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Bhagavad Gita · BG 12.18

Bhagavad Gita 12.18 — Commentary

18 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti

Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more

Sanskrit Original — मूल श्लोक

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः

samaḥ śhatrau cha mitre cha tathā mānāpamānayoḥ śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ

"He who is the same to foe and friend, and also in honor and dishonor, who is the same in cold and heat, in pleasure and pain, and who is free from attachment."

Scholar Commentaries (18)

Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.

Sri Shankaracharya

8th century CE · Advaita Vedanta

Advaita

The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.

,समः शत्रौ च मित्रे च? तथा मानापमानयोः पूजापरिभवयोः? शीतोष्णसुखदुःखेषु समः? सर्वत्र च सङ्गविवर्जितः।।किञ्च --,

Sri Ramanuja

11th–12th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.

अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् (गीता 12।13) इत्यादिना शत्रुमित्रादिषु द्वेषादिरहितत्वम् उक्तम्। अत्र तेषु सन्निहितेषु अपि समचित्तत्वम्? ततः अपि अतिरिक्तो विशेष उच्यते।आत्मनि स्थिरमतित्वेन निकेतनादिषु असक्त इति अनिकेतः? तत एव मानापमानादिषु अपि समः? य एवंभूतो भक्तिमान् स मे प्रियः।अस्माद् आत्मनिष्ठात् मद्भक्तियोगनिष्ठस्य श्रैष्ठ्यं प्रतिपादयन् यथोपक्रमम् उपसंहरति --

Sri Madhavacharya

13th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.

Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

Swami Sivananda

20th century CE · Integral Yoga

Integral Yoga

Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.

12.18 समः (he who is) the same? शत्रौ to foe? च and? मित्रे to friend? च and? तथा also? मानापमानयोः in honour and dishonour? शीतोष्णसुखदुःखेषु in cold and heat? in pleasure and pain? समः the same? सङ्गविवर्जितः free from attachment.Commentary The ordinary man of the world is ruled by the pairs of opposites? honour and dishonour? cold and heat and pleasure and pain but a Yogi or a sage or a devotee (Bhagavata) has a balanced mind. He has poise or eanimity. He is not at all swayed by the blind forces of attraction and repulsion.He who does wrong to others is a foe. He who does good to others is a friend.The devotee or the sage has no attachment for objects of any kind.

Swami Ramsukhdas

20th century CE · Gita Press Gorakhpur

Bhakti

Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.

