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Sudarshana Chakra
Adhyay 14, Shlok 6
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ

हे पापरहित अर्जुन ! उन गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल (स्वच्छ) होनेके कारण प्रकाशक और निर्विकार है। वह सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे (देहीको) बाँधता है। — VaniSagar

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KannadaIND

ಇವುಗಳಲ್ಲಿ, ಸತ್ವವು ತನ್ನ ನಿಷ್ಕಪಟತೆಯಿಂದ ಪ್ರಕಾಶಮಾನವಾಗಿದೆ ಮತ್ತು ಆರೋಗ್ಯಕರವಾಗಿದೆ, ಓ ಪಾಪರಹಿತನೇ, ಸಂತೋಷ ಮತ್ತು ಜ್ಞಾನದ ಬಾಂಧವ್ಯದಿಂದ ಒಬ್ಬನನ್ನು ಬಂಧಿಸುತ್ತದೆ.

TeluguIND

వీటిలో, సత్వగుణం, దాని స్టెయిన్లెస్ కారణంగా ప్రకాశవంతమైన మరియు ఆరోగ్యకరమైనది, ఓ పాపరహితుడా, ఆనందం మరియు జ్ఞానంతో అనుబంధం ద్వారా ఒకరిని బంధిస్తుంది.

GujaratiIND

આમાંથી, સત્વ, જે તેની નિર્દોષતાને લીધે તેજસ્વી અને સ્વસ્થ છે, તે સુખ અને જ્ઞાનની આસક્તિ દ્વારા વ્યક્તિને બાંધે છે, હે પાપ રહિત.

NepaliIND

यिनीहरूमध्ये निर्दोषताले उज्यालो र स्वस्थ्य हुने सत्वले सुख र ज्ञानको आसक्तिले बाँध्छ, हे पापरहित।

TamilIND

இவற்றில், துருப்பிடிக்காததால் ஒளிரும் மற்றும் ஆரோக்கியமாக இருக்கும் சத்வம், ஓ பாவமற்றவரே, மகிழ்ச்சி மற்றும் அறிவின் பற்றுதலால் ஒருவரை பிணைக்கிறது.

SindhiIND

انهن مان، ستوا، جيڪو روشن ۽ صحتمند آهي، ان جي بي داغ جي ڪري، خوشيء ۽ علم سان وابستگي سان ڳنڍيل آهي، اي بي گناهه.

MalayalamIND

ഇവയിൽ, കറയില്ലാത്തതിനാൽ പ്രകാശവും ആരോഗ്യവുമുള്ള സത്വം, ഹേ പാപമില്ലാത്തവനേ, സന്തോഷത്തോടും ജ്ഞാനത്തോടും ചേർന്ന് ഒരുവനെ ബന്ധിക്കുന്നു.

MarathiIND

त्यांपैकी सत्त्व, जे निर्दोषतेमुळे तेजस्वी आणि निरोगी आहे, ते आनंद आणि ज्ञानाच्या आसक्तीने बांधते, हे पापरहित.

BengaliIND

এর মধ্যে, সত্ত্ব, যা তার দাগহীনতার কারণে উজ্জ্বল এবং স্বাস্থ্যকর, সুখ এবং জ্ঞানের সাথে সংযুক্ত করে, হে পাপহীন।

PunjabiIND

ਇਹਨਾਂ ਵਿਚੋਂ, ਸਤਵ, ਜੋ ਕਿ ਆਪਣੀ ਬੇਦਾਗਤਾ ਦੇ ਕਾਰਨ ਚਮਕਦਾਰ ਅਤੇ ਤੰਦਰੁਸਤ ਹੈ, ਖੁਸ਼ੀ ਅਤੇ ਗਿਆਨ ਦੇ ਮੋਹ ਨਾਲ ਬੰਨ੍ਹਦਾ ਹੈ, ਹੇ ਪਾਪ ਰਹਿਤ।

OdiaIND

ଏଥିମଧ୍ୟରୁ ସତ୍ୟ, ଯାହା ଷ୍ଟେନଲେସ୍ ହେତୁ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଏବଂ ସୁସ୍ଥ, ସୁଖ ଏବଂ ଜ୍ଞାନ ସହିତ ସଂଲଗ୍ନ କରି ହେ ପାପହୀନ |

