Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 14, Shlok 10
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्त्वगुण सत्त्वगुण, और तमोगुणको दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

MarathiIND

आता हे अर्जुना, रज आणि तम यांच्यावर प्रभुत्व मिळवून सत्त्व प्राबल्य आहे; मग राजस, सत्व आणि तम यांच्यावर मात करून; आणि नंतर तमस, सत्व आणि रजांवर मात करून.

GujaratiIND

હવે, હે અર્જુન, સત્વ પ્રવર્તે છે, રજસ અને તમસ પર વિજય મેળવે છે; પછી રજસ, સત્વ અને તમસ પર વિજય મેળવ્યો; અને પછી તમસ, સત્વ અને રજસ પર વિજય મેળવ્યો.

SindhiIND

ھاڻي اي ارجن، ستيا غالب آھي، راجس ۽ تامس تي غالب ٿي. پوءِ راجس، ستوا ۽ تامس تي غالب هئا. ۽ پوءِ تامس، ستوا ۽ راجس تي غالب ٿي.

BengaliIND

এখন, হে অর্জুন, রজস ও তমসকে পরাজিত করে সত্ত্ব বিরাজ করছে; তারপর রজস, সত্ত্ব ও তমসকে পরাজিত করে; এবং তারপর তমস, সত্ত্ব ও রজসকে পরাজিত করে।

MalayalamIND

ഇപ്പോൾ, ഹേ അർജ്ജുനാ, രജസ്സിനെയും തമസ്സിനെയും കീഴടക്കി സത്വം ജയിക്കുന്നു; പിന്നീട് സത്വത്തെയും തമസ്സിനെയും കീഴടക്കി രജസ്സ്; പിന്നെ സത്വത്തെയും രജസ്സിനെയും കീഴടക്കി തമസ്സ്.

NepaliIND

अब, हे अर्जुन, रजस र तमसलाई जितेर सत्त्व प्रबल हुन्छ; त्यसपछि रजस, सत्व र तमसलाई जितेर; र त्यसपछि तमस, सत्व र रजसलाई जितेर।

PunjabiIND

ਹੁਣ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਰਜਾਂ ਅਤੇ ਤਮਾਸ ਉੱਤੇ ਕਾਬੂ ਪਾ ਕੇ, ਸਤਵ ਪ੍ਰਬਲ ਹੈ; ਤਦ ਰਾਜਸ, ਸਤਵ ਅਤੇ ਤਮਸ ਉੱਤੇ ਕਾਬੂ ਪਾ ਕੇ; ਅਤੇ ਫਿਰ ਤਮਸ, ਸਤਵ ਅਤੇ ਰਾਜਸ ਉੱਤੇ ਕਾਬੂ ਪਾ ਕੇ।

TeluguIND

ఇప్పుడు, ఓ అర్జునా, రజస్సు మరియు తమస్సులను అధిగమించి సత్వగుణం ప్రబలంగా ఉంది; అప్పుడు రాజస్, సత్వ మరియు తమస్సును అధిగమించి; ఆపై తమస్సు, సత్వ మరియు రజస్సులను అధిగమించింది.

TamilIND

இப்போது, ​​ஓ அர்ஜுனா, ரஜஸ் மற்றும் தமஸ்ஸை வென்று, சத்வம் மேலோங்குகிறது; பின்னர் ராஜஸ், சத்வ மற்றும் தமஸ் வெற்றி பெற்ற; பின்னர் தமஸ், சத்வ மற்றும் ரஜஸ்களை வென்றார்.

OdiaIND

ବର୍ତ୍ତମାନ, ହେ ଅର୍ଜୁନ, ରାଜ ଏବଂ ତମାସ୍ଙ୍କୁ ପରାସ୍ତ କରି ସତଭା ବିଜୟୀ; ତାପରେ ରାଜ, ସତ୍ୟ ଏବଂ ତମାଙ୍କୁ ପରାସ୍ତ କଲେ; ଏବଂ ତମାସ୍, ସତ୍ୟ ଏବଂ ରାଜଙ୍କୁ ପରାସ୍ତ କରି |

KannadaIND

ಈಗ, ಓ ಅರ್ಜುನ, ರಜಸ್ ಮತ್ತು ತಮಸ್ಸನ್ನು ಸೋಲಿಸಿ ಸತ್ವವು ಮೇಲುಗೈ ಸಾಧಿಸುತ್ತದೆ; ನಂತರ ರಾಜರು, ಸತ್ವ ಮತ್ತು ತಮಸ್ಸನ್ನು ಸೋಲಿಸಿದರು; ತದನಂತರ ತಮಸ್, ಸತ್ವ ಮತ್ತು ರಜಸ್ಸನ್ನು ಸೋಲಿಸಿದರು.

