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Sudarshana Chakra
Adhyay 11, Shlok 36
अर्जुन उवाच स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च। रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः

हे अन्तर्यामी भगवन् ! आपके नाम, गुण, लीलाका कीर्तन करनेसे यह सम्पूर्ण जगत् हर्षित हो रहा है और अनुराग(-प्रेम-) को प्राप्त हो रहा है। आपके नाम, गुण आदिके कीर्तनसे भयभीत होकर राक्षसलोग दसों दिशाओंमें भागते हुए जा रहे हैं और सम्पूर्ण सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं। यह सब होना उचित ही है। — VaniSagar

Global Translations

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GujaratiIND

તે યોગ્ય છે, હે કૃષ્ણ, વિશ્વ તમારી સ્તુતિમાં આનંદિત અને આનંદિત થાય છે; દાનવો ભયભીત થઈને ચારે દિશામાં ઉડે છે અને સિદ્ધિઓના યજમાનો તમને નમન કરે છે.

TeluguIND

ఓ కృష్ణా, లోకం నీ స్తోత్రానికి సంతోషించి ఆనందించడం సముచితం; రాక్షసులు భయంతో అన్ని దిక్కులకు ఎగురుతారు మరియు పరిపూర్ణులైన వారి అతిధేయులు మీకు నమస్కరిస్తారు.

KannadaIND

ಓ ಕೃಷ್ಣನೇ, ನಿನ್ನ ಸ್ತುತಿಯಲ್ಲಿ ಜಗತ್ತು ಸಂತೋಷಪಡುವುದು ಮತ್ತು ಸಂತೋಷಪಡುವುದು ಸೂಕ್ತವಾಗಿದೆ; ರಾಕ್ಷಸರು ಎಲ್ಲಾ ದಿಕ್ಕುಗಳಲ್ಲಿ ಭಯದಿಂದ ಹಾರುತ್ತಾರೆ ಮತ್ತು ಪರಿಪೂರ್ಣರಾದವರ ಸಂಕುಲಗಳು ನಿಮಗೆ ನಮಸ್ಕರಿಸುತ್ತವೆ.

AssameseIND

যথাযথ, হে কৃষ্ণ, তোমাৰ প্ৰশংসাত জগতে আনন্দিত আৰু আনন্দিত হয়; দানৱবোৰে ভয়তে উৰি যায় আৰু সিদ্ধসকলৰ সৈন্যই আপোনাক প্ৰণাম কৰে।

BhojpuriIND

उचित बा हे कृष्ण, तोहरा स्तुति में जगत रमल आ आनन्दित होखे; राक्षस सब दिशा में डर से उड़त बाड़े आ सिद्ध लोग के सेना तोहरा के प्रणाम करेला।

MaithiliIND

उचित अछि हे कृष्ण, जगत अहाँक स्तुति मे आनन्दित आ आनन्दित हो; राक्षस सब दिशा मे भय मे उड़ैत अछि आ सिद्ध लोकनिक सेना अहाँ केँ प्रणाम करैत अछि |

MalayalamIND

കൃഷ്ണാ, ലോകം അങ്ങയുടെ സ്തുതിയിൽ ആനന്ദിക്കുകയും ആനന്ദിക്കുകയും ചെയ്യുന്നത് ഉചിതമാണ്; ഭൂതങ്ങൾ എല്ലാ ദിശകളിലേക്കും ഭയത്തോടെ പറക്കുന്നു, പരിപൂർണ്ണരായവരുടെ സൈന്യങ്ങൾ നിങ്ങളെ വണങ്ങുന്നു.

TamilIND

கிருஷ்ணா, உனது புகழ்ச்சியில் உலகம் மகிழ்ந்து மகிழ்வது பொருத்தமானது; பேய்கள் எல்லா திசைகளிலும் பயந்து பறக்கின்றன, பரிபூரணமானவர்களின் புரவலன்கள் உன்னை வணங்குகின்றன.