MizoIND

Chung zingah chuan sattva, a stainlessness avanga eng leh hrisel tak chuan hlimna leh hriatna nena inzawmna hmangin mi a phuar a, Aw sual nei lo.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् -- पूर्वश्लोकमें सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंकी बात कही। इन तीनों गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल (मलरहित) है। तात्पर्य है कि रजोगुण और तमोगुणकी तरह सत्त्वगुणमें मलिनता नहीं है? प्रत्युत यह रजोगुण और तमोगुणकी अपेक्षा निर्मल? स्वच्छ है। निर्मल होनेके कारण यह परमात्मतत्त्वका ज्ञान करानेमें सहायक है।प्रकाशकम् -- सत्त्वगुण? निर्मल? स्वच्छ होनेके कारण प्रकाश करनेवाला है। जैसे प्रकाशके अन्तर्गत वस्तुएँ साफसाफ दीखती हैं? ऐसे ही सत्त्वगुणकी अधिकता होनेसे रजोगुण और तमोगुणकी वृत्तियाँ साफसाफ दीखती हैं। रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न होनेवाले काम? क्रोध? लोभ? मद? मात्सर्य आदि दोष भी साफसाफ दीखते हैं अर्थात् इन सब विकारोंका साफसाफ ज्ञान होता है।सत्त्वगुणकी वृद्धि होनेपर इन्द्रियोंमें प्रकाश? चेतना और हलकापन विशेषतासे प्रतीत होता है? जिससे प्रत्येक पारमार्थिक अथवा लौकिक विषयको अच्छी तरह समझनेमें बुद्धि पूरी तरह कार्य करती है और कार्य करनेमें बड़ा उत्साह रहता है।सत्त्वगुणके दो रूप हैं -- (1) शुद्ध सत्त्व? जिसमें उद्देश्य परमात्माका होता है? और (2) मलिन सत्त्व? जिसमें उद्देश्य सांसारिक भोग और संग्रहका होता है । शुद्ध सत्त्वगुणमें परमात्माका उद्देश्य होनेसे परमात्माकी तरफ चलनेमें स्वाभाविक रुचि होती है। मलिन सत्त्वगुणमें पदार्थोंके संग्रह और सुखभोगका उद्देश्य होनेसे सांसारिक प्रवृत्तियोंमें रुचि होती है? जिससे मनुष्य बँध जाता है।मलिन सत्त्वगुणमें भी बुद्धि सांसारिक विषयको अच्छी तरह समझनेमें समर्थ होती है। जैसे? सत्त्वगुणकी वृद्धिमें ही वैज्ञानिक नयेनये आविष्कार करता है किन्तु उसका उद्देश्य परमात्माकी प्राप्ति न होनेसे वह अंहकार? मानबड़ाई? धन आदिसे संसारमें बँधा रहता है।अनामयम् -- सत्त्वगुण रज और तमकी अपेक्षा विकाररहित है। वास्तवमें प्रकृतिका कार्य होनेसे यह सर्वथा निर्विकार नहीं है। सर्वथा निर्विकार तो अपना स्वरूप अथवा परमात्मतत्त्व ही है? जो कि गुणातीत है। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें सहायक होनेसे भगवान्ने सत्त्वगुणको भी विकाररहित कह दिया है।सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ -- जब अन्तःकरणमें सात्त्विक वृत्ति होती है? कोई विकार नहीं होता है? तब एक सुख मिलता है? शान्ति मिलती है। उस समय साधकके मनमें यह विचार आता है कि ऐसा सुख हरदम बना रहे? ऐसी शान्ति हरदम बनी रहे? ऐसी निर्विकारता हरदम बनी रहे। परन्तु जब ऐसा सुख? शान्ति? निर्विकारता नहीं रहती? तब साधकको अच्छा नहीं लगता। यह अच्छा लगना और अच्छा न लगना ही सत्त्वगुणके सुखमें आसक्ति है? जो बाँधनेवाली है।जब सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंका? इनकी वृत्तियोंका? विकारोंका साफसाफ ज्ञान होता है और साधकको ऐसी बहुतसी आश्चर्यजनक बातोंकी जानकारी होती है? जो पहले कभी जानी हुई नहीं होती? तब साधकके मनमें आता है कि यह ज्ञान हरदम बना रहे। यह ज्ञानमें आसक्ति है? जो बाँधनेवाली है। मैं दूसरोंकी अपेक्षा अधिक (विशेष) जानता हूँ -- यह अभिमान भी बाँधनेवाला होता है।इस तरह सत्त्वगुण सुख और ज्ञानके सङ्ग(आसक्ति) से साधकको बाँध देता है अर्थात् उसको गुणातीत नहीं होने देता। यह सङ्ग ही रजोगुण है जो बाँधनेवाला है (गीता 13। 21)। यदि साधक सुख और ज्ञानका सङ्ग न करे तो सत्त्वगुण उसको बाँधता नहीं? प्रत्युत उसको गुणातीत कर देता है। तात्पर्य है कि यदि सङ्ग न हो तो साधक सत्त्वगुणसे भी ऊँचा उठ जाता है और अपने गुणातीत स्वरूपका अनुभव कर लेता है।सत्त्वगुणसे सुख और ज्ञान होनेपर साधकको यह सावधानी रखनी चाहिये कि यह सुख और ज्ञान मेरा लक्ष्य नहीं है। ये मेरे भाग्य नहीं हैं। ये तो लक्ष्यकी प्राप्तिमें कारण हैं। मेरेको तो उस लक्ष्यको प्राप्त करना है? जो,इस सुख और ज्ञानको भी प्रकाशित करनेवाला है।सुख? ज्ञान आदि सभी सत्त्वगुणकी वृत्तियाँ हैं। ये कभी घटती हैं? कभी बढ़ती हैं कभी आती हैं? कभी जाती हैं। परन्तु अपना स्वरूप निरन्तर एकरस रहता है। उसमें कभी घटबढ़ नहीं होती। अतः साधकको सत्त्वगुणकी वृत्तियोंसे सदा तटस्थ? उदासीन रहना चाहिये। उनका उपभोग नहीं करना चाहिये। इससे वह सुख और ज्ञानकी आसक्तिमें फँसेगा नहीं।अगर साधक सत्त्वगुणसे होनेवाले सुख और ज्ञानका सङ्ग न करे? तो उसको शीघ्र ही परमात्मप्राप्ति हो जाती है। परन्तु अगर वह इनके सङ्गका त्याग न करे तो (परमात्मप्राप्तिका लक्ष्य होनेसे) समय पाकर उसकी इस सुख और ज्ञानसे स्वतः अरुचि हो जाती है और वह परमात्मप्राप्ति कर लेता है। सम्बन्ध -- रजोगुणका स्वरूप और उसके बाँधनेका प्रकार क्या है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

