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Sudarshana Chakra
Adhyay 15, Shlok 1
श्री भगवानुवाचऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्

श्रीभगवान् बोले -- ऊपरकी ओर मूलवाले तथा नीचेकी ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसारवृक्षको जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाला है। — VaniSagar

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KannadaIND

ಅವರು (ಬುದ್ಧಿವಂತರು) ಅವಿನಾಶವಾದ ಪೀಪುಲ್ ಮರದ ಬಗ್ಗೆ ಮಾತನಾಡುತ್ತಾರೆ, ಅದರ ಬೇರುಗಳು ಮತ್ತು ಕೆಳಗೆ ಶಾಖೆಗಳು, ಅದರ ಎಲೆಗಳು ಮೀಟರ್ ಅಥವಾ ಸ್ತೋತ್ರಗಳಾಗಿವೆ; ಅದನ್ನು ತಿಳಿದವನು ವೇದಗಳನ್ನು ತಿಳಿದವನು.

BhojpuriIND

ऊ लोग (बुद्धिमान लोग) अविनाशी पीपुल पेड़ के बात करेला, जवना के जड़ ऊपर आ डाढ़ नीचे होला, जवना के पतई मीटर भा भजन होला; जे जानत बा ऊ वेद के ज्ञाता ह।

MalayalamIND

അവർ (ജ്ഞാനികൾ) നശിപ്പിക്കാനാവാത്ത പീപ്പിൾ മരത്തെക്കുറിച്ച് സംസാരിക്കുന്നു, അതിൻ്റെ വേരുകൾ മുകളിലും താഴെ ശാഖകളുമുണ്ട്, അതിൻ്റെ ഇലകൾ മീറ്ററുകളോ കീർത്തനങ്ങളോ ആണ്; അത് അറിയുന്നവൻ വേദങ്ങൾ അറിയുന്നവനാണ്.

SindhiIND

اُهي (دانشمند) اُن بيشمار پيپل جي وڻ جي ڳالهه ڪن ٿا، جنهن جا پاڙ مٿي ۽ هيٺان شاخون آهن، جن جا پن ميٽر يا همراهن آهن. جيڪو ڄاڻي ٿو سو ويد جو ڄاڻو آهي.

GujaratiIND

તેઓ (જ્ઞાનીઓ) અવિનાશી પીપુલ વૃક્ષની વાત કરે છે, તેના મૂળ ઉપર અને શાખાઓ નીચે છે, જેના પાંદડા મીટર અથવા સ્તોત્ર છે; જે તેને જાણે છે તે વેદનો જાણકાર છે.

NepaliIND

तिनीहरू (ज्ञानीहरू) अविनाशी पीपुल रूखको कुरा गर्छन्, जसको माथि जरा र तल हाँगाहरू छन्, जसका पातहरू मिटर वा भजन हुन्; जसले जान्दछ त्यो वेदको जानकार हो।

MarathiIND

ते (ज्ञानी) अविनाशी पीपुल वृक्षाबद्दल बोलतात, ज्याची मुळे वर आहेत आणि फांद्या खाली आहेत, ज्याची पाने मीटर किंवा स्तोत्र आहेत; जो जाणतो तो वेदांचा जाणता असतो.

BengaliIND

তারা (জ্ঞানীরা) অবিনশ্বর পিপুল গাছের কথা বলে, যার শিকড় উপরে এবং শাখা নীচে, যার পাতাগুলি মিটার বা স্তোত্র; যে জানে সে বেদ জানে।

TamilIND

அவர்கள் (புத்திசாலிகள்) அழியாத பீப்புல் மரத்தைப் பற்றி பேசுகிறார்கள், அதன் வேர்கள் மேலே மற்றும் கிளைகள் உள்ளன, அதன் இலைகள் மீட்டர் அல்லது பாடல்கள்; அதை அறிந்தவன் வேதங்களை அறிந்தவன்.

TeluguIND

వారు (జ్ఞానులు) నాశనం చేయలేని పీపుల్ చెట్టు గురించి మాట్లాడతారు, దాని పైన మూలాలు మరియు క్రింద కొమ్మలు ఉంటాయి, దీని ఆకులు మీటర్లు లేదా శ్లోకాలు; అది తెలిసినవాడు వేదాలను తెలిసినవాడు.

PunjabiIND

ਉਹ (ਸਿਆਣੇ) ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਪੀਪੁਲ ਦੇ ਰੁੱਖ ਦੀ ਗੱਲ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਜਿਸ ਦੀਆਂ ਜੜ੍ਹਾਂ ਉੱਪਰ ਅਤੇ ਹੇਠਾਂ ਸ਼ਾਖਾਵਾਂ ਹਨ, ਜਿਸ ਦੇ ਪੱਤੇ ਮੀਟਰ ਜਾਂ ਭਜਨ ਹਨ; ਜੋ ਇਸ ਨੂੰ ਜਾਣਦਾ ਹੈ ਉਹ ਵੇਦਾਂ ਦਾ ਜਾਣਨ ਵਾਲਾ ਹੈ।