PunjabiIND

ਹੇ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ, ਇਹ ਢੁਕਵਾਂ ਹੈ ਕਿ ਸੰਸਾਰ ਤੇਰੀ ਸਿਫ਼ਤਿ-ਸਾਲਾਹ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਸੰਨ ਅਤੇ ਪ੍ਰਸੰਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ; ਭੂਤ ਸਾਰੇ ਦਿਸ਼ਾਵਾਂ ਵਿੱਚ ਡਰ ਨਾਲ ਉੱਡਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਸੰਪੂਰਨ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਮੇਜ਼ਬਾਨ ਤੁਹਾਡੇ ਅੱਗੇ ਝੁਕਦੇ ਹਨ।

MarathiIND

हे कृष्णा, जग तुझ्या स्तुतीने आनंदित आणि आनंदित होणे योग्य आहे; भुते भयभीत होऊन सर्व दिशांना उडतात आणि सिद्ध लोकांचे यजमान तुला नमन करतात.

KonkaniIND

तुज्या स्तुतींत जग रमता आनी खोशी जाता हें योग्य आसा, हे कृष्ण; राक्षस सगळ्या दिकांनी भियेवन उडटात आनी सिद्ध लोकांचीं सैन्या तुका नमस्कार करतात.

BengaliIND

এটা উপযুক্ত, হে কৃষ্ণ, জগৎ আপনার প্রশংসায় আনন্দিত এবং আনন্দিত হয়; রাক্ষসরা ভয়ে সব দিকে উড়ে বেড়ায় এবং সিদ্ধদের বাহিনী আপনাকে প্রণাম করে।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--[संसारमें यह देखा जाता है कि जो व्यक्ति अत्यन्त भयभीत हो जाता है, उससे बोला नहीं जाता। अर्जुन भगवान्का अत्युग्र रूप देखकर अत्यन्त भयभीत हो गये थे। फिर उन्होंने इस (छत्तीसवें) श्लोकसे लेकर छियालीसवें श्लोकतक भगवान्की स्तुति कैसे की? इसका समाधान यह है कि यद्यपि अर्जुन भगवान्के अत्यन्त उग्र (भयानक) विश्वरूपको देखकर भयभीत हो रहे थे, तथापि वे भयभीत होनेके साथ-साथ हर्षित भी हो रहे थे, जैसा कि अर्जुनने आगे कहा है -- 'अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे' (11। 45)। इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन इतने भयभीत नहीं हुए थे, जिससे कि वे भगवान्की स्तुति भी न कर सकें।]

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

अर्जुन बोला -- यह उचित ही है। वह क्या कि हे हृषीकेश आपकी कीर्तिसे अर्थात् आपकी महिमाका कीर्तन और श्रवण करनेसे जो जगत् हर्षित हो रहा है सो उचित ही है। अथवा स्थाने यह शब्द विषयका विशेषण भी समझा जा सकता है। भगवान् हर्ष आदिके विषय हैं? यह मानना भी ठीक ही है? क्योंकि ईश्वर सबका आत्मा और सब भूतोंका सुहृद् है। यहाँ ऐसी व्याख्या करनी चाहिये कि जगत् जो भगवान्में अनुराग -- प्रेम करता है? यह उसका अनुराग करना उचित विषयमें ही है तथा राक्षसगण भयसे युक्त हुए सब दिशाओंमें भाग रहे हैं? यह भी ठीकठिकानेकी ही बात है। एवं समस्त कपिलादि सिद्धोंके समुदाय जो नमस्कार कर रहे हैं? यह भी उचित विषयमें ही है।

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Sri Anandgiri

किं तदर्जुनो भगवन्तं प्रति सगद्गदं वचनमुक्तवानिति तदाह -- अर्जुन इति। विषयविशेषणत्वमेव व्यनक्ति -- युक्त इति। भगवतो हर्षादिविषयत्वं युक्तमित्यत्र हेतुमाह -- यत इति। तव प्रकीर्त्या हर्षवदनुरागं च गच्छति जगदित्याह -- तथेति। तच्चेत्यनुरागगमनम्। रक्षःसु जगदेकदेशभूतेषु प्रतिपक्षेषु कुतो जगतो भवति हर्षानुरागावित्याशङ्क्याह -- किञ्चेति। इतश्च जगतो भगवति हर्षादि युक्तमित्याह -- सर्व इति।

