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Bhagavad Gita · BG 10.19

Bhagavad Gita 10.19 — Commentary

19 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti

Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more

Sanskrit Original — मूल श्लोक

श्री भगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः। प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे

śhrī bhagavān uvācha hanta te kathayiṣhyāmi divyā hyātma-vibhūtayaḥ prādhānyataḥ kuru-śhreṣhṭha nāstyanto vistarasya me

", "Very well! Now I will declare to you My divine glories in their prominence, O Arjuna; there is no end to their detailed description."

Scholar Commentaries (19)

Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.

Sri Shankaracharya

8th century CE · Advaita Vedanta

Advaita

The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.

,हन्त इदानीं ते तव दिव्याः दिवि भवाः आत्मविभूतयः आत्मनः मम विभूतयः याः ताः कथयिष्यामि इत्येतत्। प्राधान्यतः यत्र यत्र प्रधाना या या विभूतिः तां तां प्रधानां प्राधान्यतः कथयिष्यामि अहं कुरुश्रेष्ठ। अशेषतस्तु वर्षशतेनापि न शक्या वक्तुम्? यतः नास्ति अन्तः विस्तरस्य मे मम विभूतीनाम् इत्यर्थः।।तत्र प्रथममेव तावत् श्रृणु --,

Sri Ramanuja

11th–12th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.

श्रीभगवानुवाच -- हे कुरुश्रेष्ठ मदीयाः कल्याणीः विभूतीः प्राधान्यतः ते कथयिष्यामि। प्राधान्यशब्देन उत्कर्षो विवक्षितः?पुरोधसां च मुख्यं माम् (गीता 10।24) इति हि वक्ष्यते। जगति उत्कृष्टाः काश्चन विभूतीः वक्ष्यामि? विस्तरेण वक्तुं श्रोतुं च न शक्यते? तासाम् आनन्त्यात्। विभूतित्वं नाम नियाम्यत्वम्? सर्वेषां भूतानां बुद्ध्यादयः पृथग्विधा भावा मत्त एव भवन्ति इति उक्त्वाएतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः। (गीता 10।7) इति प्रतिपादनात्। तथा तत्र योगशब्दनिर्दिष्टं स्रष्टृत्वादिकं विभूतिशब्दनिर्दिष्टं तत्प्रवर्त्यत्वम् इति युक्तम्। पुनश्चअहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः।। (गीता 10।8) इति उक्तम्।तत्र सर्वभूतानां प्रवर्तनरूपं नियमनम् आत्मतया अवस्थाय इति इमम् अर्थं योगशब्दनिर्दिष्टं सर्वस्य स्रष्टृत्वं पालयितृत्वं संहर्तृत्वं च इति सुस्पष्टम् आह --

Sri Madhavacharya

13th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.

Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

Swami Chinmayananda

20th century CE · Neo-Vedanta

Neo-Vedanta

Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.