OdiaIND

ସେମାନେ (ଜ୍ଞାନୀ) ଅବିସ୍ମରଣୀୟ ପିପୁଲ ଗଛ ବିଷୟରେ କୁହନ୍ତି, ଏହାର ମୂଳ ଉପରେ ଏବଂ ଶାଖା ସହିତ, ଯାହାର ପତ୍ର ମିଟର କିମ୍ବା ଭଜନ; ଯିଏ ଏହା ଜାଣେ ସେ ବେଦ ବିଷୟରେ ଜାଣନ୍ତି |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या ऊर्ध्वमूलमधःशाखम् -- [तेरहवें अध्यायके आरम्भके दो श्लोकोंकी तरह यहाँ पन्द्रहवें अध्यायके पहले श्लोकमें भी भगवान्ने अध्यायके सम्पूर्ण विषयोंका दिग्दर्शन कराया है और ऊर्ध्वमूलम् पदसे परमात्माका? अधःशाखम् पदसे सम्पूर्ण जीवोंके प्रतिनिधि ब्रह्माजीका तथा अश्वत्थम् पदसे संसारका संकेत करके (संसाररूप अश्वत्थवृक्षके मूल) सर्वशक्तिमान् परमात्माको यथार्थरूपसे जाननेवालेको वेदवित् कहा है।]साधारणतया वृक्षोंका मूल नीचे और शाखाएँ ऊपरकी ओर होती हैं परन्तु यह संसारवृक्ष ऐसा विचित्र वृक्ष है कि इसका मूल ऊपर तथा शाखाएँ नीचेकी ओर हैंजहाँ जानेपर मनुष्य लौटकर संसारमें नहीं आता? ऐसा भगवान्का परमधाम ही सम्पूर्ण भौतिक संसारसे ऊपर (सर्वोपरि) है। संसारवृक्षकी प्रधान शाखा (तना) ब्रह्माजी हैं क्योंकि संसारवृक्षकी उत्पत्तिके समय सबसे पहले ब्रह्माजीका उद्भव होता है। इस कारण ब्रह्माजी ही इसकी प्रधान शाखा हैं। ब्रह्मलोक भगवद्धामकी अपेक्षा नीचे है। स्थान? गुण? पद? आयु आदि सभी दृष्टियोंसे परमधामकी अपेक्षा निम्न श्रेणीमें होनेके कारण ही इन्हें अधः (नीचेकी ओर) कहा गया है । यह संसाररूपी वृक्ष ऊपरकी ओर मूलवाला है। वृक्षमें मूल ही प्रधान होता है। ऐसे ही इस संसाररूपी वृक्षमें परमात्मा ही प्रधान हैं। उनसे ब्रह्माजी प्रकट होते हैं? जिनका वर्णन अधःशाखम् पदसे हुआ है।सबके मूल प्रकाशक और आश्रय परमात्मा ही हैं। देश? काल? भाव? सिद्धान्त? गुण? रूप? विद्या आदि सभी दृष्टियोंसे परमात्मा ही सबसे श्रेष्ठ हैं। उनसे ऊपर अथवा श्रेष्ठकी तो बात ही क्या है? उनके समान भी दूसरा कोई नहीं है (गीता 11। 43)। संसारवृक्षके मूल सर्वोपरि परमात्मा हैं। जैसे मूल वृक्षका आधार होता है? ऐसे ही परमात्मा सम्पूर्ण जगत्के आधार हैं। इसीलिये उस वृक्षको ऊर्ध्वमूलम् कहा गया है।मूलशब्द कारणका वाचक है। इस संसारवृक्षकी उत्पत्ति और इसका विस्तार परमात्मासे ही हुआ है। वे परमात्मा नित्य? अनन्त और सबके आधार हैं तथा सगुणरूपसे सबसे ऊपर नित्यधाममें निवास करते हैं? इसलिये वे ऊर्ध्व नामसे कहे जाते हैं। यह संसारवृक्ष उन्हीं परमात्मासे उत्पन्न हुआ है? इसलिये इसको ऊपरकी ओर मूलवाला (ऊर्ध्वमूल) कहते हैं।वृक्षके मूलसे ही तने? शाखाएँ? कोंपलें निकलती हैं। इसी प्रकार परमात्मासे ही सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है? उन्हींसे विस्तृत होता है और उन्हींमें स्थित रहता है। उन्हींसे शक्ति पाकर सम्पूर्ण जगत् चेष्टा करता है । ऐसे सर्वोपरि परमात्माकी शरण लेनेसे मनुष्य सदाके लिये कृतार्थ हो जाता है। (शरण लेनेकी बात आगे चौथे श्लोकमें तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये पदोंमें कही गयी है)।सृष्टिरचनाके लिये ब्रह्माजी प्रकृतिको स्वीकार करते हैं। परन्तु वास्तवमें वे (प्रकृतिसे सम्बन्धरहित होनेके कारण) मुक्त हैं। ब्रह्माजीके सिवाय दूसरे सम्पूर्ण जीव प्रकृति और उसके कार्य शरीरादिके साथ अहंताममतापूर्वक जितनाजितना अपना सम्बन्ध मानते हैं? उतनेउतने ही वे बन्धनमें पड़े हुए हैं और उनका बारबार पतन (जन्ममरण) होता रहता है अर्थात् उतनी ही शाखाएँ नीचेकी ओर फैलती रहती हैं। सात्त्विक? राजस और तामस -- ये तीनों गतियाँ अधःशाखम् के ही अन्तर्गत हैं (गीता 14। 18)।अश्वत्थम् -- अश्वत्थम् शब्दके दो अर्थ हैं -- (1) जो कल दिनतक भी न रह सके और (2) पीपलका वृक्ष।