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Bhagavad Gita · BG 15.2

Bhagavad Gita 15.2 — Commentary

20 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti

Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more

Sanskrit Original — मूल श्लोक

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके

adhaśh chordhvaṁ prasṛitās tasya śhākhā guṇa-pravṛiddhā viṣhaya-pravālāḥ adhaśh cha mūlāny anusantatāni karmānubandhīni manuṣhya-loke

"Its branches spread below and above, nourished by the Gunas; its buds are sense-objects, and its roots stretch forth below in the world of men, originating action."

Scholar Commentaries (20)

Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.

Sri Shankaracharya

8th century CE · Advaita Vedanta

Advaita

The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.

,अधः मनुष्यादिभ्यो यावत् स्थावरम् ऊर्ध्वं च यावत् ब्रह्मणः विश्वसृजो धाम इत्येतदन्तं यथाकर्म यथाश्रुतं ज्ञानकर्मफलानि? तस्य वृक्षस्य शाखा इव शाखाः प्रसृताः प्रगताः? गुणप्रवृद्धाः गुणैः सत्त्वरजस्तमोभिः प्रवृद्धाः स्थूलीकृताः उपादानभूतैः? विषयप्रवालाः विषयाः शब्दादयः प्रवालाः इव देहादिकर्मफलेभ्यः शाखाभ्यः अङ्कुरीभवन्तीव? तेन विषयप्रवालाः शाखाः। संसारवृक्षस्य परममूलं उपादानकारणं पूर्वम् उक्तम्। अथ इदानीं कर्मफलजनितरागद्वेषादिवासनाः मूलानीव धर्माधर्मप्रवृत्तिकारणानि अवान्तरभावीनि तानि अधश्च देवाद्यपेक्षया मूलानि अनुसंततानि अनुप्रविष्टानि कर्मानुबन्धीनि कर्म धर्माधर्मलक्षणम् अनुबन्धः पश्चाद्भावि? येषाम् उद्भूतिम् अनु उद्भवति? तानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके विशेषतः। अत्र हि मनुष्याणां कर्माधिकारः प्रसिद्धः।।यस्तु अयं वर्णितः संसारवृक्षः --,

Sri Ramanuja

11th–12th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.

अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके। ब्रह्मलोकमूलस्य अस्य वृक्षस्य मनुष्याग्रस्य अधः मनुष्यलोके मूलानि अनुसंततानि तानि च कर्मानुबन्धीनि। कर्माणि एव अनुबन्धीनि मूलानि अधो मनुष्यलोके च भवति इत्यर्थः। मनुष्यत्वावस्थायां कृतैः हि कर्मभिः अधो मनुष्यपश्वादयः ऊर्ध्वं च देवादयो भवन्ति।

Sri Madhavacharya

13th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.

अव्यक्तेऽपि सूक्ष्मरूपेण सन्ति शरीरादौ च भूतानीत्यधश्चोर्ध्वं च प्रसृताः गुणैः सत्त्वादिभिः प्रतीतिमात्रसुखत्वात्प्रवाला विषयाः। मूलानि भगवद्रूपादीनि। भगवानपि कर्मानुबन्धेन हि फलं ददाति। तथा च भाल्लवेयशाखायाम् -- ब्रह्म वाऽस्य पृथङ्मूलं प्रकृतिः समूलं सत्त्वा दयोऽर्वाचीनमूलम्। भूतानि शाखा छन्दांसि पर्णानि देवा नृतिर्यञ्चश्च शाखाः। पत्रेभ्यो हि फलं जायते। मात्राः शिफाः। मुक्तिः फलं अमुक्तिः फलम्। मोक्षो रसोऽमोक्षो रसः। अव्यक्ते च शाखाः व्यक्ते च शाखाः। अव्यक्ते च मूलं व्यक्ते च मूलम्। एषोऽश्वत्थो गुणालोलपत्रो न स्थीयते न स्थीयते। न ह्येष कदाचनान्यथा जायते नान्यथा जायते इति।

Swami Chinmayananda

20th century CE · Neo-Vedanta

Neo-Vedanta

Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.

संसार वृक्ष का और विस्तृत चित्रांकन इस श्लोक में किया गया है। गूढ़ अभिप्राय वाले प्रतीकों को शब्दश नहीं लेना चाहिये? फिर वे प्रतीक साहित्य के हों अथवा कला के। वेदों की शैली ही लक्षणात्मक है। दर्शनशास्त्र के सूक्ष्म सिद्धान्तों को व्यक्त करने के लिए जगत् की किसी उपयुक्त वस्तु का वर्णन ऐसी काव्यात्मक शैली में करना? जिससे धर्म के गूढ़ सन्देश या अभिप्राय का बोध कराया जा सके? लक्षणात्मक शैली कही जाती है।भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस वृक्ष की शाखाएं ऊपर और नीचे फैली हुईं हैं। इनसे तात्पर्य देवता? मनुष्य? पशु इत्यादि योनियों से है। मनुष्य के व्यक्तिगत तथा जगत् के विकास की दिशा कभी उन्नति की ओर होती है? किन्तु प्राय यह पशु जीवन के निम्न स्तर की ओर रहती है। अध और ऊर्ध्व इन दो शब्दों से इन्हीं दो दिशाओं अथवा प्रवृत्तियों की ओर निर्देश किया गया है।गुणों से प्रवृद्ध हुई जीवों की ऊर्ध्व या अधोगामी प्रवृत्तियों का धारण पोषण प्रकृति के सत्त्व? रज और तम? इन तीन गुणों के द्वारा किया जाता है। इन गुणों का विस्तृत विवेचन पूर्व अध्याय में किया जा चुका है।किसी भी वृक्ष की शाखाओं पर हम अंकुर या कोपलें देख सकते हैं जहाँ से अवसर पाकर नईनई शाखाएं फूटकर निकलती हैं। प्रस्तुत रूपक में इन्द्रियों के शब्दस्पर्शादि विषयों को प्रवाल अर्थात् अंकुर कहा गया है। यह सुविदित तथ्य है कि विषयों की उपस्थिति में हम अपने उच्च आदर्शों को विस्मृत कर विषयाभिमुख हो जाते हैं। तत्पश्चात् उन भोगों की पूर्ति के लिये उन्मत्त होकर नयेनये कर्म करते हैं। अत विषयों को प्रवाल कहना समीचीन है।इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस वृक्ष की गौण जड़ें नीचे फैली हुई हैं। परमात्मा तो इस संसार वृक्ष का अधिष्ठान होने से इसका मुख्य मूल है किन्तु इसकी अन्य जड़े भी हैं ? जो इस वृक्ष का अस्तित्व बनाये रखती हैं। मनुष्य देह में यह जीव असंख्य प्रकार के कर्म और कर्मफल का भोग करता है? जिसके फलस्वरूप उसके मन में नये संस्कार या वासनाएं अंकित होती जाती हैं। ये वासनाएं ही अन्य जड़ें हैं? जो मनुष्य को अपनी अभिव्यक्ति के लिये कर्मों में प्रेरित करती रहती हैं। शुभ और अशुभ कर्मों का कारण भी ये वासनाएं ही हैं। जैसा कि लोक में हम देखते हैं? वृक्ष की ये अन्य जड़ें ऊपर से नीचे पृथ्वी में प्रवेश कर वृक्ष को दृढ़ता से स्थिर कर देती हैं? वैसे ही ये संस्कार शुभाशुभ कर्म और कर्मफल को उत्पन्न कर मनुष्य को इस लोक के राग और द्वेष? लाभ और हानि? आय और व्यय आदि प्रवृत्तियों के साथ बाँध देते हैं।अगले दो श्लोकों में इसका वर्णन किया गया है कि किस प्रकार हम इस संसार वृक्ष को काटकर इसके ऊर्ध्वमूल परमात्मा का अपने आत्मस्वरूप से अनुभव कर सकते हैं

