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Sudarshana Chakra
Adhyay 15, Shlok 10
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः

शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष्य नहीं जानते, ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले ज्ञानी मनुष्य ही जानते हैं। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

భ్రాంతి చెందినవారు విడిచిపెట్టి, ఉండి, ఆనందించే వాడిని చూడరు; కానీ జ్ఞాన నేత్రం ఉన్నవారు ఆయనను చూస్తారు.

BengaliIND

প্রতারিতরা তাকে দেখতে পায় না যিনি চলে যান, থাকেন এবং ভোগ করেন; কিন্তু যাদের জ্ঞানের চক্ষু আছে তারা তাঁকে দেখে।

GujaratiIND

જે પ્રયાણ કરે છે, રહે છે અને ભોગવે છે તેને ભ્રમિત લોકો જોતા નથી; પરંતુ જેઓ જ્ઞાનની આંખ ધરાવે છે તેઓ તેને જુએ છે.

TamilIND

ஏமாந்தவர்கள் பிரிந்து, தங்கி, இன்பமடைபவரைக் காண்பதில்லை; ஆனால் அறிவின் கண் உடையவர்கள் அவரைப் பார்க்கிறார்கள்.

KannadaIND

ಭ್ರಮೆಯುಳ್ಳವರು ನಿರ್ಗಮಿಸುವ, ಉಳಿಯುವ ಮತ್ತು ಆನಂದಿಸುವ ಅವನನ್ನು ನೋಡುವುದಿಲ್ಲ; ಆದರೆ ಜ್ಞಾನದ ಕಣ್ಣು ಹೊಂದಿರುವವರು ಅವನನ್ನು ನೋಡುತ್ತಾರೆ.

NepaliIND

मोहमा परेकाहरूले उहाँलाई देख्दैनन्, जो टाढा जान्छ, बस्छ र आनन्द लिन्छ। तर ज्ञानको आँखा भएकाहरूले उहाँलाई हेर्छन्।

MalayalamIND

വിട്ടുപിരിഞ്ഞ്, താമസിച്ച്, സുഖിക്കുന്നവനെ വ്യാമോഹം കാണുന്നില്ല; അറിവിൻ്റെ കണ്ണുള്ളവർ അവനെ കാണുന്നു.

DogriIND

मोहित लोक उसगी नेईं दिक्खदे जेह्ड़ा चली जंदा ऐ, रुकदा ऐ ते भोग करदा ऐ; लेकन ज्ञान दी अक्खीं दे स्वामी उसी दिखदे न।

MizoIND

Bumte chuan kalsan, awm reng leh hlim taka awm chu an hmu lo; hriatna mit neitute erawh chuan Amah chu an hmu thin.

SindhiIND

گمراھيءَ وارا اُن کي نه ٿا ڏسن، جيڪو روانو ٿئي ٿو، رھي ٿو ۽ لطف اندوز ٿئي ٿو. پر جن وٽ علم جي اک آھي سي کيس ڏسن ٿا.

BhojpuriIND

भ्रमित लोग ओकरा के ना देखेला जे विदा हो जाला, रहेला आ भोग करेला; बाकिर ज्ञान के आँख वाला लोग उनुका के देखत बा.