पहले अर्थके अनुसार -- अश्वत्थ पदका तात्पर्य यह है कि संसार एक क्षण भी स्थिर रहनेवाला नहीं है। केवल परिवर्तनके समूहका नाम ही संसार है। परिवर्तनका जो नया रूप सामने आता है? उसको उत्पत्ति कहते हैं थोड़ा और परिवर्तन होनेपर उसको स्थितिरूपसे मान लेते हैं और जब उस स्थितिका स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है? तब उसको समाप्ति (प्रलय) कह देते हैं। वास्तवमें इसकी उत्पत्ति? स्थिति और प्रलय होते ही नहीं। इसलिये इसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होनेके कारण यह (संसार) एक क्षण भी स्थिर नहीं है। दृश्यमात्र प्रतिक्षण अदर्शनमें जा रहा है। इसी भावसे इस संसारको अश्वत्थम् कहा गया है।दूसरे अर्थके अनुसार -- यह संसार पीपलका वृक्ष है। शास्त्रोंमें अश्वत्थ अर्थात् पीपलके वृक्षकी बहुत महिमा गायी गयी है। स्वयं भगवान् भी सब वृक्षोंमें अश्वत्थ को अपनी विभूति कहकर उसको श्रेष्ठ एवं पूज्य बताते हैं -- अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम् (गीता 10। 26)। पीपल? आँवला और तुलसी -- इनकी भगवद्भावपूर्वक पूजा करनेसे वह भगवान्की पूजा हो जाती है।परमात्मासे संसार उत्पन्न होता है। वे ही संसारके अभिन्ननिमित्तोपादान कारण हैं। अतः संसाररूपी पीपलका वृक्ष भी तत्त्वतः परमात्मस्वरूप होनेसे पूजनीय है। इस संसाररूप पीपलवृक्षकी पूजा यही है कि इससे सुख लेनेकी इच्छाका त्याग करके केवल इसकी सेवा करना। सुखकी इच्छा न रखनेवालेके लिये यह संसार साक्षात् भगवत्स्वरूप है -- वासुदेवः सर्वम् (गीता 7। 19)। परन्तु संसारसे सुखकी इच्छा रखनेवालोंके लिये यह संसार दुःखोंका घर ही है। कारण कि स्वयं अविनाशी है और यह संसारवृक्ष प्रतिक्षण परिवर्तनशील होनेके कारण नाशवान्? अनित्य और क्षणभङ्गुर है। अतः स्वयंकी कभी इससे तृप्ति हो ही नहीं सकती किंतु इससे सुखकी इच्छा करके यह बारबार जन्मतामरता रहता है। इसलिये संसारसे यत्किञ्चित् भी स्वार्थका सम्बन्ध न रखकर केवल उसकी सेवा करनेका भाव ही रखना चाहिये।प्राहुरव्ययम् -- संसारवृक्षको अव्यय कहा जाता है। क्षणभङ्गुर अनित्य संसारका आदि और अन्त न जान सकनेके कारण? प्रवाहकी निरन्तरता(नित्यता)के कारण तथा इसका मूल सर्वशक्तिमान् परमेश्वर नित्य अविनाशी होनेके कारण ही इसे अव्यय कहते हैं। जिस प्रकार समुद्रका जल सूर्यके तापसे भाप बनकर बादल बनता है। फिर आकाशमें ठण्डक पाकर वही जल बादलसे पुनः जलरूपसे पृथ्वीपर आ जाता है। फिर वही जल नदीनालेका रूप धारण करके समुद्रमें चला जाता है? पुनः समुद्रका जल बादल बनकर बरसता है -- ऐसे घूमते हुए जलके चक्रका कभी भी अन्त नहीं आता। इसी प्रकार इस संसारचक्रका भी कभी अन्त नहीं आता। यह संसारचक्र इतनी तेजीसे घूमता (बदलता) है कि चलचित्र(सिनेमा) के समान अस्थिर (प्रतिक्षण परिवर्तनशील) होते हुए भी स्थिरकी तरह प्रतीत होता है।यह संसारवृक्ष अव्यय कहा जाता है। (प्राहुः)? वास्तवमें यह अव्यय (अविनाशी) है नहीं। अगर यह अव्यय होता तो न तो इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें यह कहा जाता कि इस(संसार)का जैसा स्वरूप कहा जाता है? वैसा उपलब्ध नहीं होता और न इस(संसारवृक्ष) को वैराग्यरूप दृढ़ शस्त्रके द्वारा छेदन करनेके लिये ही भगवान् प्रेरणा करते।छन्दांसि यस्य पर्णानि -- वेद इस संसारवृक्षके पत्ते हैं। यहाँ वेदोंसे तात्पर्य उस अंशसे है? जिसमें सकामकर्मोंके अनुष्ठानोंका वर्णन है । तात्पर्य यह है कि जिस वृक्षमें सुन्दर फूलपत्ते तो हों? पर फल नहीं हों तो वह वृक्ष अनुपयोगी है क्योंकि वास्तवमें तृप्ति तो फलसे ही होती है? फूलपत्तोंकी सजावटसे नहीं। इसी प्रकार सुखभोग चाहनेवाले सकाम पुरुषको भोगऐश्वर्यरूप फूलपत्तोंसे सम्पन्न यह संसारवृक्ष बाहरसे तो सुन्दर प्रतीत होता है? पर इससे सुख चाहनेके कारण उसको अक्षय सुखरूप तृप्ति अर्थात् महान् आनन्दकी प्राप्ति नहीं होती।वेदविहित पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान स्वर्गादि लोकोंकी कामनासे किया जाय तो वह निषिद्ध कर्मोंको करनेकी अपेक्षा श्रेष्ठ तो है? पर उन कर्मोंसे मुक्ति नहीं हो सकती क्योंकि फलभोगके बाद पुण्य कर्म नष्ट हो जाते हैं और उसे पुनः संसारमें आना पड़ता है (गीता 9। 