Swami Sivananda

20th century CE · Integral Yoga

Integral Yoga

Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.

15.2 अधः below? च and? ऊर्ध्वम् above? प्रसृताः spread? तस्य its? शाखाः branches? गुणप्रवृद्धाः nourished by the Gunas? विषयप्रवालाः senseobjects (are) its buds? अधः below? च and? मूलानि the roots? अनुसन्ततानि are stretched forth? कर्मानुबन्धीनि originating action? मनुष्यलोके in the world of men.Commentary The countless objects? large and small? which life needs are all products of the five elements through the activity of the alities. This tree of Samsara is nourished by the three alities of Nature. The senseobjects are its buds and the roots which grow downwards are the bonds of Karma for those who lead a life of passion and attachment in this world? who are under the sway of likes and dislikes. The sprouts of this marvellous tree are the charming objects of the senses with their characteristics of sound? touch? colour? taste and smell. The roots? the Karmic tendencies from the past lives? grow downwards to generate the bonds of Karma in the world of men. These roots strengthen the bondage by further actions.The primal root is ignorance from which arises the eightfold Nature -- the five elements? mind? intellect and egoism. From the stem of the tree spring four branches called Svedaja? Andaja?,Jarayuja and Udbhijja. Eightyfour lakhs (eight million and four hundred thousand) of species came into being.One branch shoots straight upwards. This is the branch of Dharma which yields the fruit of enjoyment in heaven. Another branch is the branch of dispassion which yields the fruit of Selfrealisation. The sun? the planets? the manes and the sages have also come out of this wonderful tree. Above them are the branches of the worlds of Indra and the gods. Still higher are those of the sages and the men of austerities and penance. Still higher is the Satyaloka where Hiranyagarbha dwells.From man down to the immovable objects below and from him up to the realm of the Creator above? whatever regions are attained in accordance with the nature of knowledge or action? they are the ramifying branches of the tree of Samsara. They are nurtured and fattened by the three Gunas which form their material base.The senseobjects such as sound? touch? colour? taste and smell represent the buds that sprout from the branches of the physical bodies which are the products of actions.The highest root of this wondeful tree is Brahman. The secondary roots are the latent impressions (Samskaras) of likes and dislikes? which spread in this world of men and impel them to perform virtuus and vicious actions and bind them fast to actions.Now listen to the way by which this tree can be cut off. Only he who thus cuts his bondage to this tree of Samsara can be happy even in this world. He has the highest wisdom because he stands as a spectator of this tree and knows it as it is? without being tied to it.

Swami Ramsukhdas

20th century CE · Gita Press Gorakhpur

Bhakti

Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.