उन सत्त्व आदि तीन गुणोंमेंसे पहले? सत्त्वगुणका लक्षण बतलाया जाता है -- सत्त्वगुण स्फटिकमणिकी भाँति निर्मल होनेके कारण? प्रकाशशील और उपद्रवरहित है ( तो भी ) वह बाँधता है। कैसे बाँधता है सुखकी आसक्तिसे। (वास्तवमें ) विषयरूप सुखका विषयी आत्माके साथ मैं सुखी हूँ इस प्रकार सम्बन्ध जो़ड़ देना यह आत्माको मिथ्या ही सुखमें नियुक्त कर देना है। यही अविद्या है। क्योंकि विषयके धर्म विषयीके ( कभी ) नहीं होते और इच्छासे लेकर धृतिपर्यन्त सब धर्म विषयरूप क्षेत्रके ही हैं -- ऐसा भगवान्ने कहा है। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि जो आरोपितभावसे आत्माकी स्वकीय धर्मरूपा हो रही है और विषयविषयीका अज्ञान ही जिसका स्वरूप है? ऐसी अविद्याद्वारा ही सत्त्वगुण अनात्मस्वरूप सुखमें ( आत्माको ) मानो,नियुक्त -- आसक्त कर देता है? यानी जो ( वास्तवमें ) सुखके सम्बन्धसे रहित है? उसे सुखीसा कर देता है। इसी प्रकार ( यह सत्त्वगुण उसे ) ज्ञानके सङ्गसे भी ( बाँधता है )। ज्ञान भी सुखका साथी होनेके कारण? क्षेत्र अर्थात् अन्तःकरणका ही धर्म है? आत्माका नहीं -- क्योंकि आत्माका धर्म मान लेनेपर उसमें आसक्त होना और उसका बाँधना नहीं बन सकता। इसलिये हे निष्पाप अर्थात् व्यसनदोष -- रहित अर्जुन सुखकी भाँति ही ज्ञान आदिके सङ्ग को भी ( बन्धन करनेवाला ) समझना चाहिये।