प्रस्तुत अध्याय को बृहत् आकार देने वाला भगवान् श्रीकृष्ण का यह विस्तृत एवं व्याख्यापूर्ण उत्तर? एकएक वस्तु और व्यक्ति में तथा उनके समूह में आत्मा की वास्तविक पहचान का वर्णन करता है। यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि अपनी विभूति और योग का वर्णन करते समय भगवान् श्रीकृष्ण निम्नलिखित दो बातों को बताने का विशेष ध्यान रखते हैं। (क) प्रत्येक वस्तु में अपना सर्वोच्च महत्त्व? (ख) उनके बिना किसी भी एक वस्तु या समूह का सामञ्जस्यपूर्ण अस्तित्व सम्भव नहीं हो सकता।इस खण्ड का प्रारम्भ जिस हन्त शब्द से होता है? वह अर्जुन के प्रति गीताचार्य के प्रेमपूर्ण सहानुभूति को दर्शाता है? तथा उससे अर्जुन में प्रतीत होने वाली अक्षमता के प्रति भगवान् की चिन्ता भी व्यक्त होती है? क्योंकि उस अक्षमता के कारण वह उस तत्त्व को नहीं अनुभव कर पा रहा था जो उसके अत्यन्त समीप है? उसका स्वरूप ही है। हन्त शब्द को इस खण्ड के प्रारम्भ का केवल सूचक मानने में उसमें निहित गूढ़ अभिप्राय का लोप हो जाने के कारण वह अर्थ स्वीकार्य नहीं हो सकता।समष्टि और व्यष्टि उपाधियों के द्वारा इस बहुविध सृष्टि के रूप में व्यक्त हुए आत्मा के विस्तार का अन्त नहीं हो सकता। इसलिए उसका वर्णन करना असंभव है? तथापि करुणासागर भगवान् श्रीकृष्ण अपने शरणागत् शिष्य अर्जुन के प्रति अपनी असीम अनुकम्पा के कारण इस असंभव कार्य को अपने हाथ में लेते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि उनके विस्तार का कोई अन्त नहीं है फिर भी वे अर्जुन को अपनी प्रधान विभूतियाँ बतायेंगे।भौतिक जगत् में यह एक अनुभूत सत्य है कि सूर्यप्रकाश सभी वस्तुओं की सतह पर से परावर्तित होता है चाहे वह पाषाण हो या दर्पण किन्तु दर्पण में उसका प्रतिबिम्ब या परावर्तन अधिक स्पष्ट और तेजस्वी होता है। भगवान् वचन देते हैं कि वे ऐसे दृष्टान्त देंगे जिनमें दिव्यता की अभिव्यक्ति के साक्षात् दर्शन हो सकते हैं।परन्तु? उन विभूतियों के वर्णन में प्रवेश करने के पूर्व एक मूलभूत सत्य को बताते हैं

Swami Sivananda

20th century CE · Integral Yoga

Integral Yoga

Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.

10.19 हन्त now? very well? ते to thee? कथयिष्यामि (I) will declare? दिव्याः divine? हि indeed? आत्मविभूतयः My glories? प्राधान्यतः in their prominence? कुरुश्रेष्ठ O best of the Kurus? न not? अस्ति is? अन्तः end? विस्तरस्य of detail? मे of Me.Commentary Now I will tell you of My most prominent divine glories. My glories are illimitable it is not possible to describe all of them.

Swami Ramsukhdas

20th century CE · Gita Press Gorakhpur

Bhakti

Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.

व्याख्या--'हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः'--योग और विभूति कहनेके लिये अर्जुनकी जो प्रार्थना है, उसको 'हन्त' अव्ययसे स्वीकार करते हुए भगवान् कहते हैं कि मैं अपनी दिव्य, अलौकिक, विलक्षण विभूतियोंको तेरे लिये कहूँगा (योगकी बात भगवान्ने आगे इकतालीसवें श्लोकमें कही है)।'दिव्याः' कहनेका तात्पर्य है कि जिस किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना आदिमें जो कुछ भी विशेषता दीखती है, वह,वस्तुतः भगवान्की ही है। इसलिये उसको भगवान्की ही देखना दिव्यता है और वस्तु, व्यक्ति आदिकी देखना अदिव्यता अर्थात् लौकिकता है। 'प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे'-- जब अर्जुनने कहा कि भगवन्! आप अपनी विभूतियोंको विस्तारसे, पूरी-की-पूरी कह दें, तब भगवान् कहते हैं कि मैं अपनी विभूतियोंको संक्षेपसे कहूँगा; क्योंकी मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है। पर आगे ग्यारहवें अध्यायमें जब अर्जुन बड़े संकोचसे कहते हैं कि मैं आपका विश्वरूप देखना चाहता हूँ; अगर मेरे द्वारा वह रूप देखा जाना शक्य है तो दिखा दीजिये, तब भगवान् कहते हैं --'पश्य मे पार्थ रूपाणि' (11। 5) अर्थात् तू मेरे रूपोंको देख ले। रूपोंमें कितने रूप? क्या दो-चार? नहीं-नहीं, सैकड़ों-हजारों रूपोंको देख! इस प्रकार यहाँ अर्जुनकी विस्तारसे विभूतियाँ कहनेकी प्रार्थना सुनकर भगवान् संक्षेपसे विभूतियाँ सुननेके लिये कहते हैं और वहाँ अर्जुनकी एक रूप दिखानेकी प्रार्थना सुनकर भगवान् सैकड़ों-हजारों रूप देखनेके लिये कहते हैं!