व्याख्या -- तस्य शाखा गुणप्रवृद्धाः -- संसारवृक्षकी मुख्य शाखा ब्रह्मा है। ब्रह्मासे सम्पूर्ण देव? मनुष्य? तिर्यक् आदि योनियोंकी उत्पत्ति और विस्तार हुआ है। इसलिये ब्रह्मलोकसे पातालतक जितने भी लोक तथा उनमें रहनेवाले देव? मनुष्य? कीट आदि प्राणी हैं? वे सभी संसारवृक्षकी शाखाएँ हैं। जिस प्रकार जल सींचनेसे वृक्षकी शाखाएँ बढ़ती हैं? उसी प्रकार गुणरूप जलके सङ्गसे इस संसारवृक्षकी शाखाएँ बढ़ती हैं। इसीलिये भगवान्ने जीवात्माके ऊँच? मध्य और नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण गुणोंका सङ्ग ही बताया है (गीता 13। 21 14। 18)। सम्पूर्ण सृष्टिमें ऐसा कोई देश? वस्तु? व्यक्ति नहीं? जो प्रकृतिसे उत्पन्न तीनों गुणोंसे रहित हो (गीता 18। 40)। इसलिये गुणोंके सम्बन्धसे ही संसारकी स्थिति है। गुणोंकी अनुभूति गुणोंसे उत्पन्न वृत्तियों तथा पदार्थोंके द्वारा होती है। अतः वृत्तियों तथा पदार्थोंसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करानेके लिये ही गुणप्रवृद्धाः पद देकर भगवान्ने यहाँ यह बताया है कि जबतक गुणोंसे किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध है? तबतक संसारवृक्षकी शाखाएँ बढ़ती ही रहेंगी। अतः संसारवृक्षका छेदन करनेके लिये गुणोंका सङ्ग किञ्चिन्मात्र भी नहीं रखना चाहिये क्योंकि गुणोंका सङ्ग रहते हुए संसारसे सम्बन्धविच्छेद नहीं हो सकता।विषयप्रवालाः -- जिस प्रकार शाखासे निकलनेवाली नयी कोमल पत्तीके डंठलसे लेकर पत्तीके अग्रभागतकको प्रवाल (कोंपल) कहा जाता है? उसी प्रकार गुणोंकी वृत्तियोंसे लेकर दृश्य पदार्थमात्रको यहाँ,विषयप्रवालाः कहा गया है।वृक्षके मूलसे तना (मुख्य शाखा)? तनेसे शाखाएँ और शाखाओँसे कोंपलें फूटती हैं और कोंपलोंसे शाखाएँ आगे बढ़ती हैं। इस संसारवृक्षमें विषयचिन्तन ही कोंपलें हैं। विषयचिन्तन तीनों गुणोंसे होता है। जिस प्रकार गुणरूप जलसे संसारवृक्षकी शाखाएँ बढ़ती हैं? उसी प्रकार गुणरूप जलसे विषयरूप कोंपलें भी बढ़ती हैं। जैसे कोंपलें दीखती हैं? उनमें व्याप्त जल नहीं दीखता? ऐसे ही शब्दादि विषय तो दीखते हैं? पर उनमें गुण नहीं दीखते। अतः विषयोंसे ही गुण जाने जाते हैं।विषयप्रवालाः पदका भाव यह प्रतीत होता है कि विषयचिन्तन करते हुए मनुष्यका संसारसे सम्बन्धविच्छेद नहीं हो सकता (गीता 2। 62 -- 63)। अन्तकालमें मनुष्य जिसजिस भावका चिन्तन करते हुए शरीरका त्याग करता है? उसउस भावको ही प्राप्त होता है (गीता 8। 6) -- यही विषयरूप कोंपलोंका फूटना है।कोंपलोंकी तरह विषय भी देखनेमें बहुत सुन्दर प्रतीत होते हैं? जिससे मनुष्य उनमें आकर्षित हो जाता है। साधक अपने विवेकसे परिणामपर विचार करते हुए इनको क्षणभङ्गुर? नाशवान् और दुःखरूप जानकर इन विषयोंका सुगमतापूर्वक त्याग कर सकता है (गीता 5। 22)। विषयोंमें सौन्दर्य और आकर्षण अपने रागके कारण ही दीखता है? वास्तवमें वे सुन्दर और आकर्षक है नहीं। इसलिये विषयोंमें रागका त्याग ही वास्तविक त्याग है। जैसे कोमल कोंपलोंको नष्ट करनेमें कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता? ऐसे ही इन विषयोंके त्यागमें भी साधकको कठिनता नहीं माननी चाहिये। मनसे आदर देनेपर ही ये विषयरूप कोंपलें सुन्दर और आकर्षक दीखती हैं? वास्तवमें तो ये विषयुक्त लड्डूके समान ही हैं । इसलिये इस संसारवृक्षका छेदन करनेके लिये भोगबुद्धिपूर्वक विषयचिन्तन एवं विषयसेवनका सर्वथा त्याग करना आवश्यक है । अधश्चोर्ध्वं प्रसृताः -- यहाँ च पदको मध्यलोक अर्थात् मनुष्यलोक(इसी श्लोकके मनुष्यलोके कर्मानुबन्धीनि,पदों) का वाचक समझना चाहिये। ऊर्ध्वम् पदका तात्पर्य ब्रह्मलोक आदिसे है? जिसमें जानेके दो मार्ग हैं -- देवयान और पितृयान (जिसका वर्णन आठवें अध्यायके चौबीसवेंपचीसवें श्लोकोंमें शुक्ल और कृष्णमार्गके नामसे हुआ है)। अधः पदका तात्पर्य नरकोंसे है? जिसके भी दो भेद हैं -- योनिविशेष नरक और स्थानविशेष नरक।इन पदोंसे यह कहा गया है कि ऊर्ध्वमूल परमात्मासे नीचे? संसारवृक्षकी शाखाएँ नीचे? मध्य और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं। इसमें मनुष्ययोनिरूप शाखा ही मूल शाखा है क्योंकि मनुष्ययोनिमें नवीन कर्मोंको करनेका अधिकार है। अन्य शाखाएँ भोगयोनियाँ हैं? जिनमें केवल पूर्वकृत कर्मोंका फल भोगनेका ही अधिकार है। इस मनुष्ययोनिरूप मूल शाखासे मनुष्य नीचे (अधोलोक) तथा ऊपर (ऊर्ध्वलोक) -- दोनों ओर जा सकता है और संसारवृक्षका छेदन करके सबसे ऊर्ध्व (परमात्मा) तक भी जा सकता है। मनुष्यशरीरमें ऐसा विवेक है? जिसको महत्त्व देकर जीव परमधामतक पहुँच सकता है और अविवेकपूर्वक विषयोंका सेवन करके नरकोंमें भी जा सकता है। इसीलिये गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है -- नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी।।(मानस 7। 121। 5)अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके -- मनुष्यके अतिरिक्त दूसरी सब भोगयोनियाँ हैं। मनुष्ययोनिमें किये हुए पापपुण्योंका फल भोगनेके लिये ही मनुष्यको दूसरी योनियोंमें जाना पड़ता है। नये पापपुण्य करनेका अथवा पापपुण्यसे रहित होकर मुक्त होनेका अधिकार और अवसर मनुष्यशरीरमें ही है।यहाँ मूलानि पदका तात्पर्य तादात्म्य? ममता और कामनारूप मूलसे है? वास्तविक ऊर्ध्वमूल परमात्मासे नहीं। मैं शरीर हूँ -- ऐसा मानना तादात्म्य है। शरीरादि पदार्थोंको अपना मानना ममता है। पुत्रैषणा? वित्तैषणा और लोकैषणा -- ये तीन प्रकारकी मुख्य कामनाएँ हैं। पुत्रपरिवारकी कामना पुत्रैषणा और धनसम्पत्तिकी कामना वित्तैषणा है। संसारमें मेरा मानआदर हो जाय? मैं बना रहूँ? शरीर नीरोग रहे? मैं शास्त्रोंका पण्डित बन जाऊँ आदि अनेक कामनाएँ लोकैषणा के अन्तर्गत हैं। इतना ही नहीं कीर्तिकी कामना मरनेके बाद भी इस रूपमें रहती है कि लोग मेरी प्रशंसा करते रहें मेरा स्मारक बन जाय मेरी स्मृतिमें पुस्तकें बन जायँ लोग मुझे याद करें? आदि। यद्यपि कामनाएँ प्रायः सभी योनियोंमें न्यूनाधिकरूपसे रहती हैं? तथापि वे मनुष्ययोनिमें ही बाँधनेवाली होती हैं । जब कामनाओंसे प्रेरित होकर मनुष्य कर्म करता है? तब उन कर्मोंके संस्कार उसके अन्तःकरणमें संचित होकर भावी जन्ममरणके कारण बन जाते हैं। मनुष्ययोनिमें किये हुए कर्मोंका फल इस जन्ममें तथा मरनेके बाद भी अवश्य भोगना पड़ता है (गीता 18। 12)। अतः तादात्म्य? ममता और कामनाके रहते हुए कर्मोंसे सम्बन्ध नहीं छूट सकता।यह नियम है कि जहाँसे बन्धन होता है? वहींसे छुटकारा होता है जैसे -- रस्सीकी गाँठ जहाँ लगी है? वहींसे वह खुलती है। मनुष्ययोनिमें ही जीव शुभाशुभ कर्मोंसे बँधता है अतः मनुष्ययोनिमें ही वह मुक्त हो सकता है।पहले श्लोकमें आये ऊर्ध्वमूलम् पदका तात्पर्य है -- परमात्मा? जो संसारके रचयिता तथा उसके मूल आधार हैं और यहाँ मूलानि पदका तात्पर्य है -- तादात्म्य? ममता और कामनारूप मूल? जो संसारमें मनुष्यको बाँधते हैं। साधकको इन (तादात्म्य? ममता और कामनारूप) मूलोंका तो छेदन करना है और ऊर्ध्वमूल परमात्माका आश्रय लेना है? जिसका उल्लेख तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये पदसे इसी अध्यायके चौथे श्लोकमें हुआ है।मनुष्यलोकमें कर्मानुसार बाँधनेवाले तादात्म्य? ममता और कामनारूप मूल नीचे और ऊपर सभी लोकों? योनियोंमें व्याप्त हो रहे हैं। पशुपक्षियोंका भी अपने शरीरसे तादात्म्य रहता है? अपनी सन्तानमें ममता होती है और भूख लगनेपर खानेके लिये अच्छे पदार्थोंकी कामना होती है। ऐसे ही देवताओंमें भी अपने दिव्य शरीरसे तादात्म्य? प्राप्त पदार्थोंमें ममता और अप्राप्त भोगोंकी कामना रहती है। इस प्रकार तादात्म्य? ममता और कामनारूप दोष किसीनकिसी रूपमें ऊँचनीच सभी योनियोंमें रहते हैं। परन्तु मनुष्ययोनिके सिवाय दूसरी योनियोंमें ये बाँधनेवाले नहीं होते। यद्यपि मनुष्ययोनिके सिवाय देवादि अन्य योनियोंमें भी विवेक रहता है? पर भोगोंकी अधिकता होने तथा भोग भोगनेके लिये ही उन योनियोंमें जानेके कारण उनमें विवेकका उपयोग नहीं हो पाता। इसलिये उन योनियोंमें उपर्युक्त दोषोंसे स्वयं को (विवेकके द्वारा) अलग देखना सम्भव नहीं है। मनुष्ययोनि ही ऐसी है? जिसमें (विवेकके कारण) मनुष्य ऐसा अनुभव कर सकता है कि मैं (स्वरूपसे) तादात्म्य? ममता और कामनारूप दोषोंसे सर्वथा रहित हूँ।भोगोंके परिणामपर दृष्टि रखनेकी योग्यता भी मनुष्यशरीरमें ही है। परिणामपर दृष्टि न रखकर भोग भोगनेवाले मनुष्यको पशु कहना भी मानो पशुयोनिकी निन्दा ही करना है क्योंकि पशु तो अपने कर्मफल भोगकर मनुष्ययोनिकी तरफ आ रहा है? पर यह मनुष्य तो निषिद्ध भोग भोगकर पशुयोनिकी तरफ ही जा रहा है। सम्बन्ध -- पीछेके दो श्लोकोंमें संसारवृक्षका जो वर्णन किया गया है? उसका प्रयोजन क्या है -- इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।