व्याख्या -- समः शत्रौ च मित्रे च -- यहाँ भगवान्ने भक्तमें व्यक्तियोंके प्रति होनेवाली समताका वर्णन किया है। सर्वत्र भगवद्बुद्धि होने तथा रागद्वेषसे रहित होनेके कारण सिद्ध भक्तका किसीके भी प्रति शत्रुमित्रका भाव नहीं रहता। लोग ही उसके व्यवहारमें अपने स्वभावके अनुसार अनुकूलता या प्रतिकूलताको देखकर उसमें मित्रता या शत्रुताका आरोप कर लेते हैं। साधारण लोगोंका तो कहना ही क्या है? सावधान रहनेवाले साधकोंका भी उस सिद्ध भक्तके प्रति मित्रता और शत्रुताका भाव हो सकता है। परंतु भक्त अपनेआपमें सदैव पूर्णतया सम रहता है। उसके हृदयमें कभी किसीके प्रति शत्रुमित्रका भाव उत्पन्न नहीं होता।मान लिया जाय कि भक्तके प्रति शत्रुता और मित्रताका भाव रखनेवाले दो व्यक्तियोंमें धनके बँटवारेसे सम्बन्धित कोई विवाद हो जाय और उसका निर्णय करानेके लिये वे भक्तके पास जायँ? तो भक्त धनका बँटवारा करते समय शत्रुभाववाले व्यक्तिको कुछ अधिक और मित्रभाववाले व्यक्तिको कुछ कम धन देगा। यद्यपि भक्तके इस निर्णय(व्यवहार) में विषमता दीखती है? तथापि शत्रुभाववाले व्यक्तिको इस निर्णयमें समता दिखायी देगी कि इसने पक्षपातरहित बँटवारा किया है। अतः भक्तके इस निर्णयमें विषमता (पक्षपात) दीखनेपर भी वास्तवमें यह (समताको उत्पन्न करनेवाला होनेसे) समता ही कहलायेगी।उपर्युक्त पदोंसे यह भी सिद्ध होता है कि सिद्ध भक्तके साथ भी लोग (अपने भावके अनुसार) शत्रुतामित्रताका व्यवहार करते हैं और उसके व्यवहारसे अपनेको उसका शत्रुमित्र मान लेते हैं। इसीलिये उसे यहाँ शत्रुमित्रसे रहित न कहकर शत्रुमित्रमें सम कहा गया है।तथा मानापमानयोः -- मानअपमान परकृत क्रिया है? जो शरीरके प्रति होती है। भक्तकी अपने कहलानेवाले शरीरमें न तो अहंता होती है? न ममता। इसलिये शरीरका मानअपमान होनेपर भी भक्तके अन्तःकरणमें कोई विकार (हर्षशोक) पैदा नहीं होता। वह नित्यनिरन्तर समतामें स्थित रहता है।शीतोष्णसुखदुःखेषु समः -- इन पदोंमें दो स्थानोंपर सिद्ध भक्तकी समता बतायी गयी है -- (1) शीतउष्णमें समता अर्थात् इन्द्रियोंका अपनेअपने विषयोंसे संयोग होनेपर अन्तःकरणमें कोई विकार न होना।(2) सुखदुःखमें समता अर्थात् धनादि पदार्थोंकी प्राप्ति या अप्राप्ति होनेपर अन्तःकरणमें कोई विकार न होना।शीतोष्ण शब्दका अर्थ सरदीगरमी होता है। सरदीगरमी त्वगिन्द्रियके विषय हैं। भक्त केवल त्वगिन्द्रियके विषयोंमें ही सम रहता हो? ऐसी बात नहीं है। वह तो समस्त इन्द्रियोंके विषयोंमें सम रहता है। अतः यहाँ शीतोष्ण शब्द समस्त इन्द्रियोंके विषयोंका वाचक है। प्रत्येक इन्द्रियका अपनेअपने विषयके साथ संयोग होनेपर भक्तको उन (अनुकूल या प्रतिकूल) विषयोंका ज्ञान तो होता है? पर उसके अन्तःकरणमें,हर्षशोकादि विकार नहीं होते। वह सदा सम रहता है।साधारण मनुष्य धनादि अनुकूल पदार्थोंकी प्राप्तिमें सुख तथा प्रतिकूल पदार्थोंकी प्राप्तिमें दुःखका अनुभव करते हैं। परन्तु उन्हीं पदार्थोंके प्राप्त होने अथवा न होनेपर सिद्ध भक्तके अन्तःकरणमें कभी किञ्चिन्मात्र भी रागद्वेष? हर्षशोकादि विकार नहीं होते। वह प्रत्येक परिस्थितिमें सम रहता है।सुखदुःखमें सम रहने तथा सुखदुःखसे रहित होने -- दोनोंका गीतामें एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। सुखदुःखकी परिस्थिति अवश्यम्भावी है अतः उससे रहित होना सम्भव नहीं है। इसलिये भक्त अनुकूल तथा प्रतिकूल परिस्थितियोंमे सम रहता है। हाँ? अनुकूल तथा प्रतिकूल परिस्थितिको लेकर अन्तःकरणमें जो हर्षशोक होते हैं? उनसे रहित हुआ जा सकता है। इस दृष्टिसे गीतामें जहाँ सुखदुःखमें सम होनेकी बात आयी है? वहाँ सुखदुःखकी परिस्थितिमें सम समझना चाहिये और जहाँ सुखदुःखसे रहित होनेकी बात आयी है? वहाँ (अनुकूल तथा प्रतिकूल परिस्थितिकी प्राप्तिसे होनेवाले) हर्षशोकसे रहित समझना चाहिये।