया। फिर भगवान्ने यह गोपनीय बात प्रकट की कि जिसका यह सब प्रभाव है? वह (क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम) पुरुषोत्तम मैं ही हूँ।नाटकमें स्वाँग धारण किये हुए मनुष्यकी तरह भगवान् इस पृथ्वीपर मनुष्यका स्वाँग धारण करके अवतरित होते हैं और ऐसा बर्ताव करते हैं कि अज्ञानी मनुष्य उनको नहीं जान पाते (गीता 7। 24)। स्वाँगमें अपना वास्तविक परिचय नहीं दिया जाता? गुप्त रखा जाता है। परन्तु भगवान्ने इस अध्यायमें (अठारहवें श्लोकमें) अपना वास्तविक परिचय देकर अत्यन्त गोपनीय बात प्रकट कर दी कि मैं ही पुरुषोत्तम हूँ। इसलिये इस अध्यायको गुह्यतम कहा गया है।शास्त्र में प्रायः संसार? जीवात्मा और परमात्माका वर्णन आता है। इन तीनोंका ही वर्णन पंद्रहवें अध्यायमें हुआ है? इसलिये इस अध्यायको शास्त्र भी कहा गया है।सर्वशास्त्रमयी गीतामें केवल इसी अध्यायको शास्त्र की उपाधि मिली है। इसमें पुरुषोत्तम का वर्णन मुख्य होनेके कारण इस अध्यायको गुह्यतम शास्त्र कहा गया है। इस गुह्यतम शास्त्रमें भगवान्ने अपनी प्राप्तिके छः उपायोंका वर्णन किया है --,(1) संसारको तत्त्वसे जानना (श्लोक 1)।(2) संसारसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद करके एक भगवान्के शरण होना (श्लोक 4)।(3) अपनेमें स्थित परमात्मतत्त्वको जानना (श्लोक 11)।(4) वेदाध्ययनके द्वारा तत्त्वको जानना (श्लोक 15)।(5) भगवान्को पुरुषोत्तम जानकर सब प्रकारसे उनका भजन करना (श्लोक 19)।(6) सम्पूर्ण अध्यायके तत्त्वको जानना (श्लोक 20)।जिस अध्यायमें भगवत्प्राप्तिके ऐसे सुगम उपाय बताये गये हों? उसको शास्त्र कहना उचित ही है।मया उक्तम् -- इन पदोंसे भगवान् यह कहते हैं कि सम्पूर्ण भौतिक जगत्का प्रकाशक और अधिष्ठान? समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित? वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य एवं क्षर और अक्षर दोनोंसे उत्तम साक्षात् मुझ पुरुषोत्तमके द्वारा ही यह गुह्यतम शास्त्र अत्यन्त कृपापूर्वक कहा गया है। अपने विषयमें जैसा मैं कह सकता हूँ? वैसा कोई नहीं कह सकता। कारण कि दूसरा पहले (मेरी ही कृपाशक्तिसे) मेरेको जानेगा ? फिर वह मेरे विषयमें कुछ कहेगा? जबकि मेरेमें अनजानपना है ही नहीं।वास्तवमें स्वयं भगवान्के अतिरिक्त दूसरा कोई भी उनको पूर्णरूपसे नहीं जान सकता (गीता 10। 2? 15)। छठे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें अर्जुनने भगवान्से कहा था कि आपके सिवाय दूसरा कोई भी मेरे संशयका छेदन नहीं कर सकता। यहाँ भगवान् मानो यह कह रहे हैं कि मेरे द्वारा कहे हुए विषयमें किसी प्रकारका संशय रहनेकी सम्भावना ही नहीं है।एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत -- पूरे अध्यायमें भगवान्ने जो संसारकी वास्तविकता? जीवात्माके स्वरूप और अपने अप्रतिम प्रभाव एवं गोपनीयताका वर्णन किया है? उसका (विशेषरूपसे उन्नीसवें श्लोकका) निर्देश यहाँ एतत् पदसे किया गया है। इस गुह्यतम शास्त्रको जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता है? वह ज्ञानवान् अर्थात् ज्ञातज्ञातव्य हो जाता है। उसके लिये कुछ भी जानना शेष नहीं रहता क्योंकि उसने जाननेयोग्य पुरुषोत्तमको जान लिया।परमात्मतत्त्वको जाननेसे मनुष्यकी मूढ़ता नष्ट हो जाती है। परमात्मतत्त्वको जाने बिना लौकिक सम्पूर्ण विद्याएँ? भाषाएँ? कलाएँ आदि क्यों न जान ली जायँ? उनसे मूढ़ता नहीं मिटती क्योंकि लौकिक सब विद्याएँ आरम्भ और समाप्त होनेवाली तथा अपूर्ण हैं। जितनी लौकिक विद्याएँ हैं? सब परमात्मासे ही प्रकट होनेवाली हैं अतः वे परमात्माको कैसे प्रकाशित कर सकती हैं इन सब लौकिक विद्याओंसे अनजान होते हुए भी जिसने परमात्माको जान लिया है? वही वास्तवमें ज्ञानवान् है।उन्नीसवें श्लोकमें सब प्रकारसे भजन करनेवाले जिस मोहरहित भक्तको सर्ववित् कहा गया है? उसीको यहाँ बुद्धिमान् नामसे कहा गया है।यहाँ च पदमें पूर्वश्लोकमें आयी बातके फल(प्राप्तप्राप्तव्यता) का अनुकर्षण है। पूर्वश्लोकमें सर्वभावसे भगवान्का भजन करने अर्थात् अव्यभिचारिणी भक्तिकी बात विशेषरूपसे आयी है। भक्तिके समान कोई लाभ नहीं है -- लाभु कि किछु हरि भगति समाना (मानस 7। 112। 4)। अतः जिसने भक्तिको प्राप्त कर लिया? वह प्राप्तप्राप्तव्य हो जाता है अर्थात् उसके लिये कुछ भी पाना शेष नहीं रहता।भगवत्तत्त्वकी यह विलक्षणता है कि कर्मयोग? ज्ञानयोग और भक्तियोग -- तीनोंमेंसे किसी एककी सिद्धिसे कृतकृत्यता? ज्ञातज्ञातव्यता और प्राप्तप्राप्तव्यता -- तीनोंकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये जो भगवत्तत्त्वको जान लेता है? उसके लिये फिर कुछ जानना? पाना और करना शेष नहीं रहता उसका मनुष्यजीवन सफल हो जाता है।इस प्रकार ? तत्? सत् -- इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें पुरुषोत्तमयोग नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ,