Sri Harikrishnadas Goenka

19th–20th century CE · Gita Press

Vaishnava

Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.

श्रीभगवान् बोले -- हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अब मैं तुझे अपनी दिव्य -- देवलोकमें होनेवाली विभूतियाँ प्रधानतासे बतलाता हूँ अर्थात् मेरी जहाँजहाँपर जोजो प्रधानप्रधान विभूतियाँ हैं? उनउन प्रधान विभूतियोंका ही मैं प्रधानतासे वर्णन करता हूँ। सम्पूर्णतासे तो वे सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं कही जा सकतीं क्योंकि मेरे विस्तारका अर्थात् मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है।

Sri Anandgiri

13th century CE · Advaita

Advaita

Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).

प्रष्टारं विश्रम्भयितुं भगवानुक्तवानित्याह -- श्रीभगवानिति। हन्तेत्यनुमतिं व्यावर्त्य जिज्ञासावच्छिन्नं कालं दर्शयति -- इदानीमिति। दिवि भवत्वमप्राकृतत्वमस्मदगोचरत्वम्। वाक्यान्वयं द्योतयति -- यास्ता इति। सर्वविभूतीनां वक्तव्यत्वप्राप्तावुक्तम् -- यत्रेति। किमित्यनवशेषतो विभूतयो नोच्यन्ते तत्राह -- अशेषतस्त्विति। तत्र हेतुर्यत इति।

Sri Dhanpati

14th century CE · Vedanta

Advaita

Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.

एवं पृष्टो भगवानुवाच। हन्तेदानीं या आत्मनो विभूतयस्ताः कथियिष्यामि प्राधान्यतः। प्रधानां तां तां विभूतिमित्यर्थः। कुरुश्रेष्ठेति संबोधयन् स्वमधिकारीति सूचयति। विस्तरेण कथयेत्युक्तं तत्राह। मे विभूतीनां विस्तरस्यान्तो नास्ति।

Sri Neelkanth

17th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.

अत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच -- हन्तेति। हन्त इदानीम्। हन्तेत्यनुमतौ वा। दिव्याः पुराणान्तरेष्वपि श्रेष्ठत्वेन प्रसिद्धाः या आत्मविभूतयस्ताः कथयामीति योजना। प्राधान्यत इति। योगोपकारित्वेन विभूतय इह प्राधान्येन? योगस्तु संक्षेपेणैवोच्यते। तस्याग्रे वक्ष्यमाणत्वादिति भावः। अन्यथा योगं विभूतिं च कथयेति पुष्टे विभूतिमात्रकथनेनानवहितचित्तत्वं भगवतः स्यात्। नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे विभूतिनामिति विपरिणामेनानुषञ्जनीयम्।

Sri Sridhara Swami

14th century CE · Advaita

Advaita

Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.

एवं प्रार्थितः सन् श्रीभगवानुवाच -- हन्तेति। हन्तेत्यनुकम्पासंबोधनम्। दिव्या या मम विभूतयस्ताः प्राधान्येन तुभ्यं कथयिष्यामि। यतोऽवान्तरस्य विभूतिविस्तरस्य मदीयस्यान्तो नास्त्यतः प्रधानभूताः कतिचिद्वर्णयिष्यामि।

Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha

13th–14th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.