सङ्गविवर्जितः -- सङ्ग शब्दका अर्थ सम्बन्ध (संयोग) तथा आसक्ति दोनों ही होते हैं। मनुष्यके लिये यह सम्भव नहीं है कि वह स्वरूपसे सब पदार्थोंका सङ्ग अर्थात् सम्बन्ध छोड़ सके क्योंकि जबतक मनुष्य जीवित रहता है? तबतक शरीरमनबुद्धिइन्द्रियाँ उसके साथ रहती ही हैं। हाँ? शरीरसे भिन्न कुछ पदार्थोंका त्याग स्वरूपसे किया जा सकता है। जैसे किसी व्यक्तिने स्वरूपसे प्राणीपदार्थोंका सङ्ग छो़ड़ दिया? पर उसके अन्तःकरणमें अगर उनके प्रति किञ्चिन्मात्र भी आसक्ति बनी हुई है? तो उन प्राणीपदार्थोंसे दूर होते हुए भी वास्तवमें उसका उनसे सम्बन्ध बना हुआ ही है। दूसरी ओर? अगर अन्तःकरणमें प्राणीपदार्थोंकी किञ्चिन्मात्र भी आसक्ति नहीं है? तो पास रहते हुए भी वास्तवमें उनसे सम्बन्ध नहीं है। अगर पदार्थोंका स्वरूपसे त्याग करनेपर ही मुक्ति होती? तो मरनेवाला हरेक व्यक्ति मुक्त हो जाता क्योंकि उसने तो अपने शरीरका भी त्याग कर दिया परन्तु ऐसी बात है नहीं। अन्तःकरणमें आसक्तिके रहते हुए शरीरका त्याग करनेपर भी संसारका बन्धन बना रहता है। अतः मनुष्यको सांसारिक आसक्ति ही बाँधनेवाली है? न कि सांसारिक प्राणीपदार्थोंका स्वरूपसे सम्बन्ध।आसक्तिको मिटानेके लिये पदार्थोंका स्वरूपसे त्याग करना भी एक साधन हो सकता है किंतु खास जरूरत आसक्तिका सर्वथा त्याग करनेकी ही है। संसारके प्रति यदि किञ्चिन्मात्र भी आसक्ति है? तो उसका चिन्तन अवश्य होगा। इस कारण वह आसक्ति साधकको क्रमशः कामना? क्रोध? मूढ़ता आदिको प्राप्त कराती हुई उसे पतनके गर्तमें गिरानेका हेतु बन सकती है (गीता 2। 62 63)।भगवान्ने दूसरे अध्यायके उनसठवें श्लोकमें परं दृष्ट्वा निवर्तते पदोंसे भगवत्प्राप्तिके बाद आसक्तिकी सर्वथा निवृत्तिकी बात कही है। भगवत्प्राप्तिसे पहले भी आसक्तिकी निवृत्ति हो सकती है? पर भगवत्प्राप्तिके बाद तो आसक्ति सर्वथा निवृत्त हो ही जाती है। भगवत्प्राप्त महापुरुषमें आसक्तिका सर्वथा अभाव होता ही है। परन्तु भगवत्प्राप्तिसे पूर्व साधनावस्थामें आसक्तिका सर्वथा अभाव होता ही नहीं -- ऐसा नियम नहीं है। साधनावस्थामें भी आसक्तिका सर्वथा अभाव होकर साधकको तत्काल भगवत्प्राप्ति हो सकती है। (गीता 5। 21 16। 22)।आसक्ति न तो परमात्माके अंश शुद्ध चेतनमें रहती है और न जड(प्रकृति) में ही। वह जड और चेतनके सम्बन्धरूप मैंपनकी मान्यतामें रहती है। वही आसक्ति बुद्धि? मन? इन्द्रियों और विषयों(पदार्थों) में प्रतीत होती है। अगर साधकके मैंपनकी मान्यतामें रहनेवाली आसक्ति मिट जाय? तो दूसरी जगह प्रतीत होनेवाली आसक्ति स्वतः मिट जायगी। आसक्तिका कारण अविवेक है। अपने विवेकको पूर्णतया महत्त्व न देनेसे साधकमें आसक्ति रहती है। भक्तमें अविवेक नहीं रहता। इसलिये वह आसक्तिसे सर्वथा रहित होता है।अपने अंशी भगवान्से विमुख होकर भूलसे संसारको अपना मान लेनेसे संसारमें राग हो जाता है और राग होनेसे संसारमें आसक्ति हो जाती है। संसारसे माना हुआ अपनापन सर्वथा मिट जानेसे बुद्धि सम हो जाती है। बुद्धिके सम होनेपर स्वयं आसक्ति रहित हो जाता है।