MarathiIND

जो निघून जातो, राहतो आणि उपभोगतो त्याला भ्रमित लोक पाहत नाहीत; परंतु ज्यांच्याकडे ज्ञानाचा डोळा आहे ते त्याला पाहतात.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- उत्क्रामन्तम् -- स्थूलशरीरको छोड़ते समय जीव सूक्ष्म और कारणशरीरको साथ लेकर प्रस्थान करता है। इसी क्रियाको यहाँ उत्क्रामन्तम् पदसे कहा है। जबतक हृदयमें धड़कन रहती है? तबतक जीवका प्रस्थान नहीं माना जाता। हृदयकी धड़कन बंद हो जानेके बाद भी जीव कुछ समयतक रह सकता है। वास्तवमें अचल होनेसे शुद्ध चेतनतत्त्वका आवागमन नहीं होता। प्राणोंका ही आवागमन होता है। परन्तु सूक्ष्म और कारणशरीरसे सम्बन्ध रहनेके कारण जीवका आवागमन कहा जाता है।आठवें श्लोकमें ईश्वर बने जीवात्माके विषयमें आये उत्क्रामति पदको यहाँ उत्क्रामन्तम् पदसे कहा गया है।स्थितं वा -- जिस प्रकार कैमरेपर वस्तुका जैसा प्रतिबिम्ब पड़ता है? उसका वैसा ही चित्र अङ्कित हो जाता है। इसी प्रकार मृत्युके समय अन्तःकरणमें जिस भावका चिन्तन होता है? उसी आकारका सूक्ष्मशरीर बन जाता है। जैसे कैमरेपर पड़े प्रतिबिम्बके अनुसार चित्रके तैयार होनेमें समय लगता है? ऐसे ही अन्तकालीन चिन्तनके अनुसार भावी स्थूलशरीरके बननेमें (शरीरके अनुसार कम या अधिक) समय लगता है।आठवें श्लोकमें जिसका यदवाप्नोति पदसे वर्णन हुआ है? उसीको यहाँ स्थितम् पदसे कहा गया है।अपि भुञ्जानं वा -- मनुष्य जब विषयोंको भोगता है? तब अपनेको बड़ा सावधान मानता है और विषयसेवनमें सावधान रहता भी है। विषयी मनुष्य शब्द? स्पर्श? रूप? रस? और गन्ध -- इनमेंसे एकएक विषयको अच्छी तरह जानता है। अपनी जानकारीसे एकएक विषयको भी बड़ी स्पष्टतासे वर्णन करता है। इतनी सावधानी रखनेपर भी वह मूढ़ (अज्ञानी) ही है क्योंकि विषयोंके प्रति यह सावधानी किसी कामकी नहीं है? प्रत्युत मरनेपर नरकों और नीच योनियोमें ले जानेवाली है।परमात्मा? जीवात्मा और संसार -- इन तीनोंके विषयमें शास्त्रों और दार्शनिकोंके अनेक मतभेद हैं परन्तु जीवात्मा संसारके सम्बन्धसे महान् दुःख पाता है और परमात्माके सम्बन्धसे महान् सुख पाता है -- इसमें सभी शास्त्र और दार्शनिक एकमत हैं।संसार एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता -- यह अकाट्य नियम है। संसार क्षणभङ्गुर है -- यह बात कहते? सुनते और पढ़ते हुए भी मूढ़ मनुष्य संसारको स्थिर मानते हैं। भोगसामग्री? भोक्ता और भोगरूप क्रिया -- इन सबको स्थायी माने बिना भोग हो ही नहीं सकता। भोगी मनुष्यकी बुद्धि इतनी मूढ़ हो जाती है कि वह इन भोगोंसे बढ़कर कुछ है ही नहीं -- ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेता है (गीता 16। 11)। इसलिये ऐसे मनुष्योंके ज्ञाननेत्र बंद ही रहते हैं। वे मौतको निश्चित जानते हुए भी भोग भोगनेके लिये (मरनेवालोंके लोकमें रहते हुए भी) सदा जीते रहनेकी इच्छा रखते हैं।अपि पदका भाव है कि जीवात्मा जिस समय स्थूलशरीरसे निकलकर (सूक्ष्म और कारणशरीरसहित) जाता है? दूसरे शरीरको प्राप्त होता है तथा विषयोंका उपभोग करता है -- इन तीनों ही अवस्थाओंमें गुणोंमेंसे लिप्त दीखनेपर भी वास्तवमें वह स्वयं निर्लिप्त ही रहता है। वास्तविक स्वरूपमें न उत्क्रमण है? न, स्थिति है और न भोक्तापन ही है।