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Sri Harikrishnadas Goenka

इस अध्यायमें मोक्षरूप फलके देनेवाले भगवत्तत्त्वज्ञानको कहकर अब उसकी स्तुति करते हैं --, यह गुह्यतम -- सबसे अधिक गोपनीय अर्थात् अत्यन्त गूढ़ रहस्य है। वह क्या है शास्त्र। यद्यपि सारी गीताका नाम ही शास्त्र कहा जाता है? परंतु यहाँ स्तुतिके लिये प्रकरणसे यह ( पंद्रहवाँ ) अध्याय ही शास्त्र नामसे कहा गया है। क्योंकि इस अध्यायमें केवल सारे गीताशास्त्रका अर्थ ही संक्षेपसे नहीं कहा गया है? किन्तु इसमें समस्त वेदोंका अर्थ भी समाप्त हो गया है। यह कहा भी है कि जो उसे जानता है वही वेदको जाननेवाला है समस्त वेदोंसे मैं ही जाननेयोग्य हूँ। हे निष्पाप अर्जुन ऐसा यह ( परम गोपनीय शास्त्र ) मैंने कहा है। हे भारत ऊपर दिखलाये हुए अर्थसे युक्त इस शास्त्रको जानकर ही? मनुष्य बुद्धिमान् और कृतकृत्य होता है? अन्य प्रकारसे नहीं। अभिप्राय यह है कि जिसने करनेयोग्य सब कुछ कर लिया हो? वह कृतकृत्य है? अतः श्रेष्ठ कुलमें जन्म लेनेवाले ब्राह्मणद्वारा जो कुछ किया जानेयोग्य है? वह सब भगवान्का तत्त्व जान लेनेपर किया हुआ हो जाता है। अन्य प्रकारसे किसीके भी कर्तव्यकी समाप्ति नहीं होती। कहा भी है कि हे पार्थ समस्त कर्मसमुदाय? ज्ञानमें सर्वथा समाप्त हो जाता है। तथा मनुका भी वचन है कि विशेषरूपसे ब्राह्मणके जन्मकी यही पूर्णता है क्योंकि इसीको प्राप्त करके द्विज कृतकृत्य होता है अन्य प्रकारसे नहीं। हे भारत क्योंकि तूने मुझसे यह परमार्थतत्त्व सुना है? इसलिये तू कृतार्थ हो गया है।