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Sri Anandgiri

किंलक्षणो गुणः केन बध्नातीत्यपेक्षायामाह -- तत्रेति। निर्धारणार्थतया सप्तमीं व्याचष्टे -- तत्र सत्त्वादीनामिति। पुनस्तत्रेत्यनुवादमात्रं? निर्मलत्वं स्वच्छत्वमावरणवारणक्षमत्वं? तस्मात्प्रकाशकं? चैतन्याभिव्यञ्जकं? निरुपद्रवमिति निर्मलं सत्सुखस्याभिव्यञ्जकमित्यर्थः। केन द्वारेण तदात्मानं निबध्नातीति पृच्छति -- कथमिति। सुखसङ्गेन बध्नातीत्युत्तरं तदेव विवृणोति -- सुख्यहमित्यादिना। मुख्यसुखस्याभिव्यञ्जकसत्त्वपरिणामोऽत्र विषयसंभूतं सुखमुच्यते -- संश्लेषापादनमेव विशदयति -- मृषैवेति। किमिति मृषैवेति विशेषणं सङ्गस्य वस्तुत्वसंभवादित्याशङ्क्याह -- सैषेति। नन्विच्छा सङ्गोऽभिनिवेशश्चेत्येकोऽर्थस्तत्रेच्छादेरात्मधर्मत्वात्किमविद्ययेत्याशङ्क्य मनोधर्मत्वादिच्छादेर्नात्मधर्मतेत्याह -- नहीति। इच्छादेरनात्मधर्मत्वे किं प्रमाणमित्याशङ्क्याह -- इच्छादि चेति। तस्यात्मधर्मत्वासंभवे फलितमाह -- अत इति। संजयतीव सत्त्वमिति शेषः। इवकारप्रयोगे हेतुमाह -- अविद्ययेति। तस्या वस्तुतो नात्मसंबन्धस्तथापि संबन्ध्यन्तराभावादस्वातन्त्र्याच्चात्मधर्मत्वमापाद्य दृष्टत्वमाचष्टे -- स्वकीयेति। वृत्तिमदन्तःकरणस्य विषयत्वादात्मनः साधकत्वेन तद्विषयत्वेऽपि तदविवेकरूपाविद्येति तत्स्वरूपमाह -- विषयेति। यथोक्ताविद्यामाहात्म्यमिदं यदस्वरूपेऽतद्धर्मे च सक्तिसंपादनमित्याह -- अस्वेति। तदेव स्फुटयति -- सक्तमिवेति। प्रकारान्तरेण सत्त्वस्य निबन्धनत्वमाह -- तथेति। ज्ञायतेऽनेनेति सत्त्वपरिणामो ज्ञानं तेन ज्ञान्यहमिति विपरीताभिमानेन सत्त्वमात्मानं निबध्नातीत्याह -- ज्ञानमित्यादिना। विपक्षे दोषमाह -- आत्मेति। स्वाभाविकत्वेन प्राप्तत्वात्तत्र स्वतः संयोगात्तद्द्वारा बन्धे च तन्निवृत्त्यनुपपत्तेर्नात्मधर्मत्वमित्यर्थः। ज्ञानैश्वर्यादावपि क्षेत्रधर्मे सङ्गस्य पूर्ववदाविद्यकत्वं सूचयति -- सुख इवेति। पापादिदोषहीनस्यैवात्र शास्त्रेऽधिकार इति द्योतयति -- अनघेति।