पिछले श्लोकके विषयानुपसेवते पदको ही यहाँ भुञ्जानम् पदसे कहा गया है।गुणान्वितम् -- यहाँ गुणान्वितम् पदका तात्पर्य यह है कि गुणोंसे सम्बन्ध मानते रहनेके कारण ही जीवात्मामें उत्क्रमण? स्थिति और भोग -- ये तीनों क्रियाएँ प्रतीत होती हैं।वास्तवमें आत्माका गुणोंसे सम्बन्ध है ही नहीं। भूलसे ही इसने अपना सम्बन्ध गुणोंसे मान रखा है? जिसके कारण इसे बारम्बार ऊँचनीच योनियोंमें जाना पड़ता है। गुणोंसे सम्बन्ध जोड़कर जीवात्मा संसारसे सुख चाहता है -- यह उसकी भूल है। सुख लेनेके लिये शरीर भी अपना नहीं है? फिर अन्यकी तो बात ही क्या हैमनुष्य मानो किसीनकिसी प्रकारसे संसारमें ही फँसना चाहता है व्याख्यान देनेवाला व्यक्ति श्रोताओंको अपना मानने लग जाता है। किसीका भाईबहन न हो? तो वह धर्मका भाईबहन बना लेता है। किसीका पुत्र न हो? तो वह दूसरेका बालक गोद ले लेता है। इस तरह नयेनये सम्बन्ध जोड़कर मनुष्य चाहता तो सुख है? पर पाता दुःख ही है। इसी बातको भगवान् कह रहे हैं कि जीव स्वरूपसे गुणातीत होते हुए भी गुणों(देश? काल? व्यक्ति? वस्तु) से सम्बन्ध जोड़कर उनसे बँध जाता है।इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें आये प्रकृतिस्थानि पदको ही यहाँ गुणान्वितम् पदसे कहा गया है।मार्मिक बातजबतक मनुष्यका प्रकृति अथवा उसके कार्य -- गुणोंसे किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध रहता है? तबतक गुणोंके अधीन होकर उसे कर्म करनेके लिये बाध्य होना पड़ता है (गीता 3। 5)। चेतन होकर गुणोंके अधीन रहना अर्थात् जडकी परतन्त्रता स्वीकार करना व्यभिचारदोष है। प्रकृति अथवा गुणोंसे सर्वथ मुक्त होनेपर जो स्वाधीनताका अनुभव होता है? उसमें भी साधक जबतक (अहम्की गन्ध रहनेके कारण) रस लेता है? तबतक व्यभिचारदोष रहता ही है। रस न लेनेसे जब वह व्यभिचारदोष मिट जाता है? तब अपने प्रेमास्पद भगवान्के प्रति स्वतः प्रियता जाग्रत् होती है। फिर प्रेमहीप्रेम रह जाता है? जो उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त होता रहता है। इस प्रेमको प्राप्त करना ही जीवका अन्तिम लक्ष्य है। इस प्रेमकी प्राप्तिमें ही पूर्णता है। भगवान् भी भक्तको अपना अलौकिक प्रेम देकर ही राजी होते हैं और ऐसे प्रेमी भक्तको योगियोंमें सर्वश्रेष्ठ योगी मानते हैं (गीता 6। 47)।गुणातीत होनेमें तो (स्वयंका विवेक सहायक होनेके कारण) अपने साधनका सम्बन्ध रहता है? पर गुणातीत होनेके बाद प्रेमकी प्राप्ति होनेमें भगवान्की कृपाका ही सम्बन्ध रहता है।विमूढा नानुपश्यन्ति -- जैसे भिन्नभिन्न प्रकारके कार्य करनेपर भी हम वही रहते हैं? ऐसे ही गुणोंसे युक्त होकर शरीरको छोड़ते? अन्य शरीरको प्राप्त होते तथा भोग भोगते समय भी स्वयं (आत्मा) वही रहता है। तात्पर्य यह है कि परिवर्तन क्रियाओंमें होता है? स्वयं में नहीं। परन्तु जो भिन्नभिन्न क्रियाओंके साथ मिलकर स्वयं को भी भिन्नभिन्न देखने लगता है (3। 27)? ऐसे अज्ञानी (तत्त्वको न जाननेवाले) मनुष्यके लिये यहाँ विमूढा नानुपश्यन्ति पद दिये गये हैं।