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Sudarshana Chakra
Adhyay 14, Shlok 12
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ

हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन ! रजोगुणके बढ़नेपर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं। — VaniSagar

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BengaliIND

হে অর্জুন, লোভ, কর্মকাণ্ড, কর্মের উদ্যোগ, অস্থিরতা এবং আকাঙ্ক্ষা- এইগুলি উৎপন্ন হয় যখন রাজস প্রধান হয়।

PunjabiIND

ਲਾਲਚ, ਗਤੀਵਿਧੀ, ਕਿਰਿਆਵਾਂ ਦਾ ਸੰਕਲਪ, ਬੇਚੈਨੀ ਅਤੇ ਲਾਲਸਾ - ਇਹ ਉਦੋਂ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਜਦੋਂ ਰਾਜਸ ਪ੍ਰਬਲ ਹੁੰਦੇ ਹਨ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ।

GujaratiIND

હે અર્જુન, લોભ, પ્રવૃતિ, ક્રિયાઓનું ગ્રહણ, ચંચળતા અને ઝંખના - આ ઉદ્દભવે છે જ્યારે રાજસનું પ્રભુત્વ હોય છે.

KannadaIND

ದುರಾಶೆ, ಚಟುವಟಿಕೆ, ಕಾರ್ಯಗಳನ್ನು ಕೈಗೊಳ್ಳುವುದು, ಚಂಚಲತೆ ಮತ್ತು ಹಂಬಲ-ಇವುಗಳು ರಾಜಸ್ ಪ್ರಧಾನವಾದಾಗ ಉದ್ಭವಿಸುತ್ತವೆ, ಓ ಅರ್ಜುನ.

TeluguIND

దురాశ, కార్యకలాపం, చర్యలు చేపట్టడం, చంచలత్వం మరియు వాంఛ-ఇవి రజస్సు ప్రధానమైనప్పుడు, ఓ అర్జునా.

NepaliIND

हे अर्जुन, लोभ, गतिविधि, कर्मको आचरण, चंचलता र लालसा यी सबै तब उत्पन्न हुन्छन् जब राजस प्रधान हुन्छ।

MalayalamIND

അത്യാഗ്രഹം, കർമ്മം, കർമ്മങ്ങൾ ചെയ്യൽ, അസ്വസ്ഥത, ആഗ്രഹം - ഇവ ഉണ്ടാകുന്നത് രജസ്സ് പ്രബലമാകുമ്പോഴാണ്.

MarathiIND

हे अर्जुना, लोभ, क्रिया, कृती, चंचलता आणि तळमळ - हे जेव्हा राजस प्रधान असतात तेव्हा उद्भवतात.

SindhiIND

لالچ، سرگرمي، عمل جو ارادو، بيچيني ۽ تمنا - هي تڏهن پيدا ٿين ٿا جڏهن راجس غالب ٿئي ٿو، اي ارجن.

TamilIND

பேராசை, செயல்பாடு, செயல்களை மேற்கொள்வது, அமைதியின்மை மற்றும் ஏக்கம் - இவை ராஜஸ் ஆதிக்கம் செலுத்தும் போது எழுகின்றன, ஓ அர்ஜுனா.

MizoIND

Duhamna, thiltih, thiltih, chawlh hahdam lohna, leh duhthusam—hengte hi Rajas a lal ber hunah a lo chhuak thin, Aw Arjuna.