Sri Harikrishnadas Goenka

19th–20th century CE · Gita Press

Vaishnava

Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.

अपने उपादानकारणरूप सत्त्व? रज और तमइन तीनों गुणोंसे बढ़ी हुई -- स्थूलभावको प्राप्त हुई और विषयरूपी कोंपलोंवाली? उस वृक्षकी बहुतसी शाखाएँ? जो कि अपनेअपने कर्म और ज्ञानके अनुरूप -- कर्म और ज्ञानकी फलस्वरूपा योनियाँ हैं? नीचेकी ओर मनुष्योंसे लेकर स्थावरपर्यन्त और ऊपरकी ओर धर्म यानी विश्वकर्ता ब्रह्मापर्यन्त? वृक्षकी शाखाओंके समान फैली हुई हैं। कर्मफलरूप देहादि शाखाओंसे शब्दादि विषय? कोंपलोंके समान अङ्कुरितसे होते हैं? इसलिये वे शरीरादिरूप शाखाएँ विषयरूपी कोंपलोंवाली हैं। संसारवृक्षका परम मूल -- उपादानकारण पहले बतलाया जा चुका है। अब कर्मफलजनित रागद्वेष आदिकी वासनाएँ जो मूलके समान धर्माधर्मविषयक प्रवृत्तिका कारण और अवान्तरसे ( आगेपीछे ) होनेवाली हैं ( उनको कहते हैं )। वे मनुष्यलोकमें कर्मानुबन्धिनी वासनारूप मूलें देवादिकी अपेक्षा नीचे भी? अविच्छिन्नरूपसे फैली हुई हैं। पुण्यपापरूप कर्म जिनका अनुबन्ध यानी पीछेपीछे होनेवाला है? अर्थात् जिनकी उत्पत्तिका अनुवर्तन करनेवाला है? वे कर्मानुबन्धी कहलाती हैं। यहाँ मनुष्योंका ही विशेषरूपसे कर्ममें अधिकार प्रसिद्ध है ( इसलिये वे मूलें मनुष्यलोकमें कर्मानुबन्धिनी बतलायी गयी हैं )।

Sri Anandgiri

13th century CE · Advaita

Advaita

Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).

अवयवसंबन्धिन्यपरा प्रागुक्तादतिरिक्ता कल्पनेति यावत्। आमनुष्यलोकादाविरिञ्चेरित्यधःशब्दार्थमाह -- मनुष्यादिभ्य इति। तस्मादेवारभ्य आसत्यलोकादित्यूर्ध्वशब्दार्थमाह -- यावदिति। शाखाशब्दार्थं दर्शयति -- ज्ञानेति। तेषां हेत्वनुगुणत्वेन बहुविधत्वं सूचयति -- यथेति। प्रत्यक्षाणां शब्दादिविषयाणां प्रवालत्वं शाखासु पल्लवत्वम्। अङ्कुरत्वं स्फोरयति -- देहादीति। ऊर्ध्वमूलमित्यत्र संसारवृक्षस्य मूलमुक्तं किमिदानीमधश्च मूलानीत्युच्यते तत्राह -- संसारेति। अनुप्रविष्टत्वं सर्वेषु लिङ्गेष्वनुगततया संततत्वमविच्छिन्नत्वम्। रागादीनां कर्मफलजन्यत्वं प्रकटयति -- कर्मेति। कर्मणां रागादीनां मिथो हेतुहेतुमत्त्वम्। तेषां तथात्वेनानवच्छिन्नतया,प्रवृत्तिर्विशेषतो मनुष्यलोके भवतीत्यत्र हेतुमाह -- अत्र हीति। कर्मव्युत्पत्त्या प्राणिनिकायो लोकः। मनुष्यश्चासौ लोकश्चेत्यधिकृतो ब्राह्मण्यादिविशिष्टो देहो मनुष्यलोकः।

Sri Dhanpati

14th century CE · Vedanta

Advaita

Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.