मूढ़लोग भोग और संग्रहमें इतने आसक्त रहते हैं कि शरीरादि पदार्थ नित्य रहनेवाले नहीं हैं -- यह बात सोचते ही नहीं। भोग भोगनेका क्या परिणाम होगा उस ओर वे देखते ही नहीं। भगवान्ने गीताके सत्रहवें अध्यायमें जहाँ सात्त्विक? राजस और तामस पुरुषोंको प्रिय लगनेवाले आहारोंका वर्णन किया है? वहाँ सात्त्विक आहारके परिणामका वर्णन पहले किया गया है राजस आहारके परिणामका वर्णन अन्तमें किया गया है और तामस आहारके परिणामका वर्णन ही नहीं किया गया है (गीता 17। 8 -- 10)। इसका कारण यह है कि सात्त्विक मनुष्य कर्म करनेसे पहले उसके परिणाम(फल) पर दृष्टि रखता है राजस मनुष्य पहले सहसा काम कर बैठता है? फिर परिणाम चाहे जैसा आये परन्तु तामस मनुष्य तो परिणामकी तरफ दृष्टि ही नहीं डालता। इसी प्रकार यहाँ भी विमूढा नानुपश्यन्ति पद देकर भगवान् मानो यह कहते हैं कि मोहग्रस्त मनुष्य तामस ही हैं क्योंकि मोह तमोगुणका कार्य है। वे विषयोंका सेवन करते समय परिणामपर विचार ही नहीं करते। केवल भोग भोगने और संग्रह करनेमें ही लगे रहते हैं। ऐसे मनुष्योंका ज्ञान तमोगुणसे ढका रहता है। इस कारण वे शरीर और आत्माके भेदको नहीं जान सकते।पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः -- प्राणी? पदार्थ? घटना? परिस्थिति -- कोई भी स्थिर नहीं है अर्थात् दृश्यमात्र निरन्तर अदर्शनमें जा रहा है -- ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव होना ही ज्ञानरूप चक्षुओंसे देखना है। परिवर्तनकी ओर दृष्टि होनेसे अपरिवर्तनशील तत्त्वमें स्थिति स्वतः होती है क्योंकि नित्य परिवर्तनशील पदार्थका अनुभव अपरिवर्तनशील तत्त्वको ही होता है।यहाँ ऐसा नहीं समझना चाहिये कि ज्ञानी मनुष्यका भी स्थूलशऱीरसे निकलकर दूसरे शरीरको प्राप्त होना तथा भोग भोगना होता है। ज्ञानी मनुष्यका स्थूलशरीर तो छूटेगा ही? पर दूसरे शरीरको प्राप्त करना तथा रागबुद्धिसे विषयोंका सेवन करना उसके द्वारा नहीं होते। दूसरे अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि जैसे जीवात्माकी इस देहमें बालकपन? जवानी और वृद्धावस्था होती है? ऐसे ही अन्य शरीरकी प्राप्ति होती है? परन्तु उस विषयमें ज्ञानी मनुष्य मोहित अथवा विकारको प्राप्त नहीं होता। कारण यह है कि वह ज्ञानी मनुष्य ज्ञानरूप नेत्रोंके द्वारा यह देखता है कि जन्ममृत्यु आदि सब क्रियाएँ या विकार परिवर्तनशील शरीरमें ही हैं? अपरिवर्तनशील स्वरूपमें नहीं। स्वरूप इन विकारोंसे सब समय सर्वथा निर्लिप्त रहता है। शरीरको अपना मानने तथा उससे सुख लेनेकी आशा रखनेसे ही विमूढ़ मनुष्योंको तादात्म्यके कारण ये विकार स्वयंमें होते प्रतीत होते हैं। विमूढ़ मनुष्य आत्माको गुणोंसे युक्त देखते हैं और ज्ञाननेत्रोंवाले मनुष्य आत्माको गुणोंसे रहित -- वास्तविक रूपसे देखते हैं। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें वर्णित तत्त्वको जो पुरुष यत्न करनेपर जानते हैं? उनमें क्या विशेषता है और जो यत्न करनेपर भी नहीं जानते? उनमें क्या कमी है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