मार्मिक बातवास्तवमें जीवमात्रकी भगवान्के प्रति स्वाभाविक अनुरक्ति (प्रेम) है। जबतक संसारके साथ भूलसे माना हुआ अपनेपनका सम्बन्ध है? तबतक वह अनुरक्ति प्रकट नहीं होती? प्रत्युत संसारमें आसक्तिके रूपमें प्रतीत होती है। संसारकी आसक्ति रहते हुए भी वस्तुतः भगवान्की अनुरक्ति मिटती नहीं। अनुरक्तिके प्रकट होते ही आसक्ति (सूर्यका उदय होनेपर अंधकारकी तरह) सर्वथा निवृत्त हो जाती है। ज्योंज्यों संसारसे विरक्ति होती है? त्योंहीत्यों भगवान्में अनुरक्ति प्रकट होती है। यह नियम है कि आसक्तिको समाप्त करके विरक्ति स्वयं भी उसी प्रकार शान्त हो जाती है? जिस प्रकार लकड़ीको जलाकर अग्नि। इस प्रकार आसक्ति और विरक्तिके न रहनेपर स्वतःस्वाभाविक अनुरक्ति(भगवत्प्रेम) का स्रोत प्रवाहित होने लगता है। इसके लिये किञ्चिन्मात्र भी कोई उद्योग नहीं करना पड़ता। फिर भक्त सब प्रकारसे भगवान्के पूर्ण समर्पित हो जाता है। उसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ भगवान्की प्रियताके लिये ही होती हैं। उससे प्रसन्न होकर भगवान् उस भक्तको अपना प्रेम प्रदान करते हैं। भक्त उस प्रेमको भी भगवान्के ही प्रति लगा देता है। इससे भगवान् और आनन्दित होते हैं तथा पुनः उसे प्रेम प्रदान करते हैं। भक्त पुनः उसे भगवान्के प्रति लगा देता है। इस प्रकार भक्त और भगवान्के बीच प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमके आदानप्रदानकी यह लीला चलती रहती है।तुल्यनिन्दास्तुतिः -- निन्दास्तुति मुख्यतः नामकी होती है। यह भी परकृत क्रिया है। लोग अपने स्वभावके अनुसार भक्तकी निन्दा या स्तुति किया करते हैं। भक्तमें अपने कहलानेवाले नाम और शरीरमें लेशमात्र भी अहंता और ममता नहीं होती। इसलिये निन्दास्तुतिका उसपर लेशमात्र भी असर नहीं पड़ता। भक्तका न तो अपनी स्तुति या प्रशंसा करनेवालेके प्रति राग होता है और न निन्दा करनेवालेके प्रति द्वेष ही होता है। उसकी दोनोंमें ही समबुद्धि रहती है।साधारण मनुष्योंके भीतर अपनी प्रशंसाकी कामना रहा करती है? इसलिये वे अपनी निन्दा सुनकर दुःखका और स्तुति सुनकर सुखका अनुभव करते हैं। इसके विपरीत (अपनी प्रशंसा न चाहनेवाले) साधक पुरुष निन्दा सुनकर सावधान होते हैं और स्तुति सुनकर लज्जित होते हैं। परन्तु नाममें किञ्चिन्मात्र भी अपनापन न होनेके कारण सिद्ध भक्त इन दोनों भावोंसे रहित होता है अर्थात् निन्दास्तुतिमें सम होता है। हाँ? वह भी कभीकभी लोकसंग्रहके लिये साधककी तरह (निन्दामें सावधान तथा स्तुतिमें लज्जित होनेका) व्यवहार कर सकता है।भक्तकी सर्वत्र भगवद्बुद्धि होनेके कारण भी उसका निन्दास्तुति करनेवालोंमें भेदभाव नहीं होता। ऐसा भेदभाव न रहनेसे ही यह प्रतीत होता है कि वह निन्दास्तुतिमें सम है।भक्तके द्वारा अशुभ कर्म तो हो ही नहीं सकते और शुभकर्मोंके होनेमें वह केवल भगवान्को हेतु मानता है। फिर भी उसकी कोई निन्दा या स्तुति करे? तो उसके चित्तमें कोई विकार पैदा नहीं होता।मौनी -- सिद्ध भक्तके द्वारा स्वतःस्वाभाविक भगवत्स्वरूपका मनन होता रहता है? इसलिये उसको मौनी अर्थात् मननशील कहा गया है। अन्तःकरणमें आनेवाली प्रत्येक वृत्तिमें उसको वासुदेवः सर्वम् (गीता 7। 19) सब कुछ भगवान् ही हैं -- यही दीखता है। इसलिये उसके द्वारा निरन्तर ही भगवान्का मनन होता है।यहाँ मौनी पदका अर्थ वाणीका मौन रखनेवाला नहीं माना जा सकता क्योंकि ऐसा माननेसे वाणीके द्वारा भक्तिका प्रचार करनेवाले भक्त पुरुष भक्त ही नहीं कहलायेँगे। इसके सिवाय अगर वाणीका मौन रखनेमात्रसे भक्त होना सम्भव होता? तो भक्त होना बहुत ही आसान हो जाता और ऐसे भक्त अंसख्य बन जाते किंतु संसारमें भक्तोंकी संख्या अधिक देखनेमें नहीं आती। इसके सिवाय आसुर स्वभाववाला दम्भी व्यक्ति भी हठपूर्वक वाणीका मौन रख सकता है। परन्तु यहाँ भगवत्प्राप्त सिद्ध भक्तके लक्षण बताये जा रहे हैं। इसलिये यहाँ मौनी पदका अर्थ भगवत्स्वरूपका मनन करनेवाला ही मानना युक्तिसंगत है।