BhojpuriIND

लोभ, क्रियाकलाप, कर्म के उपक्रम, बेचैनी, आ लालसा- ई सब तब पैदा होला जब राजस के प्रधानता होला हे अर्जुन।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'लोभः'--निर्वाहकी चीजें पासमें होनेपर भी उनको अधिक बढ़ानेकी इच्छाका नाम 'लोभ' है। परन्तु उन चीजोंके स्वाभाविक बढ़नेका नाम लोभ नहीं है। जैसे, कोई खेती करता है और अनाज ज्यादा पैदा हो गया, व्यापार करता है और मुनाफा ज्यादा हो गया, तो इस तरह पदार्थ, धन आदिके स्वाभाविक बढ़नेका नाम लोभ नहीं है और यह बढ़ना दोषी भी नहीं है। 'प्रवृत्तिः'--कार्यमात्रमें लग जानेका नाम 'प्रवृत्ति' है। परन्तु राग-द्वेषरहित होकर कार्यमें लग जाना दोषी नहीं है; क्योंकि ऐसी प्रवृत्ति तो गुणातीत महापुरुषमें भी होती है (गीता 14। 22)। रागपूर्वक अर्थात् सुख, आराम, धन आदिकी इच्छाको लेकर क्रियामें प्रवृत्त हो जाना ही दोषी है। 'आरम्भः कर्मणाम्'--संसारमें धनी और बड़ा कहलानेके लिये; मान, आदर, प्रशंसा आदि पानेके लिये नये-नये कर्म करना, नये-नये व्यापार शुरू करना, नयी-नयी फैक्टरियाँ खोलना, नयी-नयी दूकानें खोलना आदि 'कर्मोंका आरम्भ' है। प्रवृत्ति और आरम्भ -- इन दोनोंमें अन्तर है। परिस्थितिके आनेपर किसी कार्यमें प्रवृत्ति होती है और किसी कार्यसे निवृत्ति होती है। परन्तु भोग और संग्रहके उद्देश्यसे नये-नये कर्मोंको शुरू करना 'आरम्भ' है। मनुष्यजन्म प्राप्त होनेपर केवल परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका ही उद्देश्य रहे, भोग और संग्रहका उद्देश्य बिलकुल न रहे -- इसी दृष्टिसे भक्तियोग और ज्ञानयोगमें 'सर्वारम्भपरित्यागी' (12। 16 14। 25) पदसे सम्पूर्ण आरम्भोंका त्याग करनेके लिये कहा गया है। कर्मयोगमें कर्मोंके आरम्भ तो होते हैं, पर वे सभी आरम्भ कामना और संकल्पसे रहित होते हैं (गीता 4। 19)। कर्मयोगमें ऐसे आरम्भ दोषी भी नहीं हैं क्योंकि कर्मयोगमें कर्म करनेका विधान है और बिना कर्म किये कर्मयोगी योग(समता) पर आरूढ़ नहीं हो सकता (6। 3)। अतः आसक्तिरहित होकर प्राप्त परिस्थितिके अनुसार कर्मोंके आरम्भ किये जायँ, तो वे आरम्भ आरम्भ नहीं हैं, प्रत्युत प्रवृत्तिमात्र ही हैं क्योंकि उनसे कर्म करनेका राग मिटता है। वे आरम्भ निवृत्ति देनेवाले होनेसे दोषी नहीं हैं। 'अशमः'--अन्तःकरणमें अशान्ति? हलचल रहनेका नाम अशम है। जैसी इच्छा करते हैं? वैसी चीजें (धन? सम्पत्ति? यश? प्रतिष्ठा आदि) जब नहीं मिलतीं? तब अन्तःकरणमें अशान्ति? हलचल होती है। कामनाका त्याग करनेपर यह अशान्ति नहीं रहती। 'स्पृहा'-- स्पृहा नाम परवाहका है जैसे -- भूख लगनेपर अन्नकी? प्यास करनेपर जलकी? जाड़ा लगनेपर कपड़ेकी परवाह? आवश्यकता होती है। वास्तवमें भूख? प्यास और जाड़ा -- इनका ज्ञान होना दोषी नहीं है? प्रत्युत अन्न? जल आदि मिल जाय -- ऐसी इच्छा करना ही दोषी है। साधकको इस इच्छाका त्याग करना चाहिये क्योंकि कोई भी वस्तु इच्छाके अधीन नहीं है। 'रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ'-- जब भीतरमें रजोगुण बढ़ता है? तब उपर्युक्त लोभ? प्रवृत्ति आदि वृत्तियाँ बढ़ती हैं। ऐसे समयमें साधकको यह विचार करना चाहिये कि अपना जीवननिर्वाह तो हो ही रहा है? फिर अपने लिये और क्या चाहिये ऐसा विचार करके रजोगुणकी वृत्तियोंको मिटा दे? उनसे उदासीन हो जाय। सम्बन्ध--बढ़े हुए तमोगुणके क्या लक्षण होते हैं-- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