एवमतृप्त्या पृच्छन्तमर्जुनं प्रति अतिप्रसन्नो भगवांस्तस्याभिजनादिवर्णनमुखेन योग्यतां दर्शयन् विभूतेर्विस्तरेण प्रत्येकं वक्तुं श्रोतुं च अशक्यत्वात्केनचिदुपाधिविशेषेण संगृहीता विभूतीर्वक्ष्यामीत्याह -- हन्तेति। ते अनसूयत्वप्रीयमाणत्वातृप्तत्वादिगुणपूर्णायेति भावः। गुणत्वादिप्रतियोगिकशेषित्वादिप्राधान्यविवक्षायां वक्ष्यमाणसमस्तोदाहरणव्याप्त्यभावाद्गणानां च प्राधान्येन व्यपदेक्ष्यमाणत्वात्सङ्ग्राहकमर्थविशेषमाहप्राधान्यशब्देनेति। तस्यैव विवक्षितत्वं वक्ष्यमाणेन संवादयतिपुरोधसामिति। पिण्डितार्थमाहजगतीति।विस्तरेण कथय इति पृच्छन्तं प्रति प्राधान्यतः कथयिष्यामीति कथमुच्यते इति शङ्कायांनास्त्यन्तो विस्तरस्य मे इत्युच्यते। विभूतीनामिति शेषः।विभूतेर्विस्तरो मया [10।40] इति हि वक्ष्यते। नास्तिशब्दाभिप्रेतमशक्यत्वं दर्शयतिविस्तरेण वक्तृभिति। नेदं वक्तृश्रोत्रोरसामर्थ्यनिबन्धनमित्याहतासामानन्त्यादिति। तदेतदुक्तंनास्त्यन्त इति। वक्ष्यमाणेषु पदार्थेषु विभूतिशब्दप्रयोगनिमित्तमाहविभूतित्वं नामेति। नियन्तव्यवस्त्वन्तरविषयो विभूतिशब्दो विभवनकर्मपरः। अन्यत्र चब्रह्मा दक्षादयः कालःविष्णुर्मन्वादयः कालःरुद्रः कालान्तकाद्याश्चजनार्दनविभूतयः [वि.पु.1।22।3133] इत्यादिषु इति नियन्तव्येषु विभूतिशब्दो दृष्ट इति भावः। कुतः इत्यत्राह -- सर्वेषामिति। प्रस्तुतं तादधीन्यं ह्येतच्छब्देन परामृश्यत इति भावः। समनन्तरश्लोकेनापि तस्य श्लोकस्य तदर्थपरत्वं दर्शयतितथेति। नन्वस्य श्लोकस्य व्याख्याने पूर्वंसौशील्यवात्सल्यसौन्दर्यादिकल्याणगुणयोगं इत्युक्तम् इह तु योगशब्दनिर्दिष्टं स्रष्ट्टत्वादिकमुच्यते तत्कथं घटते इत्थम् -- उभयत्रोभयमप्यादिशब्देन सङ्गृहीतमित्येकार्थत्वात्। अत एव हिएतविभूतिं योगं च [10।7] इत्यत्र ममहेयप्रत्यनीककल्याणगुणगणरूपं योगं च इति प्रयोजकेन संगृहीतम्।एतां विभूतिम् इत्यादेः पूर्ववन्नियमनपरत्वेन व्याख्यानेऽपि अत्र तदुपादानं समृद्ध्याद्यर्थान्तरव्युदासेन सोपसर्गधात्वर्थव्यञ्जनार्थम्।विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च [10।18] इत्यत्र तुयाभिर्विभूतिभिः [10।16] इति तत्पूर्वप्रश्नवाक्यस्थविभूतिशब्दैकार्थ्यस्वारस्यान्नियमनार्थतोक्ता। अतः प्रश्नोत्तरपदयोरीषद्वैरूप्यं सह्यम्।

Sri Abhinavgupta

10th–11th century CE · Kashmir Shaivism

Kashmir Shaivism

Supreme scholar of Kashmir Shaivism who interpreted the Gita through the non-dual Tantric lens.

हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।

Sri Jayatritha

14th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.

Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

Sri Madhusudan Saraswati

16th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.

अत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच -- हन्तेत्यनुमतौ। यत्त्वया प्रार्थितं तत्करिष्यामि मा व्याकुलोभूरित्यर्जुनं समाश्वास्य तदेव कर्तुमारभते। कथयिष्यामि प्राधान्यतस्ता विभूतीर्या दिव्या हि प्रसिद्धा आत्मनो ममासाधारणा विभूतयः हे कुरुश्रेष्ठ? विस्तरेण तु कथनमशक्यम्। यतो नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे विभूतीनां? अतः प्रधानभूताः,काश्चिदेव विभूतीर्वक्ष्यामीत्यर्थः।

Sri Purushottamji

16th century CE · Vallabha Sampradaya

Shuddhadvaita

Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.