संतुष्टो येन केनचित् -- दूसरे लोगोंको भक्त संतुष्टो येन केनचित् अर्थात् प्रारब्धानुसार शरीरनिर्वाहके लिये जो कुछ मिल जाय? उसीमें संतुष्ट दीखता है परन्तु वास्तवमें भक्तकी संतुष्टिका कारण कोई सांसारिक पदार्थ? परिस्थिति आदि नहीं होती। एकमात्र भगवान्में ही प्रेम होनेके कारण वह नित्यनिरन्तर भगवान्में ही संतुष्ट रहता है। इस संतुष्टिके कारण वह संसारकी प्रत्येक अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिमें सम रहता है क्योंकि उसके अनुभवमें प्रत्येक अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भगवान्के मङ्लमय विधानसे ही आती है। इस प्रकार प्रत्येक परिस्थितिमें नित्यनिरन्तर संतुष्ट रहनेके कारण उसे संतुष्टो येन केनचित् कहा गया है।अनिकेतः -- जिनका कोई निकेत अर्थात् वासस्थान नहीं है? वे ही अनिकेत हों -- ऐसी बात नहीं है। चाहे गृहस्थ हों या साधुसंन्यासी? जिनकी अपने रहनेके स्थानमें ममताआसक्ति नहीं है? वे सभी अनिकेत हैं। भक्तका रहनेके स्थानमें और शरीर (स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीर) में लेशमात्र भी अपनापन एवं आसक्ति नहीं होती। इसलिये उसको अनिकेतः कहा गया है।स्थिरमतिः -- भक्तकी बुद्धिमें भगवत्तत्त्वकी सत्ता और स्वरूपके विषयमें कोई संशय अथवा विपर्यय (विपरीत ज्ञान) नहीं होता। अतः उसकी बुद्धि भगवत्तत्त्वके ज्ञानसे कभी किसी अवस्थामें विचलित नहीं होती। इसलिये उसको स्थिरमतिः कहा गया है। भगवत्तत्त्वको जाननेके लिये उसको कभी किसी प्रमाण या शास्त्रविचार? स्वाध्याय आदिकी जरूरत नहीं रहती क्योंकि वह स्वाभाविकरूपसे भगवत्तत्त्वमें तल्लीन रहता है।स्थिरबुद्धि होनेमें कामनाएँ ही बाधक होती हैं (गीता 2। 44)। अतः कामनाओंके त्यागसे ही स्थिरबुद्धि होना सम्भव है (गीता 2। 55)। अन्तःकरणमें सांसारिक (संयोगजन्य) सुखकी कामना रहनेसे संसारमें आसक्ति हो जाती है। यह आसक्ति संसारको असत्य या मिथ्या जान लेनेपर भी मिटती नहीं जैसे -- सिनेमामें दीखनेवाले दृश्य(प्राणीपदार्थों) को मिथ्या जानते हुए भी उसमें आसक्ति हो जाती है अथवा जैसे भूतकालकी बातोंको याद करते समय मानसिक दृष्टिके सामने आनेवाले दृश्यको मिथ्या जानते हुए भी उसमें आसक्ति हो जाती है। अतः जबतक भीतरमें सांसारिक सुखकी कामना है? तबतक संसारको मिथ्या माननेपर भी संसारकी आसक्ति नहीं मिटती। आसक्तिसे संसारकी स्वतन्त्र सत्ता दृढ़ होती है। सांसारिक सुखकी कामना मिटनेपर आसक्ति स्वतः मिट जाती है। आसक्ति मिटनेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव हो जाता है और एक भगवत्तत्त्वमें बुद्धि स्थिर हो जाती है।भक्तिमान्मे प्रियो नरः -- भक्तिमान् पदमें भक्ति शब्दके साथ नित्ययोगके अर्थमें मतुप् प्रत्यय है। इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्यमें स्वाभाविकरूपसे भक्ति (भगवत्प्रेम) रहती है। मनुष्यसे भूल यही होती है कि वह भगवान्को छोड़कर संसारकी भक्ति करने लगता है। इसलिये उसे स्वाभाविक रहनेवाली भगवद्भक्तिका रस नहीं मिलता और उसके जीवनमें नीरसता रहती है। सिद्ध भक्त हरदम भक्तिरसमें तल्लीन रहता है। इसलिये उसको भक्तिमान् कहा गया है। ऐसा भक्तिमान् मनुष्य भगवान्को प्रिय होता है।नरः पद देनेका तात्पर्य है कि भगवान्को प्राप्त करके जिसने अपना मनुष्यजीवन सफल (सार्थक) कर लिया है? वही वास्तवमें नर (मनुष्य) कहलानेयोग्य है। जो मनुष्यशरीरको पाकर सांसारिक भोग और संग्रहमें ही लगा हुआ है? वह नर (मनुष्य) कहलानेयोग्य नहीं है।[इन दो श्लोकोंमें भक्तके सदासर्वदा समभावमें स्थित रहनेकी बात कही गयी है। शत्रुमित्र? मानअपमान? शीतउष्ण? सुखदुःख और निन्दास्तुति -- इन पाँचों द्वन्द्वोंमें समता होनेसे ही साधक पूर्णतः समभावमें स्थित कहा जा सकता है।]