उत्पन्न हुए रजोगुणके चिह्न ये होते हैं --, हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ लोभ -- परद्रव्यको प्राप्त करनेकी इच्छा? प्रवृत्ति -- सामान्यभावसे सांसारिक चेष्टा और कर्मोंका आरम्भ तथा अशान्ति -- उपरामताका अभाव? हर्ष और रागादिका प्रवृत्त होना तथा लालसा अर्थात् सामान्यभावसे समस्त वस्तुओंमें तृष्णा -- ये सब चिह्न रजोगुणके बढ़नेपर उत्पन्न होते हैं।

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Sri Anandgiri

अतिशयेनोद्भूतस्य रजसो लिङ्गमाह -- रजस इति। उपक्रमपर्यायस्यारम्भस्य विषयं पृच्छति -- कस्येति। काम्यानि निषिद्धानि च लौकिकानि कर्माणि विषयत्वेन निर्दिशति -- कर्मणामिति। अनुपशमो बाह्यान्तःकरणानामिति शेषः। लोभाद्युपलम्भाद्रजोवृद्धिर्बोद्धव्येति भावः।

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Sri Dhanpati

सत्त्वस्योद्भूतस्य चिह्नमुक्त्वा तथाभृतस्य रजसस्तदाह। लोभः स्वकीयधनादिबाहुल्येऽपि परद्रव्यादिषु लुब्धता,प्रवृत्तिः प्रवर्तनं सामान्यचेष्टा। आरम्भः काम्यनिषिद्धलौकिकिविषयाणां व्यापाराणामुद्यमः। अशमः हर्षरागादिप्रवृत्तेरनुपरमः। सर्वसामान्यवस्तुविषया तृष्णा स्पृहा। रजसि गुणे विवृद्धे एतते लिङ्गानि जायन्ते। लोभाद्युपलम्भाद्रजोविवृद्धिं विद्यादिति भावः। भरतेभ्यः ऋषभः श्रेष्ठस्त्वं रजसश्चिह्नान्याश्रजितुमयोग्योऽसीति सूचयन्नाह हे भरतर्षभेति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
lobhaḥgreed
pravṛittiḥactivity
ārambhaḥexertion
karmaṇāmfor fruitive actions
aśhamaḥrestlessness
spṛihācraving
rajasiof the mode of passion
etānithese
jāyantedevelop
vivṛiddhewhen predominates
bharataṛiṣhabha
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 14.11
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत

जब इस मनुष्यशरीरमें सब द्वारों-(इन्द्रियों और अन्तःकरण-) में प्रकाश (स्वच्छता) और ज्ञान (विवेक) प्रकट हो जाता है, तब जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 14.13
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन

हे कुरुनन्दन ! तमोगुणके बढ़नेपर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह -- ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 14Shlok 12
Bhagavad Gita · Adhyay 14, Shlok 12
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ

हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन ! रजोगुणके बढ़नेपर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ: "हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन ! रजोगुणके बढ़नेपर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 12?

Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 12 translates to: "Greed, activity, the undertaking of actions, restlessness, and longing—these arise when Rajas is predominant, O Arjuna. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 14, श्लोक 12 है जो Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga में संकलित है। हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन ! रजोगुणके बढ़नेपर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "lobhaḥ pravṛittir ārambhaḥ karmaṇām aśhamaḥ spṛihā" mean in English?

"lobhaḥ pravṛittir ārambhaḥ karmaṇām aśhamaḥ spṛihā" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 12. Greed, activity, the undertaking of actions, restlessness, and longing—these arise when Rajas is predominant, O Arjuna. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.