एवं जिज्ञासुनाऽर्जुनेन प्रार्थित आह -- हन्तेति। स्वस्वरूपज्ञानार्थकतादृक्प्रार्थनया हन्तेति हर्षे। हे कुरुश्रेष्ठ भक्तवंशोद्भव दिव्याः क्रीडारूपा विभूतयः ते प्राधान्यतस्त्वद्योग्यास्त्वदर्थं कथयिष्यामि। ननु विस्तरेण कथं नोच्यते इत्यत आह -- नास्तीति। मे विभूतीनां विस्तरस्य अन्तो नास्ति। अतस्त्वत्पृष्टत्वाद्योग्या एव कथयिष्यामीति भावः।

Sri Vallabhacharya

15th–16th century CE · Shuddhadvaita

Shuddhadvaita

Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.

एवं प्रार्थितः श्रीभगवानुवाच -- हन्तेति। अनुकम्पा सम्बोधने। या दिव्या ममात्मविभूतयस्ता वक्ष्यामि। तत्रापि प्राधान्यतः? न तु सामस्त्येन अनन्तत्वात्तदाह -- नास्त्यन्त इति। विभूतिर्हि विविधतया स्वांशरूपेण प्रकृतौ भूतिराविर्भूतिः केनचिद्विशेषेण युक्ता सर्वत्र सत्ता वा स्वस्य विविधा सर्वेषां नियम्यत्त्वोक्त्या स्वांशत्वकथनमभिप्रेतम्। एवं च सर्वस्य विभूतिरूपत्वे प्राधान्यतो विभूतय इहोच्यन्ते।पुरोधसां च मुख्यं मां [10।24] इति रीत्या मुख्यभावो ज्ञेयः। एवमपि भगवानव्ययोऽचिन्त्यैश्वर्यादिधर्मकत्वादिति योगः स च तदन्ते वक्ष्यतेविष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् [10।42] इति।

Swami Gambirananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Advaita

Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.

10.19 Kuru-srestha, O best of the Kurus; hanta, now; since, on the other hand, it is not possible to speak exhaustively of them even in a hundred years, (there-fore) pradhanyatah, according to their importance, according as those manifestations are pre-eminent in their respective spheres; kathayisyami, I shall described; te, to you; atma-vibhutayah, My own glories; which are (hi, indeed) divyah, divine, heavenly. Na asti there is no; antah, end; me, to My; vistarasya, manifestations. 'Of those, now listen to the foremost:'

Swami Adidevananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Vishishtadvaita

Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.

10.19 The Lord said O Arjuna, I shall tell you My auspicious manifestations - those that are prominent among these. The term 'Pradhanya' connotes pre-eminence. For it will be said, 'Know Me to be the chief among family priests' (10.24). I shall declare to you those that are prominent in the world. For it would not be possible to tell or listen to them in detail, because there is no limit to them. To be a Vibhuti, the manifestation referred to should be under the control of the Lord; because it is stated: 'He who in truth knows this supernal manifestation and the seat of auspicious attributes' (10.7), after listing the various kinds of mental dispositions like intelligence etc., of all beings. Similarly it has been stated there that 'being the creator etc.,' is meant by the term Yoga, and that their 'being actuated,' meant by the term Vibhuti. Again it is stated: 'I am the origin of all; from me proceed everything; thinking thus, the wise worship Me with all devotion' (10.8). Sri Krsna clearly declares that he rules over all creatures by actuating them from within as their Self. He also declares His being the creator, sustainer and destroyer of everything, as connected by the term Yoga.

Frequently Asked Questions

What is Shankaracharya's commentary on BG 10.19?

,हन्त इदानीं ते तव दिव्याः दिवि भवाः आत्मविभूतयः आत्मनः मम विभूतयः याः ताः कथयिष्यामि इत्येतत्। प्राधान्यतः यत्र यत्र प्रधाना या या विभूतिः तां तां प्रधानां प्राधान्यतः कथयिष्यामि अहं कुरुश्रेष्ठ। अशेषतस्तु वर्षशतेनापि न शक्या वक्तुम्? यतः नास्ति अन्तः विस्तरस्य मे मम विभूतीनाम् इत्यर्थः।।तत्र प्रथममेव तावत् श्रृणु --,

How many scholars have commented on this verse?

VaniSagar presents 19 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 10.19, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.

Which commentary is best for a beginner?

For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.

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