प्रकरणसम्बन्धी विशेष बातभगवान्ने पहले प्रकरणके अन्तर्गत तेरहवेंचौदहवें श्लोकोंमें सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंका वर्णन करके अन्तमें यो मद्भक्तः स मे प्रियः कहा? दूसरे प्रकरणके अन्तर्गत पन्द्रहवें श्लोकके अन्तमें यः स च मे प्रियः कहा? तीसरे प्रकरणके अन्तर्गत सोलहवें श्लोकके अन्तमें यो मद्भक्तः स मे प्रियः कहा? चौथे प्रकरणके अन्तर्गत सत्रहवें श्लोकके अन्तमें भक्तिमान् यः स म प्रियः कहा और अन्तिम पाँचवें प्रकरणके अन्तर्गत अठारहवेंउन्नीसवें श्लोकोंके अन्तमें भक्तिमान् मे प्रियो नरः कहा। इस प्रकार भगवान्ने पाँच बार अलगअलग मे प्रियः पद देकर सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंको पाँच भागोंमें विभक्त किया है। इसलिये सात श्लोकोंमें बताये गये सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंको एक ही प्रकरणके अन्तर्गत नहीं समझना चाहिये। इसका मुख्य कारण यह है कि यदि यह एक ही प्रकरण होता? तो एक लक्षणको बारबार न कहकर एक ही बार कहा जाता? और मे प्रियः पद भी एक ही बार कहे जाते।पाँचों प्रकरणोंके अन्तर्गत सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंमें रागद्वेष और हर्षशोकका अभाव बताया गया है। जैसे? पहले प्रकरणमें निर्ममः पदसे रागका? अद्वेष्टा पदसे द्वेषका और समदुःखसुखः पदसे हर्षशोकका अभाव बताया गया है। दूसरे प्रकरणमें हर्षामर्षभयोद्वेगैः पदसे रागद्वेष और हर्षशोकका अभाव बताया गया है। तीसरे प्रकरणमें अनपेक्षः पदसे रागका? उदासीनः पदसे द्वेषका और गतव्यथः पदसे हर्षशोकका अभाव बताया गया है। चौथे प्रकरणमें न काङ्क्षति पदोंसे रागका? न द्वेष्टि पदोंसे द्वेषका और न हृष्यति तथा न शोचति पदोंसे हर्षशोकका अभाव बताया गया है। अन्तिम पाँचवें प्रकरणमें सङ्गविवर्जितः पदसे रागका? संतुष्टः पदसे एकमात्र भगवान्में ही सन्तुष्ट रहनेके कारण द्वेषका और शीतोष्णसुखदुःखेषु समः पदोंसे हर्षशोकका अभाव बताया गया है।अगर सिद्ध भक्तोंके लक्षण बतानेवाला (सात श्लोकोंका) एक ही प्रकरण होता? तो सिद्ध भक्तमें रागद्वेष? हर्षशोकादि विकारोंके अभावकी बात कहीं शब्दोंसे और कहीं भावसे बारबार कहनेकी जरूरत नहीं होती। इसी तरह चौदहवें और उन्नीसवें श्लोकमें सन्तुष्टः पदका तथा तेरहवें श्लोकमें समदुःखसुखः और अठारहवें श्लोकमें शीतोष्णसुखदुःखेषु समः पदोंका भी सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंमें दो बार प्रयोग हुआ है? जिससे (सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंका एक ही प्रकरण माननेसे) पुनरुक्तिका दोष आता है। भगवान्के वचनोंमें पुनरुक्तिका दोष आना सम्भव ही नहीं। अतः सातों श्लोकोंके विषयको एक प्रकरण न मानकर अलगअलग पाँच प्रकरण मानना ही युक्तिसंगत है।इस तरह पाँचों प्रकरण स्वतन्त्र (भिन्नभिन्न) होनेसे किसी एक प्रकरणके भी सब लक्षण जिसमें हों? वही भगवान्का प्रिय भक्त है। प्रत्येक प्रकरणमें सिद्ध भक्तोंके अलगअलग लक्षण बतानेका कारण यह है कि साधनपद्धति? प्रारब्ध? वर्ण? आश्रम? देश? काल? परिस्थिति आदिके भेदसे सब भक्तोंकी प्रकृति(स्वभाव) में परस्पर थोड़ाबहुत भेद रहा करता है। हाँ? रागद्वेष? हर्षशोकादि विकारोंका अत्यन्ताभाव एवं समतामें स्थिति और समस्त प्राणियोंके हितमें रति सबकी समान ही होती है।साधकको अपनी रुचि? विश्वास? योग्यता? स्वभाव आदिके अनुसार जो प्रकरण अपने अनुकूल दिखायी दे? उसीको आदर्श मानकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेमें लग जाना चाहिये। किसी एक प्रकरणके भी यदि पूरे लक्षण अपनेमें न आयें? तो भी साधकको निराश नहीं होना चाहिये। फिर सफलता अवश्यम्भावी है। सम्बन्ध -- पीछेके सात श्लोकोंमें भगवान्ने सिद्ध भक्तोंके कुल उनतालीस लक्षण बताये। अब आगेके श्लोकमें भगवान् अर्जुनके प्रश्नका स्पष्ट रीतिसे उत्तर देते हैं।