इस प्रकार इस देहधारी ( जीवात्मा ) को शरीरसे --, उत्क्रमण करते हुएको अर्थात् पहले प्राप्त किये शरीरको छोड़कर जाते हुएको? अथवा शरीरमें स्थित रहते हुएको? या शब्दादि विषयोंका भोग करते हुएको? या सुखदुःखमोह आदि गुणोंसे युक्त हुएको भी? यानी इस प्रकार अत्यन्त दर्शनगोचर होते हुए भी इस आत्माको मूढ़ लोग? जो कि दृष्ट और अदृष्ट विषयभोगोंकी लालसाके बलसे चित्त आकृष्ट हो जानेके कारण अनेक प्रकारसे मोहित हो रहे हैं? नहीं देखते? अहो यह बड़े दुःखकी बात है? इस प्रकार भगवान् करुणा प्रकट करते हैं। परंतु जो प्रमाणजनित ज्ञाननेत्रोंसे युक्त हैं अर्थात् विवेकदृष्टिवाले हैं? वे इसे देखते हैं।

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Sri Anandgiri

शरीरमित्यादिश्लोके देहादात्मनोऽतिरेकमुक्त्वा श्रोत्रं चक्षुरित्यादौ स्वाभिलषिते विषये यथायथं करणानां प्रवर्तकत्वात्तेभ्योऽतिरिक्तश्चात्मेत्युक्तं तर्हि तमुत्क्रान्त्यादि कुर्वन्तं स्वरूपत्वात्किमिति सर्वे न पश्यन्तीत्याशङ्क्याह -- एवमिति। संनिहिततमत्वेन दर्शनयोग्यमपि विषयपरवशादात्मानं सर्वे न पश्यन्तीति,भगवतोऽनुक्रोशं दर्शयति -- एवंभूतमिति। तर्हि केषामात्मदर्शनं तदाह -- ये तु पुनरिति।

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Sri Dhanpati

शरीरमित्यादिश्लोकेन देहाद्य्वतिरेकमात्मनोऽभिधाय श्रोत्रमित्यादौ श्रोत्रादिप्रवर्तकस्तेभ्यो भिन्न इति तस्य भेद उक्तस्तर्हि तमुत्क्रन्त्यादिकुर्वन्तं देहादिव्यतिरिक्तं स्वस्वरुपं किमिति सर्वे न पश्यन्ति इतिचेत्तत्राह -- उत्क्रामन्तमिति। एवं देहादुत्क्रामन्तं पूर्वोपात्तं देहं परित्यजन्तं स्थितं देहे तिष्ठन्तं वापि भुञ्जानं शब्दादींश्चोपलभमानं वा गुणान्वितं सुखदुःखमोहसंज्ञकैर्गुणैरनुगतं संयुक्तमेवंभूतमप्येवमत्यन्तदर्शनगोचरतां प्राप्तं विमूढा दृष्टादृष्टविषयोभोगबलाकृष्टचेतस्तयानकधा मूढा मोहिता संज्ञकैर्गुणैरनुगतं संयुक्तमेवंभूतमप्येवमत्यन्तदर्शनगोचरतां प्राप्तं विमूढा दृष्टादृष्टविषयभोगबलाकृष्टस्तयानेकधा मूढा मोहिता नानुपश्यन्त्यहो कष्टं वर्तत इति अनुक्रोशति भगवान्। तर्ह्यत्मानं के कथं पश्यन्तीति तत्राह। ज्ञानं न्यायानुगृहीतशास्त्रजन्यमात्मदर्शनसाधनं चक्षुर्येषां ते प्रमाण्यजनितज्ञानचक्षुषो विवक्तदृष्ट्या एनं सर्वविलक्षणं सर्वाधिष्ठानं सर्वसत्तास्फूर्तिप्रदं पश्यन्ति साक्षात्कुर्वन्ति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
utkrāmantamdeparting
sthitamresiding
vā apior even
bhuñjānamenjoys
or
guṇaanvitam
vimūḍhāḥthe ignorant
nanot
anupaśhyantipercieve
paśhyantibehold
jñānachakṣhuṣhaḥ
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 15.9
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते

यह जीवात्मा मनका आश्रय लेकर श्रोत्र, नेत्र, त्वचा, रसना और घ्राण -- इन पाँचों इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 15.11
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः

यत्न करनेवाले योगीलोग अपने-आपमें स्थित इस परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं। परन्तु जिन्होंने अपना अन्तःकरण शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अविवेकी मनुष्य यत्न करनेपर भी इस तत्त्वका अनुभव नहीं करते। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 15Shlok 10
Bhagavad Gita · Adhyay 15, Shlok 10
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः

शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष्य नहीं जानते, ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले ज्ञानी मनुष्य ही जानते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ: "शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष्य नहीं जानते, ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले ज्ञानी मनुष्य ही जानते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Purushottama Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 10?

Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 10 translates to: "The deluded do not see Him who departs, stays, and enjoys; but those who possess the eye of knowledge behold Him. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 15, श्लोक 10 है जो Bhagavad Gita के Purushottama Yoga में संकलित है। शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष्य नहीं जानते, ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले ज्ञानी मनुष्य ही जानते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "utkrāmantaṁ sthitaṁ vāpi bhuñjānaṁ vā guṇānvitam" mean in English?

"utkrāmantaṁ sthitaṁ vāpi bhuñjānaṁ vā guṇānvitam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 10. The deluded do not see Him who departs, stays, and enjoys; but those who possess the eye of knowledge behold Him. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.