तस्यैव वृक्षस्यावयवसंबन्धिनीं प्रागुक्तादन्यां कल्पनामाह -- अघश्चेति। मनुष्यलोकमारभ्याऽवीचिपर्यन्तमधः तत,एवारभ्य सत्यलोकपर्यन्तमूर्ध्वं यस्य संसारवृक्षस्य शाखाः कर्मोपास्तिफलानि नानाविधानि। यथाकर्म यथाश्रुतमित्युक्तत्वात् प्रसृताः प्रकर्षेण व्याप्ताः। गुणैरुपादानभूतैः सत्त्वादिभिः प्रवृद्धाः प्रकर्षेण स्थूलीकृताः पूर्वमूर्ध्वमुक्तमथेदानीं कर्मफलजनितरागद्वेषादिवासनामूलानीव मूलानि धर्माधर्मप्रवृत्तिकारणान्येवान्तर्भावीनि तानि देवाद्यपेक्षया अधः मूलानि प्रसृतानि संततानि अनुप्रविष्टानि सर्वेष्यनुगततयाऽनवच्छिन्नानि। तानि कर्मानुबन्धीनि। क्वेत्यपेक्षायामाह। मनुष्यलोके लोक्यत इति लोकः प्राणिनिकायः मनुष्यश्चासौ लोकश्चेत्यधिकृतो ब्राह्मण्यादिविशिष्टो देहो मनुष्यलोकः तस्मिन्मनुष्यस्य लोके भूलोक इति वा। विशेषतो मनुष्याणां कर्माधिकारस्य प्रसिद्धत्वात्।

Sri Neelkanth

17th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.

अधश्च मानुषेभ्यस्तिर्यक्स्थावरादयोऽवीच्यन्ताः। ऊर्ध्वं च मानुषेभ्य एवोपरि च गन्धर्वयक्षादिहिरण्यगर्भपर्यन्तं प्रसृताः प्रसरं प्राप्तास्तस्य शाखाः गुणैः सत्वादिभिः प्रकर्षेण वृद्धाः गुणप्रवृद्धाः। विषया एव रञ्जकतया कोमलपल्लवरूपाणि प्रवालानि यासां ताः। संसारवृक्षस्योपरिमूलं ब्रह्म उक्तम्। अधश्च इह मनुष्यलोके च तस्य मूलानि वासनारूपाणि अवान्तरमूलानि अनुसन्ततानि प्रवाहनित्यानि। यतः कर्मानुबन्धीनि कर्मैव धर्माधर्माख्यं अनुबन्धः पश्चाद्भावि येषां तानि कर्मानुबन्धीनि वासनाभ्यः कर्माणि कर्मभ्यो वासना इत्यनवरतसंतानोऽयं वृक्ष इत्यर्थः।

Sri Sridhara Swami

14th century CE · Advaita

Advaita

Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.

किंच -- अधश्चेति। हिरण्यगर्भादयः कार्योपाधयो जीवाः शाखास्थानीयत्वेनोक्ताः? तेषु च ये दुष्कृतिनस्तेऽधः पश्वादियोनिषु प्रसृताः विस्तरं गताः? सुकृतिनश्चोर्ध्वं देवादियोनिषु प्रसृतास्तस्य संसारवृक्षस्य शाखाः। किंच गुणैः सत्त्वादिवृत्तिभिर्जलसेचनैरिव यथायथं प्रवृद्धाः वृद्धिं प्राप्ताः। किंच विषया रूपादयः प्रवालाः पल्लवस्थानीया यासां ताः? प्रशाखास्थानीयाभिरिन्द्रियवृत्तिभिः संयुक्तत्वात्। किंच अधश्च चशब्दादूर्ध्वं च मूलानि अनुसंततानि विरूढानि। मुख्यं मूलं ईश्वर एक एव। इमानि त्ववान्तरमूलानि तत्तद्भोगवासनालक्षणानि। तेषां कार्यमाह। मनुष्यलोके कर्मानुबन्धीनि कर्म एवानुबन्धि अनन्तरभावि येषां तानि ऊर्ध्वाधोलोकेषु यदुपभुक्तं तत्तद्भोगवासनादिभिर्हि कर्मक्षयेण मनुष्यलोकं प्राप्तानां तत्तदनुरूपेषु कर्मसु प्रवृत्तिर्भवति। एतस्मिन्नेव हि कर्माधिकारो नान्येषु लोकेषु। अतो मनुष्यलोके इत्युक्तम्।

Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha

13th–14th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.