21)। इस प्रकार सकामकर्म और उसका फल -- दोनों ही उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं। अतः साधकको इन (दोनों) से सर्वथा असङ्ग होकर एकमात्र परमात्मतत्त्वको ही प्राप्त करना चाहिये।पत्ते वृक्षकी शाखासे उत्पन्न होनेवाले तथा वृक्षकी रक्षा और वृद्धि करनेवाले होते हैं। पत्तोंसे वृक्ष सुन्दर दीखता है तथा दृढ़ होता है (पत्तोंके हिलनेसे वृक्षका मूल? तना एवं शाखाएँ दृढ़ होती हैं)। वेद भी इस संसारवृक्षकी मुख्य शाखारूप ब्रह्माजीसे प्रकट हुए हैं और वेदविहित कर्मोंसे ही संसारकी वृद्धि और रक्षा होती है। इसलिये वेदोंको पत्तोंका स्थान दिया गया है। संसारमें सकाम (काम्य) कर्मोंसे स्वर्गादिमें देवयोनियाँ प्राप्त होती हैं -- यह संसारवृक्षका बढ़ना है। स्वर्गादिमें नन्दनवन? सुन्दर विमान? रमणीय अप्सराएँ आदि हैं -- यह संसारवृक्षके सौन्दर्यकी प्रतीति है। सकामकर्मोंको करते रहनेसे बारम्बार जन्ममरण होता रहता है -- यह संसारवृक्षका दृढ़ होना है।इन पदोंसे भगवान् यह कहना चाहते हैं कि साधकको सकामभाव? वैदिक सकामकर्मानुष्ठानरूप पत्तोंमें न फँसकर संसारवृक्षके मूल -- परमात्माका ही आश्रय लेना चाहिये। परमात्माका आश्रय लेनेसे वेदोंका वास्तविक तत्त्व भी जाननेमें आ जाता है। वेदोंका वास्तविक तत्त्व संसार या स्वर्ग नहीं? प्रत्युत परमात्मा ही हैं (गीता 15। 15) । यस्तं वेद स वेदवित् -- उस संसारवृक्षको जो मनुष्य जानता है? वह सम्पूर्ण वेदोंके यथार्थ तात्पर्यको जाननेवाला है। संसारको क्षणभङ्गुर (अनित्य) जानकर इससे कभी किञ्चिन्मात्र भी सुखकी आशा न रखना -- यही संसारको यथार्थरूपसे जानना है। वास्तवमें संसारको क्षणभङ्गुर जान लेनेपर सुखभोग हो ही नहीं सकता। सुखभोगके समय संसार क्षणभङ्गुर नहीं दीखता। जबतक संसारके प्राणीपदार्थोंको स्थायी मानते रहते हैं? तभीतक सुखभोग? सुखकी आशा और कामना तथा संसारका आश्रय? महत्त्व? विश्वास बना रहता है। जिस समय यह अनुभव हो जाता है कि संसार प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है? उसी समय उससे सुख लेनेकी इच्छा मिट जाती है और साधक उसके वास्तविक स्वरूपको जानकर (संसारसे विमुख और परमात्माके सम्मुख होकर) परमात्मासे अपनी अभिन्नताका अनुभव कर लेता है। परमात्मासे अभिन्नताका अनुभव होनेमें ही वेदोंका वास्तविक तात्पर्य है। जो मनुष्य संसारसे विमुख होकर परमात्मतत्त्वसे अपनी अभिन्नता (जो कि वास्तवमें है) का अनुभव कर लेता है? वही वास्तवमें वेदवित् है। वेदोंके अध्ययनमात्रसे मनुष्य वेदोंका विद्वान् तो हो सकता है? पर यथार्थ वेदवेत्ता नहीं। वेदोंका अध्ययन न होनेपर भी जिसको (संसारसे सम्बन्धविच्छेदपूर्वक) परमात्मतत्त्वकी अनुभूति हो गयी है? वही वास्तवमें वेदवेत्ता (वेदोंके तात्पर्यको अनुभवमें लानेवाला) है।भगवान्ने इसी अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें अपनेको वेदवित् कहा है। यहाँ वे संसारके तत्त्वको जाननेवाले पुरुषको वेदवित्त कहकर उससे अपनी एकता प्रकट करते हैं। तात्पर्य यह है कि मनुष्यशरीरमें मिले विवेककी इतनी महिमा है कि उससे जीव संसारके यथार्थ तत्त्वको जानकर भगवान्के सदृश वेदवेत्ता बन सकता है परमात्माका ही अंश होनेके कारण जीवका एकमात्र वास्तविक सम्बन्ध परमात्मासे है। संसारसे तो इसने भूलसे अपना सम्बन्ध माना है? वास्तवमें है नहीं। विवेकके द्वारा इस भूलको मिटाकर अर्थात् संसारसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करके एकमात्र अपने अंशी परमात्मासे अपनी स्वतःसिद्ध अभिन्नताका अनुभव करनेवाला ही संसारवृक्षके यथार्थ तत्त्वको जाननेवाला है और उसीको भगवान् यहाँ वेदवित् कहते हैं। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जिस संसारवृक्षका दिग्दर्शन कराया? उसी संसारवृक्षका अब आगेके श्लोकमें अवयवोंसहित विस्तारसे वर्णन करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