MizoIND

Tunah chuan, Aw Arjuna, Sattva chu a chak ta a, Rajas leh Tamas te chu a hneh ta a; tichuan Rajas-a chuan Sattva leh Tamas-a chu a hneh tawh a; tin, chutah Tamas chuan Sattva leh Rajas te chu a hneh ta a ni.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत'--रजोगुणकी और तमोगुणकी वृत्तियोंको दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है अर्थात् रजोगुणकी लोभ, प्रवृत्ति, नये-नये कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति, स्पृहा, सांसारिक भोग और संग्रहमें प्रियता आदि वृत्तियाँ और तमोगुणकी प्रमाद, आलस्य, अनावश्यक निद्रा, मूढ़ता आदि वृत्तियाँ -- इन सबको 'सत्त्वगुण' दबा देता है और अन्तःकरणमें स्वच्छता, निर्मलता, वैराग्य, निःस्पृहता, उदारता, निवृत्ति आदि वृत्तियोंको उत्पन्न कर देता है। 'रजः सत्त्वं तमश्चैव'--सत्त्वगुणकी और तमोगुणकी वृत्तियोंको दबाकर रजोगुण बढ़ता है अर्थात् सत्त्वगुणकी ज्ञान, प्रकाश, वैराग्य, उदारता आदि वृत्तियाँ और तमोगुणकी प्रमाद, आलस्य, अनावश्यक, निद्रा, मूढ़ता आदि वृत्तियाँ -- इन सबको रजोगुण दबा देता है और अन्तःकरणमें लोभ, प्रवृत्ति, आरम्भ, अशान्ति, स्पृहा आदि वृत्तियोंको उत्पन्न कर देता है। 'तमः सत्त्वं रजस्तथा'--वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ता है अर्थात् सत्त्वगुणकी स्वच्छता, निर्मलता, प्रकाश, उदारता आदि वृत्तियाँ और रजोगुणकी चञ्चलता, अशान्ति, लोभ आदि वृत्तियाँ -- इन सबको तमोगुण दबा देता है और अन्तःकरणमें प्रमाद, आलस्य, अतिनिद्रा, मूढ़ता आदि वृत्तियोंको उत्पन्न कर देता है। दो गुणोंको दबाकर एक गुण बढ़ता है, बढ़ा हुआ गुण मनुष्यपर विजय करता है और विजय करके मनुष्यको बाँध देता है। परन्तु भगवान्ने यहाँ (छठेसे दसवें श्लोकतक) उलटा क्रम दिया है अर्थात् पहले बाँधनेकी बात कही, फिर विजय करना कहा और फिर दो गुणोंको दबाकर एकका बढ़ना कहा। ऐसे क्रम देनेका तात्पर्य है -- पहले भगवान्ने दूसरे श्लोकमें बताया कि जिन महापुरुषोंका प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद हो चुका है, वे महासर्गमें भी उत्पन्न नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते। कारण कि महासर्ग और महाप्रलय दोनों प्रकृतिके सम्बन्धसे ही होते हैं। परन्तु जो मनुष्य प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जो़ड़ लेते हैं, उनको प्रकृतिजन्य गुण बाँध देते हैं (14। 5)। इसपर स्वाभाविक ही यह प्रश्न होता है कि उन गुणोंका स्वरूप क्या है और वे मनुष्यको किस प्रकार बाँध देते हैं? इसके उत्तरमें भगवान्ने छठेसे आठवें श्लोकतक क्रमशः सत्त्व, रज और तम--तीनों गुणोंका स्वरूप और उनके द्वारा जीवको बाँधे जानेका प्रकार बताया। इसपर प्रश्न होता है कि बाँधनेसे पहले तीनों गुण क्या करते हैं इसके उत्तरमें भगवान्ने बताया कि बाँधनेसे पहले बढ़ा हुआ गुण मनुष्यपर विजय करता है, तब उसको बाँधता है (14। 9)। अब प्रश्न होता है कि गुण मनुष्यपर विजय कैसे करता है? इसके उत्तरमें भगवान्ने कहा कि दो गुणोंको दबाकर एक गुण मनुष्यपर विजय करता है (14। 10)। इस प्रकार विचार करनेसे मालूम होता है कि भगवान्ने छठेसे दसवें श्लोकतक जो क्रम रखा है, वह ठीक ही है। सम्बन्ध--जब दोगुणोंको दबाकर एक गुण बढ़ता है, तब उस बढ़े हुए गुणके क्या लक्षण होते हैं-- इसको बतानेके लिये पहले बढ़े हुए सत्त्वगुणके लक्षणोंका वर्णन करते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