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Sri Anandgiri

अध्यायार्थमनूद्योपसंहारश्लोकमवतारयति -- अस्मिन्निति। सर्वस्यां गीतायां शास्त्रशब्दे वक्तव्ये कथमस्मिन्नध्याये तत्प्रयोगः स्यादित्याशङ्क्याह -- यद्यपीति। संनिहितमध्यायं स्तोतुमपि कुतस्तत्र शास्त्रशब्दस्तदर्थाभावात्तत्राह -- सर्वो हीति। गीताशास्त्रार्थस्य सर्वस्यात्र संक्षिप्तत्वादेव केवलं शास्त्रशब्दो न भवति किंतु वेदार्थस्यापि सर्वस्यात्रसमाप्तेर्युक्तं शास्त्रपदमित्याह -- नेति। तत्र गमकमाह -- यस्तमिति। भगवत्तत्त्वज्ञाने कृतकृत्यतेत्येतदुपपादयति -- विशिष्टेति। नान्यथेत्युक्तं प्रपञ्चयति -- नचेति। सत्यपि तत्त्वज्ञाने कर्मणां कर्तव्यत्वान्न कर्तव्यसमाप्तिरित्याशङ्क्याह -- सर्वमिति। तत्त्वज्ञाने कृतार्थतेति तत्र मनोरपि संमतिमाह -- एतद्धीति। भारतेति संबोधनतात्पर्यमाह -- यत इति। तदनेनात्मनो देहाद्यतिरिक्तत्वं चिद्रूपत्वं सर्वात्मत्वं कार्यकारणविनिर्मुक्तत्वेनाप्रपञ्चत्वं तस्याखण्डैकरसब्रह्मात्मत्वज्ञानादशेषपुरुषार्थपरिसमाप्तिरित्युक्तम्।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छुद्धानन्दपूज्यपादशिष्यानन्दगिरिकृतौ पञ्चदशोऽध्यायः

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Sri Dhanpati

एवमस्मिन्नध्याये भगवत्तत्त्वज्ञानं मोक्षफलकमुत्तमुपसंहरन् तत्स्तौति -- इतीति। इत्येद्गुह्यतमं गोप्यं कर्मतत्त्वं गुह्यतरमुपासनातत्त्वं इदं तु परमात्मतत्त्वं गोप्यतममत्यन्तरहस्यं शास्त्रं समस्तस्य गीताख्यशास्त्रस्य सर्वस्य वेदस्य चार्थोऽस्मिन्नधाये संक्षेपेणोक्तःयस्तं वेद स वेदवित्।वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः इति च। अतोऽस्याध्यायस्य सकलशास्त्ररुपत्वादिदं शास्त्रमुक्तं मया कथितम्। हेऽनघाव्यसन निष्पाप? अनघस्य त्वादृशस्यैवास्मिन् शास्त्रेऽधिकारत्वादिति भावः। एतच्छास्त्रं यथादर्शितार्थं बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यान्नान्यथा। कृतकृत्यश्च कृतं येन स विशिष्टन्मना ब्राह्मणेन यत्कर्तव्यं तत्सर्वं भगवत्तत्वे विदिते कृतं भवेदित्यर्थः। नचान्यथा कस्यचिदपि कर्तव्यता परिसमाप्यत इत्याशयः। तथाचोक्तंसर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते। मनुरप्याहएतद्वि जन्मसामग्र्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः। प्राप्यैतत्कृतत्यो हि द्विजो भवति नान्यथा इति। यत एतत्परमार्थतत्त्वं मत्तः श्रुतवानस्यतः कृतार्थस्त्वं उत्तमवंशोद्भवत्वं सार्थकं कृतवानसीति ध्वनयन्संबोधयति भारतेति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
itithese
guhyatamam
śhāstramVedic scriptures
idamthis
uktamspoken
mayāby me
anaghaArjun, the sinless one
etatthis
buddhvāunderstanding
buddhimān
syātone becomes
kṛitakṛityaḥ
chaand
bhārataArjun, the son of Bharat
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 15.19
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत

हे भरतवंशी अर्जुन ! इस प्रकार जो मोहरहित मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ सब प्रकारसे मेरा ही भजन करता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 15Shlok 20
Bhagavad Gita · Adhyay 15, Shlok 20
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ।एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत

हे निष्पाप अर्जुन ! इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। हे भरतवंशी अर्जुन ! इसको जानकर मनुष्य ज्ञानवान् (तथा प्राप्त-प्राप्तव्य) और कृतकृत्य हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ: "हे निष्पाप अर्जुन ! इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। हे भरतवंशी अर्जुन ! इसको जानकर मनुष्य ज्ञानवान् (तथा प्राप्त-प्राप्तव्य) और कृतकृत्य हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Purushottama Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 20?

Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 20 translates to: "Thus, I have imparted to you this most secret science, O sinless one; by knowing this, one becomes wise, and all their duties are accomplished, O Arjuna. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ।एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भा" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 15, श्लोक 20 है जो Bhagavad Gita के Purushottama Yoga में संकलित है। हे निष्पाप अर्जुन ! इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। हे भरतवंशी अर्जुन ! इसको जानकर मनुष्य ज्ञानवान् (तथा प्राप्त-प्राप्तव्य) और कृतकृत्य हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "iti guhyatamaṁ śhāstram idam uktaṁ mayānagha" mean in English?

"iti guhyatamaṁ śhāstram idam uktaṁ mayānagha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 20. Thus, I have imparted to you this most secret science, O sinless one; by knowing this, one becomes wise, and all their duties are accomplished, O Arjuna. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.