यहाँ पहले वैराग्यके लिये वृक्षस्वरूपकी कल्पना करके? संसारके स्वरूपका वर्णन करते हैं क्योंकि संसारसे विरक्त हुए पुरुषको ही भगवान्का तत्त्व जाननेमें अधिकार है? अन्यको नहीं। अतः श्रीभगवान् बोले --, ( यह संसाररूप वृक्ष ) ऊर्ध्वमूलवाला है। कालकी अपेक्षा भी सूक्ष्म? सबका कारण? नित्य और महान् होनेके कारण अव्यक्तमायाशक्तियुक्त ब्रह्म सबसे ऊँचा कहा जाता है? वही इसका मूल है? इसलिये यह संसारवृक्ष ऊपरकी ओर मूलवाला है। ऊपर मूल और नीचे शाखावाला इस श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है। पुराणमें भी कहा है -- अव्यक्तरूप मूलसे उत्पन्न हुआ उसीके अनुग्रहसे बढ़ा हुआ? बुद्धिरूप प्रधान शाखासे युक्त? बीचबीचमें इन्द्रियरूप कोटरोंवाला? महाभूतरूप शाखाप्रतिशाखाओंवाला? विषयरूप पत्तोंवाला? धर्म और अधर्मरूप सुन्दर पुष्पोंवाला तथा जिसमें सुख दुःखरूप फल लगे हुए हैं ऐसा यह सब भूतोंका आजीव्य सनातन ब्रह्मवृक्ष है। यही ब्रह्मवन है? इसीमें ब्रह्म सदा रहता है। ऐसे इसी ब्रह्मवृक्षका ज्ञानरूप श्रेष्ठ खड्गद्वारा छेदनभेदन करके और आत्मामें प्रीतिलाभ करके फिर वहाँसे नहीं लौटता इत्यादि। ऐसे ऊपर मूल और नीचे शाखावाले इस मायामय संसारवृक्षको? अर्थात् महत्तत्त्व? अहंकार? तन्मात्रादि? शाखाकी भाँति जिसके नीचे हैं? ऐसे इस नीचेकी ओर शाखावाले और कलतक भी न रहनेवाले इस क्षणभङ्गुर अश्वत्थ वृक्षको अव्यय कहते हैं। यह मायामय संसार? अनादि कालसे चला आ रहा है? इसीसे यह संसारवृक्ष अव्यय माना जाता है तथा यह आदिअन्तसे रहित शरीर आदिकी परम्पराका आश्रय सुप्रसिद्ध है? अतः इसको अव्यय कहते हैं। उस संसारवृक्षका ही यह अन्य विशेषण ( कहा जाता ) है। ऋक् यजु और सामरूप वेद? जिस संसारवृक्षके पत्तोंकी भाँति रक्षा करनेवाले होनेसे पत्ते हैं। जैसे पत्ते वृक्षकी रक्षा करनेवाले होते हैं? वैसे ही वेद धर्मअधर्म? उनके कारण और फलको प्रकाशित करनेवाले होनेसे? संसाररूप वृक्षकी रक्षा करनेवाले हैं। ऐसा जो यह विस्तारपूर्वक बतलाया हुआ संसारवृक्ष है? इसको जो मूलके सहित जानता है? वह वेदको जाननेवाला अर्थात् वेदके अर्थको जाननेवाला है। क्योंकि इस मूलसहित संसारवृक्षसे अतिरिक्त अन्य जाननेयोग्य वस्तु अणुमात्र भी नहीं है। सुतरां जो इस प्रकार वेदार्थको जाननेवाला है वह सर्वज्ञ है। इस प्रकार मूलसहित संसारवृक्षके ज्ञानकी स्तुति करते हैं। उसी संसारवृक्षके अन्य अङ्गोंकी कल्पना कही जाती है।