ये तीनों गुण उपर्युक्त कार्य कब करते हैं सो कहते हैं --, हे भारत रजोगुण और तमोगुण -- इन दोनोंको दबाकर जब सत्त्वगुण उन्नत होता है -- बढ़ता है? तब वह अपने स्वरूपको प्राप्त हुआ सत्त्वगुण अपने कार्यज्ञान और सुखादिका आरम्भ किया करता है। तथा सत्त्वगुण और तमोगुण -- इन दोनोंको ही दबाकर जब रजोगुण बढ़ता है तब वह कर्मोंमें तृष्णा आदि अपने कार्यका आरम्भ किया करता है। वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण इन दोनोंको दबाकर जब तम नामक गुण बढ़ता है तब वह ज्ञानको आच्छादित करना आदि अपना कार्य आरम्भ किया करता है।,

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

इतरेतराविरोधेन वा सत्त्वादयो गुणा युगपदुत्कृष्यते विरोधेन वा क्रमेण वेति संदेहात्पृच्छति -- उक्तमिति। सत्त्वोत्कर्षार्थिनामितराभिभवार्थं क्रमपक्षमाश्रित्योत्तरमाह -- उच्यत इति। सत्त्वाभिवृद्धिमेव विवृणोति -- तदेति। रजस्तमसोस्तिरोधानदशायामिति यावत्। रजसो वृद्धिप्रकारं तत्कार्यं च कथयति -- तथेति। तमसोऽपि विवृद्धिं तत्कार्यं च निर्दिशति -- तम इति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

इतराविरोधेन सत्त्वादयो गुणा युगपदुत्कृष्यन्ते विरोधेन वा क्रमेण वेत्यपेक्षायां सत्त्वोत्कर्षार्थिनामितराबिभवार्थं क्रमपक्षमाश्रित्याह -- रज इति। रजस्तमश्चोभावप्यभिमूय तिरोधाय सत्त्वं भवत्युत्भवति वर्धते यदा तदा रजस्तमसोस्तिरोधानदशायां लब्धात्मकं सत्त्वं स्वं कार्यं ज्ञानसुखाद्यारभत इति शेषः। भारतेति संबोधयन् भायां ब्रह्मविद्यायां रतेन रजस्तमसोस्तिरोधायिका सत्त्ववृद्धिः संपाद्येति द्योतयति। तथा रजोगुणो यदा सत्त्वं तमश्चैवोभावभिभूय वर्धते तदा कर्म तृष्णादि स्वं कार्यमारभते। एवं तमआख्योऽपि गुणो यदा सत्त्वं रजश्चैवोभावभिभूय वर्धते तदा ज्ञानावरणप्रमादादि स्वं कार्यभारभत इत्यर्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
rajaḥmode of passion
tamaḥmode of ignorance
chaand
abhibhūyaprevails
sattvammode of goodness
bhavatibecomes
bhārataArjun, the son of Bharat
rajaḥmode of passion
sattvammode of goodness
tamaḥmode of ignorance
chaand
evaindeed
tamaḥmode of ignorance
sattvammode of goodness
rajaḥmode of passion
tathāalso
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 14.9
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! सत्त्वगुण सुखमें और रजोगुण कर्ममें लगाकर मनुष्यपर विजय करता है तथा तमोगुण ज्ञानको ढककर एवं प्रमादमें भी लगाकर मनुष्यपर विजंय करता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 14.11
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत

जब इस मनुष्यशरीरमें सब द्वारों-(इन्द्रियों और अन्तःकरण-) में प्रकाश (स्वच्छता) और ज्ञान (विवेक) प्रकट हो जाता है, तब जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 14Shlok 10
Bhagavad Gita · Adhyay 14, Shlok 10
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्त्वगुण सत्त्वगुण, और तमोगुणको दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ता है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ: "हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्त्वगुण सत्त्वगुण, और तमोगुणको दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 10?

Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 10 translates to: "Now, O Arjuna, Sattva prevails, having overpowered Rajas and Tamas; then Rajas, having overpowered Sattva and Tamas; and then Tamas, having overpowered Sattva and Rajas. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 14, श्लोक 10 है जो Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga में संकलित है। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्त्वगुण सत्त्वगुण, और तमोगुणको दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "rajas tamaśh chābhibhūya sattvaṁ bhavati bhārata" mean in English?

"rajas tamaśh chābhibhūya sattvaṁ bhavati bhārata" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 10. Now, O Arjuna, Sattva prevails, having overpowered Rajas and Tamas; then Rajas, having overpowered Sattva and Tamas; and then Tamas, having overpowered Sattva and Rajas. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.