Sri Harikrishnadas Goenka

19th–20th century CE · Gita Press

Vaishnava

Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.

जो शत्रुमित्रमें और मानापमानमें अर्थात् सत्कार और तिरस्कारमें समान रहता है एवं शीतउष्ण और सुखदुःखमें भी समभाववाला है तथा सर्वत्र आसक्तिसे रहित हो चुका है।

Sri Anandgiri

13th century CE · Advaita

Advaita

Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).

सम इति। अद्वेष्टेत्यादिना द्वेषादिविशेषाभाव उक्तः? संप्रति सर्वत्रैवाविकृतचित्तत्वमुच्यते। सर्वत्र चेतने स्त्रयादावचेतने च चन्दनादावित्यर्थः।

Sri Dhanpati

14th century CE · Vedanta

Advaita

Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.

किंच समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः पूजापरिभवयोः शीतोष्णसुखदुःखेषु समः समदुःखसुख इत्यत्र सामान्यसुखदुःखयोर्ग्रहणम्। अत्र तु शीतोष्णनिबन्धयोरित्यपौनरुक्त्यम्। एतत्सर्वं कुत इत्यत आह। यतः सर्वत्र सङ्गेन संसर्गेण विवर्जितः सङ्गस्यैव सर्वदोषजनकत्वान्न कस्यापि सङ्गं करोतीत्यर्थः। अद्वेषटेत्यादिना द्वेषादिविशेषाभाव उक्तः। संप्रति सर्वत्रैवाविकृतचित्तत्वमुच्यते। सर्वत्र चेतने स्त्र्यादावचेतने चन्दनादावित्यर्थ इति भाष्यटीकाकृतः।

Sri Neelkanth

17th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.

उदासीनत्वं व्याचष्टे -- सम इति। गतव्यथत्वमुपपादयति -- सङ्गविवर्जित इति। सङ्गी हि व्यथते न तु तद्वर्जित इत्यर्थः।

Sri Sridhara Swami

14th century CE · Advaita

Advaita

Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.

किंच -- सम इति। शत्रौ च मित्रे च सम एकरूपः? मानापमानयोरपि तथा सम एव। हर्षविषादशून्य इत्यर्थः। शीतोष्णयोः सुखदुःखयोश्च समः सङ्गविवर्जितः क्वचिदप्यनासक्तः।

Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha

13th–14th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.

समः शत्रौ च इत्यादिना श्लोकद्वयेन बहुविधं सहेतुकं साम्यमुच्यते तत्र पुनरुक्तिमाशङ्क्य परिहरतिअद्वेष्टेति। सन्निहितस्वरूपमानावमानादिद्वन्द्वान्तरसहपाठवशादत्र शत्रुमित्रयोरपि सन्निहितयोर्विवक्षा। सन्निधिर्हि विकारमतिशयेन जनयति।ततोऽप्यतिरिक्त इति दूरस्थासन्नसाधारणात् अद्वेषमात्रादतिरिक्त इत्यर्थः। क्वचिदपि सङ्गवर्जितत्वाच्छीतोष्णादिषु समत्वम्। निन्दास्तुत्योः फलभूतामर्षानुरागादिरहितत्वान्निष्फलत्ववेषेण तुल्यत्वम्।मौनी इति नात्र मननं विवक्षितम्?स्थिरमतिः इत्यनेनैव सिद्धत्वात् मुनिर्मननशीलः? तस्य भावो मित्यप्रसिद्धार्थता च स्यात् नापि समस्तशब्दानुच्चारणं त त्यन्तापेक्षाभावात्? सङ्कीर्तनादिविधेश्च न च कालविशेष देनियतमौनव्रतं? तस्योपयुक्तत्वेऽपि पूर्वोत्तरसङ्गत्यभावात् निन्दन्तं हि निन्दन्ति लौकिकाः? स्तुवन्तं च स्तुवन्ति ततः प्रसक्तनिन्दास्तोत्रप्रतिक्षेपपरत्वमेवोचितम्।सन्तुष्टो येनकेनचित् इति मौनित्वे हेत्वन्तरपरम् अन्यथासन्तुष्टः सततं योगी [12।14] इति पूर्वोक्तत्वेन पुनरुक्तिप्रसङ्गात्। यदृच्छयागतैर्यत्किञ्चिद्द्रव्यैरसन्तुष्टो हि सापेक्षतया स्तुतिपूर्वं कञ्चन याचते? अदातारं च द्विष्यात्। यद्वा अन्यस्तुतितात्पर्येण वा निन्दन्ति। स्थिरमतित्वस्य प्रकरणविशेषितं विषयं दर्शयन् सर्वस्योपरि निर्दिष्टस्य तस्य साक्षात्परम्परया वा पूर्वोक्तसमस्तहेतुत्वं च दर्शयतिआत्मनीति। निकेतननिषेधस्य क्षेत्रादिनिषेधोपलक्षणतया आदिशब्दः। अत्रसमः इति द्वौ परिव्राड्विषयाविति यादवप्रकाशोक्तस्य न लिङ्गं पश्यामः। शत्रुमित्रसाम्यादिगुणानां मुमुक्षौ गृहस्थेऽप्यवश्यम्भावादनिकेतत्वस्य चन शब्दशास्त्राभिरतस्य मोक्षो नचापि रम्यावसथप्रियस्य। न भोजनाच्छादनतत्परस्य न लोकचित्तग्रहणे रतस्य।।एकान्तशीलस्य दृढव्रतस्य पञ्चेन्द्रियाप्रीतिनिवर्तकस्य। अध्यात्मविद्यारतमानसस्य मोक्षो ध्रुवो नित्यमहिंसकस्य [वा.स्मृ.10।7आ.स्मृ.10।67] इत्यादिन्यायेन निस्सङ्गतयाऽपि विर्वाहात्? गृहस्थादिषु निकेतसद्भावनिषेधस्यानुपकारकत्वात्? तत्सद्भावस्य क्वचिद्योगाद्युपकारकैत्वसम्भावनया च तत्सङ्गमात्रमेव निषेव्यतया विवक्षितमिति दर्शयितुंअसक्त इत्युक्तम्। अत एवअद्वेष्टा [12।13] इत्यादीनां सर्वेषामप्यक्षरोपासकसन्न्यासिविषयत्वंशङ्करोक्तं निरस्तम्। क्वचित्सक्तस्य हि स्वरूपतः सुखत्वरहितैर्मानादिभिः प्रीत्यादिकम् अतः क्वचिदपि सङ्गाभावान्मानादिषु समत्वमित्याह -- तत एवेति पूर्वश्लोकेष्विवात्रापि यत्तच्छब्दाध्याहारेणोद्देश्य विधेयांशविभागं दर्शयतिय एवम्भूतो भक्तिमान्स मे प्रिय इति।