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Sri Anandgiri

ज्ञानेन गुणात्यये दर्शिते नाशित्वे तेषां विना ज्ञानेनानत्ययादनाशित्वे तेनापि तद्योग्यत्वान्न ज्ञानं गुणात्ययहेतुरित्याशङ्कां निरस्य साक्षादेव श्रवणादिहेतुं संन्यासं विधित्सुर्ब्रह्मत्वस्य परमपुरुषार्थतां च विवक्षुरध्यायान्तरमारभते -- यस्मादिति। कर्मिणो ज्ञानिनश्च शास्त्रेऽधिकृतास्तत्र कर्मिणां कर्मानुकूलं फलमीश्वरायत्तंफलमत उपपत्तेः इति न्यायाज्ज्ञानिनामपि तत्फलमीश्वरायत्तमेवततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ इत्युक्तत्वाद्? यस्मादेवं तस्माद्ये भक्त्याख्येन योगेन मामेव सेवन्ते ते मत्प्रसादद्वारा ज्ञानं प्राप्य गुणातीताः मुक्ता भवन्तीति स्थितमित्यर्थः। ये त्वात्मनस्तत्त्वमेव संदेहाद्यपोहेन जानन्ति ते तेन ज्ञानेन गुणातीताः सन्तो मुक्तिं गच्छन्तीति किमु वक्तव्यमित्यर्थसिद्धमर्थमाह -- किमु वक्तव्यमिति। आत्मतत्त्वाज्ञानं यतः संसारहेतुः? ज्ञानं मोक्षानुकूलमतोऽर्जुनेन किं तदित्यपृष्टमपि तत्त्वं भगवानुक्तवान्प्रश्नाभावेऽपि तस्य तद्व्युत्पादनाभिमानादित्याह -- अति इति। तत्त्वे विवक्षिते किमिति संसारो वर्ण्यते तत्राह -- तत्रेति। अध्यायादिः सप्तम्यर्थः। वैराग्यमपि किमिति मृग्यते तत्राह -- विरक्तस्येति। इति वैराग्याय संसारवर्णनमिति शेषः। नाशसभावनायै वृक्षरूपकं बन्धहेतोर्दर्शयति -- ऊर्ध्वमूलमिति। कथं कालतः सूक्ष्मत्वं तदाह -- कारणत्वादिति। तदेव कथं कार्यापेक्षया नियतपूर्वभावित्वादित्याह -- नित्यत्वादिति। सर्वव्यापित्वाच्चोत्कर्षं संभावयति -- महत्त्वाच्चेति। ऊर्ध्वमुच्छ्रितमुत्कृष्टमिति यावत्। तस्य कूटस्थस्य कथं मूलत्वमित्याशङ्क्याह -- अव्यक्तेति। स्मृतिमूलत्वेन श्रुतिमुदाहरति -- श्रुतेश्चेति। अवाञ्च्यो निकृष्टाः शाखा इव महदाद्या यस्य स तथा। प्रकृते संसारवृक्षे पुराणसंमतिमाह -- पुराणे चेति। अव्यक्तमव्याकृतं तदेव मूलं तस्मात्प्रभवनं प्रभवो यस्य स तथा तस्यैव मूलस्याव्यक्तस्यानुग्रहादतिदृढत्वादुत्थितः संवर्धितः। तस्य लौकिकवृक्षसाधर्म्यमाह -- बुद्धीत्यादिना। वृक्षस्य हि शाखाः स्कन्धादुद्भवन्ति संसारस्य च बुद्धेः सकाशान्नानापरिणामा जायन्ते तेन बुद्धिरेव स्कन्धस्तन्मयस्तत्प्रचुरोऽयं संसारतरुरिन्द्रियाणामन्तराणि छिद्राणि कोटराणि यस्य स तथा। महान्ति भूतानि पृथिव्यादीन्याकाशान्तानि विशाखाः स्तम्भा यस्य स तथा। आजीव्यत्वमुपजीव्यत्वं? ब्रह्मणाधिष्ठितो वृक्षो ब्रह्मवृक्षस्तथापि ज्ञानं विना छेत्तुमशक्यतया सनातनश्चिरंतनः। एतच्च ब्रह्मणः परस्यात्मनो वनं वननीयं संभजनीयमत्र हि ब्रह्म प्रतिष्ठितं वृक्षस्य तस्य संसाराख्यस्य तदेव ब्रह्म सारभूतमथवास्य ब्रह्मवृक्षस्यानवच्छिन्नस्य संसारमण्डलस्य तदेतद्ब्रह्म वनमिव वनं वननीयं संभजनीयं नहि ब्रह्मातिरिक्तं संसारस्यास्पदमस्ति ब्रह्मैवाविद्यया संसरतीत्यभ्युपगमादित्यर्थः। अहं ब्रह्मेति दृढज्ञानेनोक्तं संसारवृक्षं छित्त्वा प्रतिबन्धकाभावादात्मनिष्ठो भूत्वा पुनरावृत्तिरहितं कैवल्यं प्राप्नोतीत्याह -- एतदिति। अधःशाखमित्येतद्व्याचष्टे -- महदिति। आदिशब्देनेन्द्रियादिसंग्रहः। संसारवृक्षस्यातिचञ्चलत्वे प्रमाणमाह -- प्राहुरिति। क्षणध्वंसिनोऽव्ययत्वं विरुद्धमित्याशङ्क्याह -- संसारेति। तदेवोपपादयति -- अनादीति। छादनं रक्षणं प्रावरणं वा कर्मकाण्डानि खल्वारोहावरोहफलानि नानाविधार्थवादयुक्तानि संसारवृक्षं रक्षन्ति तन्निष्ठं दोषं चावृण्वन्ति तेन तानि छन्दांसि पर्णानीव भवन्तीत्यर्थः। तदेव प्रपञ्चयति -- यथेति। उक्तेऽर्थे हेतुमाह -- धर्मेति। कर्मकाण्डानां वेदानामिति शेषः। कर्मब्रह्माख्यसर्ववेदार्थस्य तत्रान्तर्भावमुपेत्य व्याचष्टे -- वेदार्थेति। समूलसंसारवृक्षज्ञाने(कुतूहलं)ऽमूलं हित्वा मूलमेव निष्कृष्य ज्ञातुं शक्यमिति तज्ज्ञानार्थं प्रयतितव्यमिति मत्वा तज्ज्ञानस्तुतिरत्र विवक्षितेत्याह -- नहीति।