[15.2] इति श्लोके तु प्रकृत्यादिविशेषान्तं कृत्स्नं वृक्षत्वेन कल्प्यत इति। एवं सर्वास्वपि योजनासु संसारहेयताप्रतिपादने तात्पर्यं वक्तव्यम्। ततो वरं संसारस्यैव साक्षाद्वृक्षत्वेन कल्पनम्।अधश्चोर्ध्वं च [ऊर्ध्वमूलत्वमधश्शाखत्वं च व्यष्टिसृष्टिप्रक्रियया घटयतिसप्तलोकेत्यादिना।पृथिवीत्यधस्तनलोकानामुपलक्षणम्। अव्ययत्वच्छेद्यत्ववचनं व्याहतमित्यत्राह -- असङ्गहेतुभूतादासम्यग्ज्ञानोदयादिति। तत्त्वज्ञानात्प्रागपि विनाशदर्शनविरोधपरिहाराय प्रवाहरूपत्वोक्तिः। अक्षरसङ्ख्यारूपच्छन्दोव्यवच्छेदायाहछन्दांसि श्रुतय इति। पर्णवत्संसारवृक्षस्य यथावस्थिताकारं सञ्छाद्य रक्षन्तीति ज्ञापनायात्र छन्दश्शब्दः। संसारवृक्षपर्णत्वेन रूपणाच्छन्दश्शब्दोऽत्रवेदवादरताः [2।42] इत्यादिष्विव त्रिवर्गपरांशविषय इत्यभिप्रायेणाहवायव्यमिति। असम्बन्धिनां छन्दसां कथं पर्णत्वं इत्यत्राहश्रुतिप्रतिपादितैरिति। तथापि वृक्षावयवेषु बहुषु पर्णत्वेन रूपणे को विशेषः इत्यत्रोक्तंवर्धत इति। तद्विवृणोतिपर्णैर्हीति।तम् इति सप्रकारपरामर्शविवक्षया आहएवम्भूतमिति। ननु यः संसाराश्वत्थं वेद? स वेदविदित्यसङ्गतं नहि संसारोऽश्वत्थो वा वेदाः? येन तद्वेदिनो वेदवित्त्वमुच्यते अतोऽत्रआद्यं तु (यत्) त्र्यक्षरं ब्रह्म त्रयी यत्र (यस्मिन्) प्रतिष्ठिता। स गुह्योऽन्यस्त्रिवृद्वेदो यस्तं वेद स वेदवित् [मनुः11।265] इत्यादिष्विव प्रणवविषयत्वं कार्तयुगैकवेदपरत्वं वा युक्तम्। प्रणवस्यार्धमात्रायाः कारणपरमपुरुषदेवताकत्वश्रुतेः ऊर्ध्वमूलत्वं सुसङ्गतम्। कार्तयुगवेदस्यापि वेदान्तरूपत्वात्सर्वमूलत्वाच्च तथा निर्देशो घटते। एवं छन्दःपर्णत्वादिकं चोभयोः सुगमम्। शङ्कुना पर्णानामिव प्रणवेन सर्वासांवाचां सन्तृण्णत्वश्रुतेःमहतो वेदवृक्षस्य मूलभूतो महानयम्। स्कन्धभूता ऋगाद्यास्ते शाखाभूतास्तथापरे इति धर्मविशेषप्रतिपादकभागस्य मूलत्वोक्तेश्च। अतस्तथाभूतवेदविशेषवेदिन इह वेदवित्त्वेन स्तुतिः न त्ववेदभूतयत्किञ्चिद्वेदिन इति तत्राहवेदो हीति। अत्र वेदशब्दोऽपवर्गार्थवेदभागपरः ततः किमित्यत्राह -- छेद्यवृक्षेति।अयमभिप्रायः -- असङ्गशस्त्रच्छेद्यत्वानुपपत्तेरेव प्रणवादिपरत्वमप्ययुक्तमेवततः परं तत्परिमार्गितव्यम् [15।4] इत्येतदपि तत्रासङ्गतं?शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति [मै.उ.6।22वि.पु.6।5।64] इतिवत्स्यादिति चेत्? न विरुद्धत्वात्। तत्र हि तन्निष्णातस्य परब्रह्माधिगम उच्यते अत्र तु तच्छित्त्वा ततः परं परिमार्गितव्यमिति अतोऽस्यान्यार्थासम्भवात्संसारविषयत्वे सिद्धे तद्विदो वेदवित्त्वेन स्तुतिः? तज्ज्ञानस्य वेदान्तप्रतिपाद्यार्थज्ञानोपयोगितयैव -- इति।ऊर्ध्वमूलम् इत्यादिकं नैमित्तिकसृष्टिप्रक्रिययोक्तम्। ,अथ नित्यसृष्टिप्रक्रिययाऽप्युच्यतेअधश्च इति।अपराश्चेति पूर्वोक्तपुनरुक्तिपरिहारार्थम्।पुनरपीतिनित्यसृष्टिद्योतनम्। कर्मलोकमधिकृत्य ऊर्ध्वं प्रवृत्तेर्विवक्षितत्वाद्गन्धर्वादिपरत्वम् अत एव पूर्वोक्तेन चतुर्मुखलोकावधिकाधश्शाखत्वेन अविरोध इत्यभिप्रायेणाह -- गन्धर्वयक्षदेवादिरूपेणेति। प्रागुक्तप्रक्रियया। गुणानामुत्तरोत्तरजन्महेतुत्वेन देवमनुष्यादिशाखानां गुणप्रवृद्धत्वम्। गुणा इह साधारणाः सलिलस्थानीयाः प्रकाण्डस्थानीया वा। अत्र विषयशब्दस्य सर्वसाधारणज्ञानादिविषयपरत्वव्युदासायाह -- शब्दादीति। प्रवालशब्दस्यात्र विद्रुमार्थत्वासम्भवज्ञापनाय पल्लवशब्दः। शाखासु हि भोग्यत्वेन पल्लवाः समुद्भवन्ति। तद्वदेव देवादिषु शाखास्थानीयेषु भोग्यतया शब्दादेरुद्भवात्पल्लवस्थानीयत्वम्। ननु ऊर्ध्वमूलस्याधश्शाखत्वं मूलानुगुण्येनोपपद्यतां नाम? पुनरधश्चोर्ध्वं च प्रसृतेः किं मूलं इति शङ्काभिप्रायेणाह -- कथमित्यत्राहेति।अधश्च मूलानि इत्यवान्तरमूलोक्तिः। प्रासादशिखरप्ररूढप्रलम्बिताया लतायाः क्षितिसंसर्गजमूलप्रान्तरप्रसूतोर्ध्वशाखान्तरवदित्यभिप्रायेणाह -- ब्रह्मलोकमूलस्येति। मनुष्यलोकग्रहणं तत्र कर्माधिकारभूयस्त्वज्ञापनार्थम्। समानाधिकरणसमासौचित्यात् कर्मणामेव च सर्वत्र मूलत्वोपपत्तेस्तदनुबन्धिनां गुणानामन्येषां वा मूलत्वनिर्देशायोगमभिप्रेत्याहकर्माण्येवानुबन्धीनीति। पुरुषमनुबध्नन्तीत्यनुबन्धीनि यद्वा सुदृढाविच्छिन्नानीत्यर्थः। आत्मानुबन्धिनां कर्मणां मनुष्यलोकस्थमूलत्वोक्तेः किं नियमाकम् इत्यत्र मूलत्वप्रकारमुपपादयति -- मनुष्यत्वावस्थायां कृतैरिति। यथा न्यग्रोधादेरूर्ध्वशाखस्य शाखाग्रे बीजरूपं जटारूपं वा मूलं जायते? तथा अधश्शाखस्यापि स्यादिति भावः।

Sri Abhinavgupta

10th–11th century CE · Kashmir Shaivism

Kashmir Shaivism

Supreme scholar of Kashmir Shaivism who interpreted the Gita through the non-dual Tantric lens.