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Sri Dhanpati

किंलक्षणो गुणः केन सङ्गेन बध्नातीत्यपेक्षायामाह -- तत्रेति। तेषु सत्त्वादिगुणेषु सत्त्वं निर्मलत्वास्फटिकवत्सच्छत्वात् प्रकाशकं चैतन्याभिव्यञ्जकमनामयं निरुपद्रवम्। एतादृशं सत्त्वं सुख्यहमिति विषयभूतस्य सुखस्य विषयिणि प्रत्यगात्मनि मृषैव संश्लेषापादनेन सुखसङ्गेन बध्नाति अविद्ययैव ह्यन्यधर्मोऽन्यस्मिन्नारोप्यते इच्छादिकं धृत्यन्तं क्षेत्रस्य धर्म इत्युक्तं भगवतातोऽविद्ययैव स्वकीयधर्मभूतया विषयविषय्यविवेकलक्षणयाऽस्वात्मभूते सुखे संजयतीवासङ्गं सक्तमिव करोति। असुखिनं सुखिनमिव। तथाच यथोक्ताविद्यामाहात्म्यमिदं यदस्वरुपेऽतद्धर्मे च सक्तिसंपादनम्। प्रकारन्तरेण सत्त्वस्य निबन्धनहेतुत्वमाह -- ज्ञानसङ्गेनचेति। ज्ञायतेऽनेनेति सत्त्वपरिणामो ज्ञानं तेन ज्ञान्यहमिति विपरीताभिमानेन सत्त्वमात्मानं निबध्नाति ज्ञानमिति। सुखासाहचर्यात्। क्षेत्रस्यैवान्तःकरणस्य धर्मो नात्मनः आत्मधर्मत्वे सङ्गानुपपत्तर्बन्धानुपपतेश्च सुखइव ज्ञानादौ सङ्गो मन्तव्यो हेऽनघाघशन्याव्यसन? अनघेति संबोधयन् सुखादिव्यसनाभावसंपत्त्या सत्त्वप्रयुक्तं बन्धनं नार्हसीति सूचयति। पापादिदोषहीनस्यैवात्र शास्त्रेऽधिकार इति द्योतयतीत्येके।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
tatraamongst these
sattvammode of goodness
nirmalatvātbeing purest
prakāśhakamilluminating
anāmayamhealthy and full of well
sukhahappiness
saṅgenaattachment
badhnātibinds
jñānaknowledge
saṅgenaattachment
chaalso
anaghaArjun, the sinless one
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 14.5
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्

हे महाबाहो ! प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले सत्त्व, रज और तम -- ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 14.7
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्

हे कुन्तीनन्दन ! तृष्णा और आसक्तिको पैदा करनेवाले रजोगुणको तुम रागस्वरूप समझो। वह कर्मोंकी आसक्तिसे शरीरधारीको बाँधता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 14Shlok 6
Bhagavad Gita · Adhyay 14, Shlok 6
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ

हे पापरहित अर्जुन ! उन गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल (स्वच्छ) होनेके कारण प्रकाशक और निर्विकार है। वह सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे (देहीको) बाँधता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ: "हे पापरहित अर्जुन ! उन गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल (स्वच्छ) होनेके कारण प्रकाशक और निर्विकार है। वह सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे (देहीको) बाँधता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 6?

Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 6 translates to: "Of these, sattva, which is luminous and healthy due to its stainlessness, binds one by attachment to happiness and knowledge, O sinless one. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 14, श्लोक 6 है जो Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga में संकलित है। हे पापरहित अर्जुन ! उन गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल (स्वच्छ) होनेके कारण प्रकाशक और निर्विकार है। वह सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे (देहीको) बाँधता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "tatra sattvaṁ nirmalatvāt prakāśhakam anāmayam" mean in English?

"tatra sattvaṁ nirmalatvāt prakāśhakam anāmayam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 6. Of these, sattva, which is luminous and healthy due to its stainlessness, binds one by attachment to happiness and knowledge, O sinless one. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.