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Sri Dhanpati

यस्मान्मदधीनं कर्मिणां कर्मफलं ज्ञानिनां ज्ञानफलं चफलमत उपपत्तेःततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ इतिन्यायाभ्यामतो भक्ति योगेन मां सेवन्ते ते मत्प्रासादाज्ज्ञानप्राप्तिक्रमेण गुणातीति मोक्षं गच्छन्तीतं आत्मनस्तत्त्वमेव सम्यग्जानन्ति ते तेन ज्ञानेन गणातीताः सन्तः मुक्तिं गच्छन्तीति किमु वक्तव्यमित्यतोऽर्जुनेनापृष्टमप्यात्मनस्तत्त्वं विवक्षुर्भगवानुवाच -- ऊर्ध्वमूलमित्यादि। तत्रादौ वृक्षरुपकल्पनया वैराग्यार्थं संसारस्वरुपं वर्णयति। भगवत्तत्वज्ञाने संसाराद्विरक्तस्यैवाधिकारात्। यत्तु केचित्पूर्वाध्यायेन भगवता संसारबन्धहेतून्गुणान् व्याख्याय तेषामत्ययेन ब्रह्मभावो मोक्षो मद्भजनेन लक्ष्यत इति मां चेत्यादिनोक्तं तत्र मनुष्यस्य तव भक्तियोगेन कथं ब्रह्मभाव इत्याकाङ्क्षायां स्वस्य ब्रह्मरुपताज्ञापनाय सूत्रभूतो ब्रह्मणो हीति श्लोको भगवतोक्तः। अस्य सूत्रस्य वृत्तिस्थानीयोयं पञ्चदश आरभ्यते। भगवतः श्रीकृष्णस्य हि तत्त्वं ज्ञात्वा तत्प्रेमभजनेन गुणातीतः सन् ब्रह्मभावं कथमाप्नुयात् लोक इति। तत्र ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहमित्यादिभगवद्वचनमाकर्ण्य मत्तुल्यो मनुष्योऽयं कथमेवं वदतीति विस्मयाविष्टप्रतिमया लज्जया च किमपि प्रष्टुमक्नुवन्तमर्जनमालक्ष्य कृपया स्वस्वरुपं विवक्षुः श्रीभगवानुवाचेत्यवतारयन्ति तन्नादर्तव्यम्।अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन्।मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।मूढोयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययं।मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्। नाप्नुवन्ति महात्मनः संसिद्धिं परमां गताः।मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिनामयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरंन मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।अहमादिर्हि दवानां महर्षिणां च सर्वशः।अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते इत्यादिबहुशः श्रुतवतः।परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्नहि ते भगतन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाःत्वमक्षरं परमं विदतव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मेअनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरुप इत्याद्युक्तवतो विश्वरुपं दृष्टवतश्चार्जुनस्य एवमभिप्रायवर्णनानौचित्यात्। ऊर्ध्वं कालतः सूक्ष्मत्वात् कारणत्वात् नित्यत्वात् महत्वाच्चोच्छ्रितमुत्कृष्टं मायाशक्तिमत् ब्रह्म मूलं यस्य सोऽयं संसार ऊर्ध्वमूलस्तमधः सर्वकारणान्मायाशक्तिमतो ब्रह्मणो निकृष्टा महदहंकारतन्मात्रादयः शाखाः यस्य सोऽधःशाखस्तं श्वोऽपि न स्थास्यतीत्यश्वत्थः क्षणभङ्गुरस्तमश्वत्थं मायामयं संसारवृक्षं अव्ययं संसारमायाया अनादिकालप्रवृत्तत्वादनाद्यनन्तदेहादिसंतानाश्रयः तत्त्वज्ञानमन्तरेणानुच्छेद्यो यः सोऽव्ययः संसारवृक्षस्तं प्राहुः श्रुतिस्मृतिवादाः कथयन्ति। तथाहिऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः इत्यादिश्रुतिवादाःअव्यक्तमूलप्रभवस्तस्यैवानुग्रहोत्थितः। बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियान्तरकोटरः।।महाभूतविशाखश्च विषयैः पत्रवांस्तथा। धर्माधर्मसुपुष्पश्च सुखदुःखफलोदयः।।आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः। एतद्ब्रह्मवनं चैव ब्रह्मवृक्षस्य तस्य तत्।।एतच्छित्त्वा च भित्त्वा च ज्ञानेन परमासिना। ततश्चान्त्यगतिं प्राप्य तस्मान्नावर्तते पुनः इत्यादयः स्मृतिवादाः। आजीव्य उपजीव्यः ब्रह्माधिष्ठितत्वात्। ब्रह्मवृक्षः ज्ञानं विना छेत्तुमशक्यत्वेनानादित्वाच्च। सनातनश्चिरंतनः। तच्च ब्रह्मणः परस्यात्मनो वनं वननीयं संभजनीयमत्र हि सर्वं प्रतिष्ठितं तस्य वृक्षस्य संसाराख्यस्य तदेव सारभूतं? सारभूतं? अथवास्य वृक्षस्यानवच्छिन्नस्य संसारमण्डलस्य तदेव ब्रह्मवनमिव वनं वननीयं संभजनीयं। नहि ब्रह्मातिरिक्तं संसारस्यास्पदमस्ति। ब्रह्मैवाविद्यया संभवतीत्यभ्युपगमादित्यर्थः। तस्मादब्रह्मगतिरुपान्मोक्षात्। स्पष्टमन्यत्। असेव्यफलमश्रुतां वीनां सुपर्णानां जीवानामज्ञनामयो गतिर्यस्मिन्नसौ व्ययः न विद्यते व्ययो यस्मादित्यव्ययः।तयोनन्यः पिप्पलम् इति श्रुतेरित्यर्थः। अनेन सुज्ञैरसेव्यफलत्वं ध्वन्यते। यद्वा पक्षिसामान्यवाचकविशब्देन पक्षिविशेषा हंसा लक्ष्यन्ते तेषामयः प्रचारस्तद्रहितः। नहि हंसा अश्वत्थे व्याप्रियन्ते संन्यासिनो वा जगद्विषय इति कल्पना तु श्रुत्याद्यननुगुणा सर्वज्ञानां न शोभते इत्यत आचार्यैर्न प्रदर्शिता। अत्र ऊर्ध्वमूलमधः शाखं मिथ्याभूतं जले प्रतिबिम्बितं पुनःपुनः परिदृश्यमानत्वादव्यमैन्द्रजालिकोपदर्शितमेदादृशं वाश्वत्थम्। संसारवृक्षस्य मिथ्यात्वबोधनायोपमानीकृत्येयं रुपककल्पना। तेनोर्ध्वमूलस्याधःशाखस्य क्षणभङग्ुरस्य माया मयस्याव्ययस्याश्वतथस्यैवाभावाद्रूपकासंगतिरिति न शङ्कनीयम्। केचित्तु गङ्गातरङ्गनुद्यमानोत्तुङ्गतीरतिर्यङ्निपतितः प्रबलतरपवनोन्मूलितः पतिपयमूलव्याप्तपातालः ऊर्ध्वस्थिबहुमूलो भूमिस्थकतिपयशाखः उपरिस्थितबहुशाखः अधोमूलबलेन स्थितत्वात् अव्ययस्तादृशमश्वत्थमुपमानीकृत्येयं रुपककल्पनेति वर्णयन्ति। यस्य संसारवृक्षस्य च्छादनाद्रक्षणात् छन्दांसि ऋग्यजुःसामलक्ष्णानि पर्णनीव पर्णानि? यथा वृक्षस्य परिरक्षणार्थानि पर्णानि तथा कर्मकाण्डानि च्छन्दांसि धर्माधर्मतद्धेतुफलप्रकाशनार्थत्वात् संसारवृक्षस्य परिरक्षणार्थानीत्यर्थः। छादनं प्रावरणमित्यर्थे त्वर्थवादयुक्तानां छन्दसां तन्निष्ठदोषप्रावरणार्थत्वं बोध्यम्। तं यथोक्तं संसारवृक्षं भङगुरं मायामयं साधिष्ठानं यो वेद जानाति स वेदवित् वेदार्थज्ञः। समूले संसारवृक्षे सर्वं ज्ञेयमन्तर्भवतीति तस्य ज्ञाता वेदार्थवित्त्वात् सर्वज्ञो भवतीति समूलसंसारवृक्षज्ञानं यत्नेन संपाद्यमिति बोधनाय तज्ज्ञानं स्तौति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhrībhagavān uvācha
ūrdhvamūlam
adhaḥdownward
śhākhambranches
aśhvatthamthe sacred fig tree
prāhuḥthey speak
avyayameternal
chhandānsiVedic mantras
yasyaof which
parṇānileaves
yaḥwho
tamthat
vedaknows
saḥhe
vedavit
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 15.2
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके

उस संसारवृक्षकी गुणों-(सत्त्व, रज और तम-) के द्वारा बढ़ी हुई तथा विषयरूप कोंपलोंवाली शाखाएँ नीचे, मध्यमें और ऊपर सब जगह फैली हुई हैं। मनुष्यलोकमें कर्मोंके अनुसार बाँधनेवाले मूल भी नीचे और ऊपर (सभी लोकोंमें) व्याप्त हो रहे हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 15Shlok 1
Bhagavad Gita · Adhyay 15, Shlok 1
श्री भगवानुवाचऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्

श्रीभगवान् बोले -- ऊपरकी ओर मूलवाले तथा नीचेकी ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसारवृक्षको जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाला है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 1 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 1 का हिंदी अर्थ: "श्रीभगवान् बोले -- ऊपरकी ओर मूलवाले तथा नीचेकी ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसारवृक्षको जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाला है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Purushottama Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 1?

Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 1 translates to: "They (the wise) speak of the indestructible peepul tree, with its roots above and branches below, whose leaves are the meters or hymns; he who knows it is a knower of the Vedas. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"श्री भगवानुवाचऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं " — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 15, श्लोक 1 है जो Bhagavad Gita के Purushottama Yoga में संकलित है। श्रीभगवान् बोले -- ऊपरकी ओर मूलवाले तथा नीचेकी ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसारवृक्षको जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाला है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhrī-bhagavān uvācha" mean in English?

"śhrī-bhagavān uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 1. They (the wise) speak of the indestructible peepul tree, with its roots above and branches below, whose leaves are the meters or hymns; he who knows it is a knower of the Vedas. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.