Sri Abhinavgupta

10th–11th century CE · Kashmir Shaivism

Kashmir Shaivism

Supreme scholar of Kashmir Shaivism who interpreted the Gita through the non-dual Tantric lens.

यस्मादित्यादि मे प्रिया इत्यन्तम्। अनिकेतः -- इदमेव मया कर्तव्यम् इति यस्य नास्ति प्रतिज्ञा। यथाप्राप्तहेवाकितया सुखदुःखादिकमुपभुञ्ज्ञानः परमेश्वरविषयसमावेशितहृदयः सुखेनैव प्राप्नोति परमकैवल्यम् इति।।।शिवम्।।

Sri Jayatritha

14th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.

Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

Sri Madhusudan Saraswati

16th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.

सम इति। किंच पूर्वस्यैव प्रपञ्चः। सङ्गविवर्जितः चेतनाचेतनसर्वविषयशोभनाध्यासरहितः।,सर्वथा हर्षविषादशून्य इत्यर्थः। स्पष्टमन्यत्।

Sri Purushottamji

16th century CE · Vallabha Sampradaya

Shuddhadvaita

Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.

किञ्च -- सम इति। शत्रौ द्वेषकर्तरि? मित्रे अनुरागवति समः? स्वतो द्वेषानुरागरहित इत्यर्थः। तथा मानापमानयोरपि समः। शीतोष्णयोर्दैहिकयोः सुखदुःखयोः पुत्रजन्ममरणादिरूपयोः समः। सङ्गवर्जितः लौकिकासक्तिरहितः।

Sri Vallabhacharya

15th–16th century CE · Shuddhadvaita

Shuddhadvaita

Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.

तथा सम इति। शत्रौ मित्रे च मानापमानयोश्च शीतादिषु च स्वयं समः? सेव्ये स्वामिनि श्रीभगवति तु शीतादिकं प्रेम्णा भावयमानस्तत्तत्प्रतीकारसेवां कुर्यादेवेत्याशयेन पुनरुक्तं? अनेवम्भूतानां तु सङ्गेन वर्जितः। एवं भावयतां सङ्गं कुर्वाणः स्यादेव?येऽन्योन्यतो भागवताः इत्यादिवाक्यात्।

Swami Gambirananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Advaita

Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.

12.18 Samah, who is the same; satrau ca mitre, towards friend and foe; ca tatha, and so also; mana-apamanayoh, in honour and dishonour, in adoration and humiliation; who is the same sita-usna-sukha-duhkhesu, under cold, heat, happiness and sorrow; and sanga-vivar-jitah, free from attachment to everything; Moreover,

Swami Adidevananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Vishishtadvaita

Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.

12.18 - 12.19 The absence of hate etc., towards foes, friends etc., has already been taught in the stanza beginning with, 'He who never hates any being' (11.13). What is now taught is that eanimity to be practised even when such persons mentioned above are present before one who is superior to those having a general eanimous temperament referred to earlier. Who has no 'home', namely, who is not attached to home, etc., as he possesses firmness of mind with regard to the self. Because of this, he is 'same even in honour and dishonour.' He who is devoted to Me and who is like this - he is dear to Me. Showing the superiority of Bhakti-Nistha over Atma-nistha, Sri Krsna now concludes in accordance with what is stated at the beginning of this chapter in Verse 2.

Frequently Asked Questions

What is Shankaracharya's commentary on BG 12.18?

,समः शत्रौ च मित्रे च? तथा मानापमानयोः पूजापरिभवयोः? शीतोष्णसुखदुःखेषु समः? सर्वत्र च सङ्गविवर्जितः।।किञ्च --,

How many scholars have commented on this verse?

VaniSagar presents 18 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 12.18, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.

Which commentary is best for a beginner?

For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.

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