ऊर्ध्वमूलमिति। अधश्चेति। अनेन शास्त्रान्तरेषु यदुच्यते अश्वत्थः सर्वं? स एवोपासनीयः इत्यादि? तस्य भगवद्ब्रह्मोपासा तात्पर्यमित्युच्यते। मूलं प्रशान्तरूपम् (K प्रशान्तं रूपम्)। तत् ऊर्ध्वं? सर्वतो हि निवृत्तस्य तदाप्तिः। छन्दांसि पर्णानि इति -- यथा वृक्षस्य मानत्वफलवत्त्वसरसतादयः (S? फलत्व -- ) पर्णैः सूच्यन्ते? एवं ब्रह्मतत्त्वस्य वेदोपलक्षितशास्त्रद्वारिका प्रतीतिरित्याख्यायते। गुणैः? सत्त्वादिभिः प्रवृद्धाः? देवादिस्थावरान्ततया। तस्य च शुभाशुभात्मकानि कर्माणि अधस्तनमूलानि (?N -- मूलानि यस्य)।

Sri Jayatritha

14th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.

अधश्चेत्येतद्धटयति -- अव्यक्तेऽपीति। अनेन तस्य शाखा भूतान्यधश्च स्वापेक्षयाऽप्रकृष्टे शरीरादौ कार्ये चोर्ध्वं च उत्तमे कारणेऽव्यक्ते च प्रसृताः। सूक्ष्मरूपेण सन्तीति व्याख्यातं भवति।प्रसृताः इत्यनेनोच्यन्त इति शेषः। अधः पातालादावूर्ध्वं स्वर्गादावित्यादिव्याख्याने प्रकृतप्रक्रिये प्रसज्येते? गुणशब्दस्यानेकार्थत्वात्।गुणप्रवृद्धाः इत्यत्र विवक्षितमर्थमाह -- गुणैरिति। अर्वाचीनमूलैर्हि शाखाः प्रवृद्धा भवन्ति। सत्त्वादयश्चार्वाचीनमूलानीति वक्ष्यन्ते। विषयाणां प्रवालत्वं घटयति -- प्रतीतिमात्रेति। प्रतीतिसमयमात्रसुखहेतुत्वादित्यर्थः। विमर्दनासहत्वसाम्यादिति भावः। विषयाः प्रवाला इति सम्बन्धः।अधश्च मूलानि इत्यत्र रागद्वेषादिवासनामूलानीति व्याख्यानमसत्? प्रक्रमविरोधादिति भावेनाह -- मूलानीति। आदिपदेन जडाजडप्रकृत्योः सत्त्वादीनां च ग्रहणम्? तेषामपिऊर्ध्वमूलं इत्यत्र विवक्षितत्वात्। ननु भगवतः कथं कर्मानुबन्धित्वं इत्यत आह -- भगवानपीति। अत्र कर्मानुबन्धित्वं नाम कर्मानुसारित्वम्। तच्च कर्मसम्बन्धेन फलदातृत्वाद्भगवतोऽपि युक्तमित्यर्थः। यद्वा कर्मैवानुबन्धश्चरमभाविकारणं कर्मानुबन्धः? तद्वत्त्वं कर्मानुबन्धित्वम्। तदपि कर्मानुबन्धेन फलदातृत्वाद्भगवतो युज्यत इति। श्लोकद्वयार्थे श्रुतिसम्मतिं चाह -- तथा चेति। अस्य जगद्वृक्षस्य पृथग्वृक्षानन्तर्गतम्। सहभूतं मूलं समूलं अर्वाचीनमूलं भूम्यन्तर्गतपादाख्यं छन्दांसीत्यस्योपपादनम् -- पत्रेभ्यो हीति। देवादिशरीराणि चोपशाखाः। मात्राः भूतसूक्ष्माणि। शिफाः जटाः। मुक्त्यमुक्तिशब्दाभ्यां मोक्षतदितरपुरुषार्थसाधने ज्ञानकर्मणी उच्येते। फलमवान्तरम्। मोक्षामोक्षशब्दाभ्यां तु पुरुषार्थावेव। रसः श्रेष्ठं फलम्। गुणा विषयाः। अलोलपत्राणि प्रवालपर्णानि यस्यासौ तथोक्तः। न स्थीयत इत्यनेनाश्वत्थशब्दार्थकथनम्। तत्किं क्षणिकः न स्थीयते प्रवाहव्ययो नास्तीत्यर्थः। तस्योपपादनम् -- न हीति। द्विरुक्तिस्तात्पर्यार्था।

Sri Madhusudan Saraswati

16th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.

तस्यैव संसारवृक्षस्यावयवसंबन्धिन्यपरा कल्पनोच्यते -- अधश्चेति। पूर्वं हिरण्यगर्भादयः कार्योपाधयो जीवाः शाखास्थानीयत्वेनोक्ताः? इदानीं तु तद्गतो विशेष उच्यते। तेषु ये कपूयचरणा दुष्कृतिनस्तेऽधः पश्वादियोनिषु प्रसृता विस्तारं गताः। येतु रमणीयचरणाः सुकृतिनस्ते ऊर्ध्वं देवादियोनिषु प्रसृताः। अतोऽधश्च मनुष्यत्वादारभ्याविरिंचिपर्यन्तं ऊर्ध्वं च तस्मादेवारभ्य सत्यलोकपर्यन्तं प्रसृतास्तस्य,संसारवृक्षस्य शाखाः। कीदृश्यस्ताः। गुणैः सत्त्वरजस्तमोभिर्देहेन्द्रियविषयाकारपरिणतैर्जलसेचनैरिव प्रवृद्धाः स्थूलीभूताः। किंच विषयाः शब्दादयः प्रवालाः पल्लवा इव यासां संसारवृक्षशाखानां तास्तथा शाखाग्रस्थानीयाभिरिन्द्रियवृत्तिभिः संबन्धाद्रागाधिष्ठानत्वाच्च। किंचाधश्च शब्दादूर्ध्वं च मूलान्यवान्तराणि तत्तद्भोगजनितरागद्वेषादिवासनालक्षणानि मूलानीव धर्माधर्मप्रवृत्तिकारणानि तस्य संसारवृक्षस्यानुसंततान्यनुस्यूतानि। मुख्यं मूलं ब्रह्मैवेति न दोषः। कीदृशान्यवान्तरमूलानि। कर्म धर्माधर्मलक्षणमनुबद्धुं पश्चाज्जनयितुं शीलं येषां तानि कर्मानुबन्धीनि। कुत्र मनुष्यलोके मनुष्यश्चासौ लोकश्चेत्यधिकृतो ब्राह्मण्यादिविशिष्टो देहो मनुष्यलोकस्तस्मिन् बाहुल्येन कर्मानुबन्धीनि। मनुष्याणां हि कर्माधिकारः प्रसिद्धः।

Sri Purushottamji

16th century CE · Vallabha Sampradaya

Shuddhadvaita

Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.