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Sri Dhanpati

हे हृषीकेश? तव माहात्म्यप्रकीर्तनेन यज्जगत् प्रहर्षं प्राप्नोत्यनुरागं चोपैति तत्स्थाने युक्तमित्यर्थः। यद्वा तव प्रकीर्त्या यज्जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च तत् स्थाने हर्षादिस्थितयोग्यविषये। यतस्त्वं हृषीकेशः सर्वेन्द्रियनियन्ता सर्वान्तर्यामी सर्वसुहृदिति सूचनार्थ संबोधनम्। किंच यद्रक्षांसि भयाविष्टानि दिशो द्रवन्ति पलाय गच्छन्ति यच्च सिद्धानां कपिलादीनां समुदायाः नमस्कुर्वन्ति तच्च स्थाने इति पूर्ववत्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
arjunaḥ uvāchaArjun said
sthāneit is but apt
hṛiṣhīkaīśha
tavayour
prakīrtyāin praise
jagatthe universe
prahṛiṣhyatirejoices
anurajyatebe enamored
chaand
rakṣhānsithe demons
bhītānifearfully
diśhaḥin all directions
dravantiflee
sarveall
namasyantibow down
chaand
siddhasaṅghāḥ
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 11.35
सञ्जय उवाच एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी। नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य

सञ्जय बोले -- भगवान् केशवका यह वचन सुनकर भयसे कम्पित हुए किरीटी अर्जुन हाथ जोड़कर नमस्कार करके और अत्यन्त भयभीत होकर फिर प्रणाम करके गद्गदं वाणीसे भगवान् कृष्णसे बोले। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 11.37
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्

हे महात्मन् ! गुरुओंके भी गुरु और ब्रह्माके भी आदिकर्ता आपके लिये (वे सिद्धगण) नमस्कार क्यों नहीं करें? क्योंकि हे अनन्त ! हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप अक्षरस्वरूप हैं; आप सत् भी हैं, असत् भी हैं, और सत्-असत् से पर भी जो कुछ है, वह भी आप ही हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 11Shlok 36
Bhagavad Gita · Adhyay 11, Shlok 36
अर्जुन उवाच स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च। रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः

हे अन्तर्यामी भगवन् ! आपके नाम, गुण, लीलाका कीर्तन करनेसे यह सम्पूर्ण जगत् हर्षित हो रहा है और अनुराग(-प्रेम-) को प्राप्त हो रहा है। आपके नाम, गुण आदिके कीर्तनसे भयभीत होकर राक्षसलोग दसों दिशाओंमें भागते हुए जा रहे हैं और सम्पूर्ण सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं। यह सब होना उचित ही है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 11 श्लोक 36 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 11 श्लोक 36 का हिंदी अर्थ: "हे अन्तर्यामी भगवन् ! आपके नाम, गुण, लीलाका कीर्तन करनेसे यह सम्पूर्ण जगत् हर्षित हो रहा है और अनुराग(-प्रेम-) को प्राप्त हो रहा है। आपके नाम, गुण आदिके कीर्तनसे भयभीत होकर राक्षसलोग दसों दिशाओंमें भागते हुए जा रहे हैं और सम्पूर्ण सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं। यह सब होना उचित ही है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Vishvarupa-Darsana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 36?

Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 36 translates to: "It is fitting, O Krishna, that the world delights and rejoices in Your praise; demons fly in fear in all directions and the hosts of the perfected ones bow to You. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अर्जुन उवाच स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च। रक्षांसि भ" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 11, श्लोक 36 है जो Bhagavad Gita के Vishvarupa-Darsana Yoga में संकलित है। हे अन्तर्यामी भगवन् ! आपके नाम, गुण, लीलाका कीर्तन करनेसे यह सम्पूर्ण जगत् हर्षित हो रहा है और अनुराग(-प्रेम-) को प्राप्त हो रहा है। आपके नाम, गुण आदिके कीर्तनसे भयभीत होकर राक्षसलोग दसों दिशाओंमें भागते हुए जा रहे हैं और सम्पूर्ण सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं। यह सब होना उचित ही है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "arjuna uvācha" mean in English?

"arjuna uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 36. It is fitting, O Krishna, that the world delights and rejoices in Your praise; demons fly in fear in all directions and the hosts of the perfected ones bow to You. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.