एवं क्रीडात्मकं वृक्षं निरूप्य तत एव संसारात्मकवृक्षोत्पत्तिमाह -- अधश्चोर्ध्वमिति। तस्य अलौकिकवृक्षस्य अधः विविधजीवादिषु? ऊर्ध्वं लीलावतारादिषु? शाखाः प्रसृताः अनेकरूपेण विस्तारं गताः। चकारेणाऽधः प्रसृतानामपि दर्शनानन्दप्रकारेण लीलौपयिकता ज्ञापिता। किञ्च गुणैः सात्त्विकादिभिः सेचनेनैव प्रकर्षेण वृद्धाः वृद्धिं गताः। किञ्च विषयरूपादयः प्रवालाः पल्लवस्थानीया जाताः। किञ्च तासां शाखानां लौकिकानुबन्धार्थं अधः जीवादिषु मूलान्यनुसन्ततानि प्ररूढानि। प्रयोजनमाह -- मनुष्यलोके कर्म अनुबन्धः पश्चाद्भवनं येषां तदर्थं तादृशानि? मनुष्यलोकोत्पन्नानां कर्मप्रवृत्त्या सृष्ट्याद्यर्थम्।

Sri Vallabhacharya

15th–16th century CE · Shuddhadvaita

Shuddhadvaita

Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.

किञ्च अधश्चेति। तस्य शाखास्थानीयतया सुकृतिनो दुष्कृतिनश्चोच्यन्ते। ताश्च सत्त्वादिभिर्गुणैः प्रवृद्धा विषयप्रवालाः शब्दादिविषयपल्लवाः। कथं इत्यत्राह -- अधश्च मूलानीति। ब्रह्मपदमूलकस्याधोऽस्मिन् लोके जटामूलान्यत्र वासनाख्यान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि। मानुष्यावस्थायां भारताजिरे हि स्वकृतैः कर्मभिरधो मनुष्यपश्वादय ऊर्ध्वं देवादयो भवन्तीत्यर्थः।

Swami Gambirananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Advaita

Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.

15.2 Sakhah, the branches, as it were; tasya, of that Tree; prasrtah, extending; adhah, downwards, from the human beings to the immobile (trees etc.); ca, and; urdhvam, upwards, upto Brahma-beginning from the Creator of the Cusmos to Dharma (Death) [According to A.G. 'human beings' stands for the world of human beings, and 'Brahma ' for the 'world of Brahma' (Satva-loka). So Dharma may mean the 'world of Death' (pitr-loka).-Tr.], which, 'in accordance with their work and in conformity with their knowledge' (Ka. 2.2.7), are the results of knowledge and actions; are guna-pravrddhah, strengthened, made stout, by the alities sattva, rajas and tamas, which are their materials; and visaya-pravalah, have the sense-objects as their shoots. The sense-objects (sound etc.) sprout, as it were, like new leaves from the branches (bodies etc.) which are the results of actions. Thery the branches are said to have sense-objects as their shoots. The supreme Root, the material cause of the Tree of the World, has been stated earlier. And now, the latent impressions of attraction, repulsion, etc. born of the results of action are the subsidiary roots, as it were, which grow later on and become the cause of involvement in righteousness and and unrighteousness. And those mulani, roots; karma-anubandhini, which are followed by actions; anu-santatani, spread, enter; adhah, downwards, as compared with the world of gods; manusya-loke, into the world of human beings particularly-for it is well known that (only) here men have competence for rites and duties. They (these roots) are said to be karma-anubandhini since actions (karma) that are characterized as righteous and unrighteous follow as their product (anubandha), (i.e.) succeed the rise of those (attraction, repulsion, etc.).

Dr. S. Sankaranarayan

20th century CE · Academic / Shaiva

Shaiva

Scholar-practitioner who authored commentaries uniting rigorous Indology with spiritual practice.

15.1-2 Urdhva-mulam etc. Adhas ca etc. In other scriptural texts it is delcared 'All is the holy Fig-tree; that alone is to be meditated upon'. The present verse tells us this : What is intended by that declaration is only the religious meditation of the Brahman, the Bhagavat. Root : the one with a highly tranil nature. That is high (above) : Becasue it can be attained by him alone who has withdrawn himself from every other [lower] thing. The [Vedic] hymns are the leaves [of it] etc. : Just as the girth, height, the fruits and the taste etc. of a tree are indicated by its leaves, in the same fashion the idea of the Brahman-being is through the scriptures that are included in the 'Vedic hymns'. This is what is narrated here. With Strands : i.e., with the Sattva etc. Well developed : i.e., starting from gods down to the stationary ones. Of this tree, the roots, that are below, are the good and bad actions.

Swami Adidevananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Vishishtadvaita

Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.

15.2 The 'secondary roots' of this tree having the main roots in the world of Brahman and its crest in men ramify below in the world of men. They bind them according to their Karma. The meaning is that the effects of acts causing bondag become roots in the world of men. For, the effect of actions done in the human state brings about the further condition of men, beasts etc., down below, and of divinities etc., up above.

Frequently Asked Questions

What is Shankaracharya's commentary on BG 15.2?

,अधः मनुष्यादिभ्यो यावत् स्थावरम् ऊर्ध्वं च यावत् ब्रह्मणः विश्वसृजो धाम इत्येतदन्तं यथाकर्म यथाश्रुतं ज्ञानकर्मफलानि? तस्य वृक्षस्य शाखा इव शाखाः प्रसृताः प्रगताः? गुणप्रवृद्धाः गुणैः सत्त्वरजस्तमोभिः प्रवृद्धाः स्थूलीकृताः उपादानभूतैः? विषयप्रवालाः विषयाः शब्दादयः प्रवालाः इव देहादिकर्मफलेभ्यः शाखाभ्यः अङ्कुरीभवन्तीव? तेन विषयप्रवालाः शाखाः। संसारवृक्षस्य परममूलं उपादानकारणं पूर्वम् उक्तम्। अथ इ

How many scholars have commented on this verse?

VaniSagar presents 20 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 15.2, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.

Which commentary is best for a beginner?

For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.

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